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खुलेंगे ब्रह्मांड के रहस्य: खगोलविदों का दावा- आकाशगंगाओं की टक्कर से बना सबसे शक्तिशाली माइक्रोवेव लेजर
Tue, 14 Apr 2026 05:58 AM IST
Nirmal Kant
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: Nirmal Kant
Updated Tue, 14 Apr 2026 05:58 AM IST
सार
वैज्ञानिकों ने दो टकराती आकाशगंगाओं से निकले अब तक के सबसे शक्तिशाली मेजर (माइक्रोवेव लेजर) की खोज का दावा किया है, जो बेहद दूर से आने वाली तीव्र और केंद्रित ऊर्जा किरण है। यह मेजर अब तक का सबसे चमकीला और सबसे दूर स्थित स्रोत माना जा रहा है, जो अरबों प्रकाश वर्ष दूर से दर्ज किया गया है। पढ़िए रिपोर्ट-
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खगोलविदों का शक्तिशाली माइक्रोवेव लेजर खोजने का दावा (सा्ंकेतिक तस्वीर)
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
अंतरराष्ट्रीय खगोलविदों की एक टीम ने ज्ञात ब्रह्मांड का अब तक का सबसे शक्तिशाली माइक्रोवेव लेजर खोजने का दावा किया है। यह असाधारण ऊर्जा पुंज दो आकाशगंगाओं के आपस में टकराने से उत्पन्न हुआ है।
वैज्ञानिक भाषा में इसे मेजर कहा जाता है। यानी यह भी लेजर की तरह ऊर्जा की एक बेहद सटीक और केंद्रित किरण बनाता है, लेकिन फर्क यह है कि इसमें आंखों से दिखने वाली रोशनी की जगह माइक्रोवेव तरंगें निकलती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार यह अब तक देखा गया सबसे चमकीला और सबसे दूर स्थित मेजर है। यह अध्ययन नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित हुआ है।
कैसे बनता है लेजर : लेजर या मेजर बनने की प्रक्रिया मूल रूप से एक जैसी होती है। इसके लिए पहले परमाणुओं को अस्थिर, उच्च ऊर्जा अवस्था में पहुंचाया जाता है। इसके बाद जब प्रकाश कण यानी फोटॉन इन उत्तेजित परमाणुओं से टकराते हैं, तो वे अपनी ऊर्जा छोड़ते हुए नए फोटॉन उत्सर्जित करते हैं। यह एक श्रृंखला प्रतिक्रिया पैदा करता है, जिसमें लगातार अधिक संख्या में फोटॉन उत्पन्न होते जाते हैं। चूंकि हर परमाणु एक जैसे फोटॉन उत्सर्जित करता है, इसलिए पूरी किरण एक ही आवृत्ति यानी फ्रीक्वेंसी की होती है। इसी वजह से एक अत्यंत केंद्रित और सुसंगत बीम बनती है, ठीक लेजर की तरह लेकिन माइक्रोवेव तरंगों के रूप में।
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विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे मेजर दूरस्थ आकाशगंगाओं और उनके केंद्रों में चल रही चरम गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए बेहद उपयोगी होते हैं। इनसे वैज्ञानिक यह समझ सकते हैं कि आकाशगंगाएं कैसे विकसित होती हैं, टकराव के दौरान उनमें क्या भौतिक प्रक्रियाएं चलती हैं और शुरुआती ब्रह्मांड में ऊर्जा का वितरण किस तरह हुआ करता था। इस खोज को ब्रह्मांडीय भौतिकी के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, क्योंकि यह दिखाती है कि आकाशगंगाओं की हिंसक टक्करों से कितनी तीव्र और संगठित ऊर्जा उत्पन्न हो सकती है, जो अरबों प्रकाश वर्ष दूर से भी पृथ्वी तक दर्ज की जा सके।
ये भी पढ़ें: Bengal: पहचान व ध्रुवीकरण की कोशिश के बीच, योजनाओं-वादों की होड़ में उलझी बंगाल की लड़ाई
क्यों अहम है यह खोज: यह खोज सिर्फ एक खगोलीय घटना का रिकॉर्ड नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के शुरुआती इतिहास को समझने की एक नई खिड़की भी है। इतनी दूर और शक्तिशाली मेजर से वैज्ञानिक यह जान सकते हैं कि आकाशगंगाओं की टक्कर के दौरान गैस और धूल कैसे सघन होती है, सुपरमैसिव ब्लैक होल के आसपास ऊर्जा कैसे केंद्रित होती है और तारा निर्माण की प्रक्रिया कितनी तीव्र होती है।
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वैज्ञानिक भाषा में इसे मेजर कहा जाता है। यानी यह भी लेजर की तरह ऊर्जा की एक बेहद सटीक और केंद्रित किरण बनाता है, लेकिन फर्क यह है कि इसमें आंखों से दिखने वाली रोशनी की जगह माइक्रोवेव तरंगें निकलती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार यह अब तक देखा गया सबसे चमकीला और सबसे दूर स्थित मेजर है। यह अध्ययन नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित हुआ है।
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कैसे बनता है लेजर : लेजर या मेजर बनने की प्रक्रिया मूल रूप से एक जैसी होती है। इसके लिए पहले परमाणुओं को अस्थिर, उच्च ऊर्जा अवस्था में पहुंचाया जाता है। इसके बाद जब प्रकाश कण यानी फोटॉन इन उत्तेजित परमाणुओं से टकराते हैं, तो वे अपनी ऊर्जा छोड़ते हुए नए फोटॉन उत्सर्जित करते हैं। यह एक श्रृंखला प्रतिक्रिया पैदा करता है, जिसमें लगातार अधिक संख्या में फोटॉन उत्पन्न होते जाते हैं। चूंकि हर परमाणु एक जैसे फोटॉन उत्सर्जित करता है, इसलिए पूरी किरण एक ही आवृत्ति यानी फ्रीक्वेंसी की होती है। इसी वजह से एक अत्यंत केंद्रित और सुसंगत बीम बनती है, ठीक लेजर की तरह लेकिन माइक्रोवेव तरंगों के रूप में।
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विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे मेजर दूरस्थ आकाशगंगाओं और उनके केंद्रों में चल रही चरम गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए बेहद उपयोगी होते हैं। इनसे वैज्ञानिक यह समझ सकते हैं कि आकाशगंगाएं कैसे विकसित होती हैं, टकराव के दौरान उनमें क्या भौतिक प्रक्रियाएं चलती हैं और शुरुआती ब्रह्मांड में ऊर्जा का वितरण किस तरह हुआ करता था। इस खोज को ब्रह्मांडीय भौतिकी के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, क्योंकि यह दिखाती है कि आकाशगंगाओं की हिंसक टक्करों से कितनी तीव्र और संगठित ऊर्जा उत्पन्न हो सकती है, जो अरबों प्रकाश वर्ष दूर से भी पृथ्वी तक दर्ज की जा सके।
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क्यों अहम है यह खोज: यह खोज सिर्फ एक खगोलीय घटना का रिकॉर्ड नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के शुरुआती इतिहास को समझने की एक नई खिड़की भी है। इतनी दूर और शक्तिशाली मेजर से वैज्ञानिक यह जान सकते हैं कि आकाशगंगाओं की टक्कर के दौरान गैस और धूल कैसे सघन होती है, सुपरमैसिव ब्लैक होल के आसपास ऊर्जा कैसे केंद्रित होती है और तारा निर्माण की प्रक्रिया कितनी तीव्र होती है।
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