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PIL के जरिए न्यायपालिका की तस्वीर बदलने वाले जस्टिस पीएन भगवती नहीं रहे
एजेंसी/ नई दिल्ली
Updated Fri, 16 Jun 2017 03:58 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती का बृहस्पतिवार को निधन हो गया। वह 95 वर्ष के थे। मूल रूप से गुजराती जस्टिस भगवती का भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा योगदान जनहित याचिका (पीआईएल) है। आम लोगों को 1986 में मिले पीआईएल के अधिकार ने देश में न्यायपालिका की तस्वीर बदल दी। न्यायिक सक्रियता का युग यहीं से शुरू हुआ। ताजमहल के संरक्षण से लेकर शहरों की सफाई तक हजारों मामलों पर न्यायपालिका ने ऐतिहासिक फैसले सुनाए।
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जस्टिस भगवती देश के 17वें मुख्य न्यायाधीश थे। उन्होंने 12 जुलाई 1985 से 20 दिसंबर 1996 तक बतौर चीफ जस्टिस सेवा दी थी। पीआईएल को 1986 में समाज के पिछड़े और सुविधाहीन लोगों के हितों की रक्षा के उद्देश्य से पेश किया गया था। उनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने देश की विभिन्न जेलों से 40,000 विचाराधीन कैदियों को रिहा करने का फैसला सुनाया था। इसके बाद से यह न्यायिक व्यवस्था का अहम हिस्सा बन चुका है।
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इंदिरा गांधी के शासनकाल के दौरान घोषित आपातकाल में वह ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ केस से संबंधित पीठ का हिस्सा थे और इस मामले में अपने विवादित फैसले को लेकर भी खासे चर्चा में रहे। हालांकि 1976 के इस फैसले को 30 साल बाद उन्होंने ‘कमजोर कृत्य’ करार दिया था। प्रख्यात अर्थशास्त्री जगदीश भगवती और न्यूरो सर्जन एस.एन. भगवती उनके भाई हैं। जस्टिस भगवती की 3 बेटियां हैं। मुंबई के एलफिंसटन कॉलेज से अर्थशास्त्र रहे भगवती 1942 भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल में भी रहे।
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30 वर्ष बाद माफी मांगी
जस्टिस भगवती ने इमरजेंसी के दौरान 1996 बंदी प्रत्यक्षीकरण की एक रिट पर फैसला सुनाया कि इमरजेंसी लागू होने के दौरान किसी भी व्यक्ति को गैरकानूनी गिरफ्तारी के खिलाफ मिले संवैधानिक अधिकार निलंबित रहता है। उन्होंने अपने इस फैसले के लिए 30 वर्ष बाद माफी मांगी।