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चार भारतीयों का दुर्लभ खून बचाएगा बांग्लादेशी युवक की जान

Sat, 18 Jun 2016 02:23 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Sat, 18 Jun 2016 02:23 PM IST
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Four Mumbai donors's rare blood group will save Dhaka man
- फोटो : getty

करीब महीने भर पहले सड़क दुर्घटना में 25 वर्षीय बांग्लादेशी युवक कमरुज्जामन की जान पर बन आई। उसके बाएं पैर की हड्डियां तकरीबन चकनाचूर हो गईं और रीढ़ की हड्डी के नीचे का हिस्सा जवाब दे गया। ढाका स्थित अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों को उसे बचाने के लिए लगभग हाथ खड़े ही कर दिए थे। वजह थी उसका अति दुर्लभ ब्लड ग्रुप जो डॉक्टरों को पता ही नहीं था। बहुत पड़ताल के बाद ब्लड ग्रुप के बारे में पता चला तो डॉक्टरों के होश फाक्ता हो गए।

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बहुत कोशिशों के बाद पता चला कि कमरुज्जामन को बचाने के लिए दुर्लभ 'बॉबे ब्लड ग्रुप' चाहिए। ब्लड ग्रुप तो पता चल गया लेकिन दुर्लभ खून मिलता कहां से, अब ये मुसीबत उनके सामने थी।
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टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक ऑनलाइन और ऑफलाइन पड़ताल के बाद एक मुंबई बेस्ड एजीओ 'थिंक फाउंडेशन' चलाने वाले विनय सेट्टी का पता चला। कमरुज्जामन के सहकर्मी एसके तुहिनूर आलम ने तुरंत मुंबई का रुख किया और भारत में इस ब्लड ग्रुप के महज 400 लोगों में से उन 4 लोगों से संपर्क किया जिनका खून घायल मरीज की जान बचाएगा।
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स्वपना सावंत, कृष्णानंद कोरी, मेहुल भेलेकर और प्रवीण शिंदे ने बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाला एक-एक यूनिट खून दान किया।

Four Mumbai donors's rare blood group will save Dhaka man

दुर्लभ खून तो मिल गया था लेकिन अब मुसीबत थी इसे बांग्लादेश तक ले जाने की। 

कमरुज्जामन की कंपनी अरिनोबा प्लास्टिक इंडस्ट्रीज को जब ये पता चला कि वही अकेला शख्स अपने परिवार को चलाने वाला है, तो कंपनी मदद के लिए आगे आई और खून को मुंबई से बाग्लादेश ले जाने के लिए इंतजाम किया। 

एनजीओ की माने तो खास परिस्थितियों में इस खून को बाहर ले जाने के लिए लाइसेंस की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा स्टेट ब्लड ट्रांसफक्शन काउंसिल, सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन और एयर फोर्स की सुरक्षा एजेंसी डायरेक्टोरेट ऑफ हेल्थ सर्विसेज एंड सेंट्रल इंडस्ट्रिल सिक्यॉरिटी फोर्स की अनुमति लेनी पड़ती है, तब जाकर खून को ले जाया जा सकता है। 

खैर आपने वो कहावत तो सुनी ही होगी कि ''जाको राखे साईयां, मार सके न कोई...'' 

आखिरकार चार भारतीयों के चार यूनिट दुर्लभ खून को प्लास्टिक के खास डिब्बों में आइस जेल पैक में रखकर जल्द ही ढाका भेजा जाएगा। अगर संतुलित तापमान पर रखा जाए तो ये दुर्लभ खून 6 हफ्तों तक खराब नहीं होता है। भारतीयों के इस दुर्लभ खून से एक शख्स ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार को बचाया जा सकेगा।

Published By Rohit Kumar Porwal

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