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Madan B. Lokur: 'न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका का काफी दखल', शीर्ष कोर्ट के पूर्व जज

Thu, 07 Aug 2025 04:09 AM IST
दीपक कुमार शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Thu, 07 Aug 2025 04:09 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के दखल पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भी जो हालात हैं, उनमें जजों की नियुक्त को लेकर हमें कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। मुझे लगता है कि इसमें कार्यपालिका की तरफ से काफी दखल दिया जा रहा है। 

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Former SC judge Madan B. Lokur says too much interference of executive in judges appointment process
मदन बी. लोकुर, पूर्व न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर ने बुधवार को कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका का काफी दखल रहा है। उन्होंने यह बात ग्लोबल ज्यूरिस्ट्स द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में 'न्यायपालिका में नैतिकता, एक आदर्श या विरोधाभास' विषय पर बोलते समय कही। 

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न्यायाधीश लोकुर ने कहा, 'अभी जो हालात हैं, उनमें जजों की नियुक्त को लेकर हमें कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। मुझे लगता है कि इसमें कार्यपालिका की तरफ से काफी दखल दिया जा रहा है।' उन्होंने आगे कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े (एमओपी) को बहुत पहले ही अंतिम रूप दे दिया गया था, जिसे भारत सरकार के परामर्श से तैयार किया गया था। इसके बावजूद इसके कार्यान्वयन में कई तरह की समस्याएं रही हैं। 
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योग्यता से ज्यादा संबंधित जज के फैसलों का होता है असर
उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में योग्यता से ज्यादा इस बात का असर होता है कि संबंधित जज ने कौन से फैसले दिए हैं। अगर यह प्रक्रिया पूरी तरह कार्यपालिका के हाथ में होती, तो कुछ गड़बड़ हो सकती थी। उन्होंने कहा, 'आप शुरुआत में किसी व्यक्ति की नियुक्ति कर सकते हैं, और किसी वरिष्ठ व्यक्ति को लगभग छह या सात महीने तक लंबित रखा जा सकता है, ताकि वह अपनी वरिष्ठता खो दे, और यही हो रहा है। जिन उत्कृष्ट वकीलों की नियुक्ति होनी चाहिए थी, उन्हें नियुक्त नहीं किया जा रहा है।' 
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नियुक्ति प्रक्रिया को कम अस्पष्ट बनाने पर विचार-विमर्श की जरूरत
उन्होंने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया को कम अस्पष्ट बनाने पर विचार-विमर्श की आवश्यकता है। न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा, 'यह न केवल उच्च न्यायालय के कॉलेजियम या सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम की ओर से, बल्कि सरकार की ओर से भी अस्पष्ट है।' उन्होंने कहा कि वर्तमान में न्यायाधीशों के विरुद्ध दो महाभियोग प्रस्ताव लंबित हैं, एक संसद में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के विरुद्ध और दूसरा राज्यसभा सभापति के समक्ष न्यायमूर्ति शेखर यादव के विरुद्ध।

कोर्ट के फैसले आम लोगों की समझ में आने चाहिए
उन्होंने कहा कि देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि दो महाभियोग प्रस्ताव लंबित हैं। इससे साबित होता है कि हमें जजों की नियुक्ति में बहुत सावधानी बरतनी होगी और जज बनने के बाद भी उन पर निगरानी रखनी होगी। जस्टिस लोकुर ने कहा कि कोर्ट के फैसले आम लोगों की समझ में आने चाहिए। उन्होंने एक उदाहरण दिया, जिसमें एक जज ने इतनी कठिन अंग्रेजी में फैसला लिखा कि जज खुद भी उसे नहीं समझ पाए, और वकीलों को भी समझ नहीं आया।


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बिना वजह जजों का कर दिया जाता है तबादला
जजों के ट्रांसफर पर उन्होंने कहा कि कई बार बिना कोई वजह बताए जजों का इधर-उधर तबादला कर दिया जाता है। उन्होंने 2020 के दिल्ली दंगों का उदाहरण दिया, जब जस्टिस एस. मुरलीधर का अचानक तबादला कर दिया गया था, क्योंकि उन्होंने सरकार के खिलाफ एक आदेश पारित किया था। रिटायरमेंट के बाद जजों को दिए जाने वाले पदों पर भी उन्होंने चिंता जताई। उन्होंने कहा कि एक पूर्व चीफ जस्टिस को राज्यसभा की सीट दी गई, एक और जज को राज्यपाल बना दिया गया, और तीसरे को भी किसी राज्य का राज्यपाल बना दिया गया।

कुछ जज रिटायर होने के बाद राजनीति में हो जाते हैं शामिल
उन्होंने कहा कि कुछ जज रिटायर होने के तुरंत बाद राजनीति में शामिल हो जाते हैं, और एक ऐसे जज भी रहे हैं जिन्होंने जज पद से इस्तीफा देकर चुनाव लड़ा और सांसद बन गए। अंत में उन्होंने कहा कि इन सभी मामलों को गंभीरता से देखने और सुधार की जरूरत है।

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