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इस्तेमाल हो चुके खाने के तेल से चलेंगी गाड़ियां, एफएसएसएआई ने शुरू की बॉयोडीजल बनाने की मुहिम

Mon, 13 Aug 2018 11:28 PM IST
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 13 Aug 2018 11:28 PM IST
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FSSAI is now planning to run vehicles with used Cooking oil

छोटे रेस्टोरेंट, होटल, ढाबा, फूड प्लाजा और स्ट्रीट वेंडर्स समोसा, पकोड़े आदि तलने के बाद बचे हुए तेल को नाली में नहीं बहा पाएंगे। पर्यावरण को बचाने के लिए एफएसएसएआई अब इस्तेमाल हुए खाद्य तेल से गाड़ियां चलाने की योजना बना रहा है। प्राधिकरण ने इसके लिए 'रुको' अभियान के तहत मैकडॉनल्ड्स जैसे बड़े रेस्टोरेंट्स के साथ गठजोड़ किया है।

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जले हुए तेल से होता है प्रदूषण
भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के सीईओ पवन अग्रवाल के मुताबिक रेस्टोरेंट और होटलों में खाने का सामान तलने के बाद इस्तेमाल हुए खाने के तेल को अभी तक नालियों में बहा दिया जाता था, जिससे प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती थी। जिसके बाद प्राधिकरण ने होटलों और रेस्टोरेंट्स को बॉयो डीजल बनाने की सलाह दी थी। उन्होंने बताया कि फिलहाल काफी कम मात्रा में इस्तेमालशुदा खाद्य तेल से बॉयो डीजल बनाया जा रहा है। लेकिन जिस तरह से परिस्थितयां बदल रही हैं, उससे आने वाले वक्त में यह बड़े पैमाने पर पहुंच जाएगा।
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स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है इस्तेमालशुदा तेल
अग्रवाल का कहना है कि खाद्य पदार्थो को तलने के बाद जो तेल बचता है, वह दोबारा इस्तेमाल करने योग्य नहीं रहता है। दोबारा इस्तेमाल करने से स्वास्थ्य पर विपरित प्रभाव पड़ सकते हैं। यही वजह है कि बचे हुए तेल को नालियों में बहाना पड़ता है। उनकी योजना 2022 तक 220 करोड़ लीटर इस्तेमाल कुकिंग तेल से बॉयोडीजल बनाने की है। इसके अलावा एफएसएसएआई ने आगे बढ़ते हुए तलने के लिए 100 लीटर से ज्यादा खाद्य तेल इस्तेमाल करने वाले व्यवसायिक प्रतिष्ठानों से एक स्टॉक रजिस्टर बनाने के लिए कहा है, ताकि अधिकृत एजेंसियों को ही इस्तेमालशुदा खाद्य तेल सौंपा जा सके।

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मैकडॉनल्ड्स चला रहा है ट्रक

जल्द ही प्रयोग हो चुके खाद्य तेल से बॉयो डीजल बनाने की मुहिम से देश भर के प्रमुख होटलों को जोड़ा जाएगा। जिससे डीजल आयात में करीब 5 फीसदी तक कमी आने की संभावना है। उन्होंने बताया कि मुंबई और पुणे में मैकडॉनल्ड्स के 100 से ज्यादा आउटलेट्स हर महीने 35,000 लीटर यानी साल भर में करीब 4.20 लाख लीटर तेल को बॉयोडीजल में बदल रही है।

कंपनी इस बॉयोडीजल का प्रयोग मैकडॉनल्ड्स को आपूर्ति करने वाले ट्रकों में कर रही है। वाहनों में कुछ तकनीकी बदलाव के साथ तकरीबन 20-25 ट्रक इसी से चल रहे हैं और रोज करीब 150 रेस्तरां को माल पहुंचा रहे हैं।

एफएसएसएआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में सालाना 2.30 करोड़ टन खाद्य तेल का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें से 30 लाख टन तेल बायोडीजल उत्पादन के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता है, जिसका अनुमानित मूल्य 18,000 करोड़ रुपये होगा।

चीन से होगी बराबरी

बॉयोडीजल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष संदीप चतुर्वेदी का कहना है कि एफएसएसएआई और राष्ट्रीय बॉयोडीजल नीति की पहल से 10 हजार 800 करोड़ रुपयों की बचत होगी, जिससे आने वाले दो सालों में 80 हजार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियां सृजित की जा सकेंगी। उन्होंने बताया कि बॉयो डीजल बनाने के आंकड़ों में जल्द ही चीन से बराबरी कर लेंगे। चीन में हर साल तकरीबन 30 लाख टन इ्स्तेमाल हुआ खाद्य तेल अवशिष्ट के तौर पर निकल रहा है, जिसमें से 10 लाख टन का निर्यात किया जा रहा है। अकेले 30 से 40 हजार टन तेल यूरोप को ही भेजा रहा है।

कंपनियां लगा रहीं बॉयोडीजल प्लांट
देश में इस समय कुछ ही कंपनियां बचे हुए तेल को बॉयोडीजल में बदलने का काम कर रही हैं। बंगलुरू की इको ग्रीन फ्यूल्स हर साल 1200 टन बचे हुए तेल को बॉयो डीजल में कन्वर्ट कर रही है। हरियाणा के बावल में बॉयोड एनर्जी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने रोजाना 100 टन बॉयोडीजल बनाने का प्लांट लगाया है। कालिसुवरी रिफाइनरी प्राइवेट लिमिटेड ने बॉयोडीजल प्लांट लगाया है। वहीं आस्ट्रिया की कंपनी ने मुंबई में बचे हुए तेल को एकत्रित करने का मैकेनिज्म बनाया है।

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