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महाराष्ट्र संकटः बड़े भाई की दावेदारी पर छूटा तीन दशक पुराना साथ

Tue, 12 Nov 2019 03:09 AM IST
संजीव कुमार झा हिमांशु मिश्र, अमर उजाला
हिमांशु मिश्र, अमर उजाला Published by: संजीव कुमार झा Updated Tue, 12 Nov 2019 03:09 AM IST
सार

  • भाजपा को हिंदुत्व का अकेला दावेदार होने का लाभ मिलने का भरोसा
  • भाजपा को उम्मीद शिवसेना की नए साथियों से ज्यादा देर तक नहीं निभेगी

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For cm post Shiv sena broke alliance from bjp in maharashtra
अमित शाह-उद्धव ठाकरे - फोटो : PTI

विस्तार

महाराष्ट्र में अंतत: भाजपा और शिवसेना की तीन दशक पुरानी दोस्ती टूट गई। दरअसल भाजपा सूबे में किसी भी कीमत पर बड़े भाई की भूमिका छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी, जबकि शिवेसना छोटे भाई की भूमिका से खुद को दूर करना चाहती थी।

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भाजपा का मानना है कि शिवसेना के एनसीपी-कांग्रेस के साथ जाने से राज्य में हिंदुत्व की राजनीति की वह अकेले दावेदार बनकर उभरेगी और शिवसेना को विपरीत विचारधारा वाले दलों से दोस्ती का खामियाजा भुगतना होगा।
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दरअसल भाजपा शिवसेना का सीएम बना कर सूबे में उसके फिर से बड़ा भाई बनने की संभावना को जीवित नहीं करना चाहती थी। शिवसेना को छोटा भाई बनाने के लिए भाजपा ने करीब छह साल तक लगातार कोशिश की थी।

जबकि शिवसेना के वरिष्ठ नेताओं का मानना था कि दूसरी बार छोटे भाई की भूमिका में आने के बाद भविष्य में उसके लिए सूबे में भाजपा का बड़ा भाई बनने की संभावना हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। यही कारण है कि शिवसेना ने पहले सीएम पद के लिए जिद की और बाद में इस पद के लिए कांग्रेस-एनसीपी से समझौता करने तक से परहेज नहीं किया।

अकेले बढ़ेगी ताकत?

भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि सूबे में अकेले आगे बढ़ने से पार्टी की ताकत बढ़ेगी। चूंकि शिवसेना के एनसीपी-कांग्रेस से समझौता करने के बाद हिंदुत्व की राजनीति करने वाली वह सूबे में अकेली पार्टी बन गई है। एनसीपी-कांग्रेस के साथ शिवसेना को लगातार हिंदुत्व के मुद्दे पर सरकार बचाने के लिए समझौते करने होंगे, जबकि भाजपा ऐसे मुद्दों को लगातार हवा देगी। वैसे भी लोकसभा और विधानसभा के दो-दो चुनावों में शिवसेना से अधिक वोट और सीट ला कर उसने राज्य में खुद के बड़ा भाई होने की धारणा बना दी है। बीते विधानसभा चुनाव में अकेले चुनाव मैदान में उतर कर पार्टी सबसे अधिक सीट जीत चुकी है।

 
सरकार लंबी चली तो बढ़ेगी परेशानी

रणनीतिकारों का यह भी मानना है कि अगर सरकार चलाने में विवाद नहीं हुआ और कार्यकाल लंबा खिंचा तो भाजपा के लिए मुश्किलें आ सकती हैं। पूरे कार्यकाल तक सरकार चलने पर तीनों दल अगले चुनाव में सीट बंटवारे का फार्मूला भी निकाल लेंगे। इससे तीनों दलों की संयुक्त ताकत भाजपा पर भारी पड़ सकती है।
 

नेतृत्व परिवर्तन पर नहीं झुकी भाजपा

शिवसेना से मतभेद के दौरान एक अवसर ऐसा भी आया था जब दोनों दलों के बीच समझौता हो सकता था। शिवसेना ने नेतृत्व परिवर्तन की शर्त पर सीएम पद नहीं मांगने का संकेत दिया था। हालांकि भाजपा नेतृत्व ने शिवसेना की मांग को ठुकरा कर अगले आगे बढ़ने का फैसला किया।


 
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