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Hindi News ›   Entertainment ›   Bollywood ›   Film Review- box office movie 'Aamir and Dangal the Dangal'

फिल्म रिव्यू- बॉक्स ऑफिस पर 'आमिर और छोरियों का दंगल'

Thu, 22 Dec 2016 06:24 PM IST
सुशांत एस मोहन / बीबीसी संवाददाता, मुंबई
सुशांत एस मोहन / बीबीसी संवाददाता, मुंबई Updated Thu, 22 Dec 2016 06:24 PM IST
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Film Review- box office movie 'Aamir and Dangal the Dangal'
बॉलीवुड में साल 2016 में रिलीज होने वाली कुश्ती पर बनी अब तक की बेहतरीन फिल्म है 'दंगल।' ये अच्छा सामाजिक संदेश देती है और अभिनय-अभिनेताओं के मामले में भी इस साल की सबसे दुरुस्त फिल्म है। निर्देशक नितेश तिवारी की इस शॉर्ट और क्रिस्प फिल्म के साथ अभिनेता आमिर खान लगभग दो साल बाद पर्दे पर वापसी कर रहे हैं और मिस्टर परफेक्शनिस्ट की ये वापसी कमाल की रही है।
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इस फिल्म के ट्रेलर की खासी प्रशंसा की जा रही थी और फिल्म ट्रेलर से कई गुना बेहतर निकली। भारतीय कुश्ती में महिला पहलवानी को नए मयार पर पहुँचाने वाले फोगाट परिवार की असल जिंदगी पर बनी इस फिल्म को एक डॉक्यू-ड्रामा भी कहा जा सकता है। लेकिन ये किसी डॉक्यू-ड्रामा सी गंभीर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और एक्शन और देशभक्ति से भरा-पूरा पैकेज है।
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राष्ट्रीय कुश्ती के चैंपियन रहे पहलवान महावीर फोगाट का एक ही सपना है कि देश के लिए कुश्ती में एक गोल्ड मेडल न जीत पाने के सपने को उनका बेटा पूरा करे। लेकिन हरियाणा के एक गाँव में महावीर फोगाट के घर, एक के बाद एक चार बेटियां जन्म लेती हैं। उन्हें लगने लगता है कि उनका सपना टूट जाएगा। लेकिन फिर एक विचित्र घटना के बाद वो अपनी बेटियों को ही पहलवान बनाने की कोशिश करने लगते हैं और यही बेटियां आगे चलकर फोगाट परिवार का सुनहरा इतिहास लिखती हैं। 
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Film Review- box office movie 'Aamir and Dangal the Dangal'
बेटियां, बेटों से कम नहीं होती हैं! आमिर की इस फिल्म का मैसेज साफ और सीधा है- 'भारत से लैंगिक भेदभाव मिट जाए तो भारतीय महिलाएं भी इतिहास रच सकती हैं।' इस फिल्म में महावीर फोगाट का किरदार निभाने वाले आमिर खान का अपने वजन को बढ़ाना और घटाना तो पहले से ही चर्चा में है। एक हरियाणवी, अधेड़ उम्र के पहलवान के कड़कमिजाज लेकिन साफदिल किरदार के साथ वो खासा न्याय करते हैं। आमिर के अलावा भी फिल्म में पर्दे पर आए एक एक किरदार ने अपनी भूमिका को कमाल का जिया है।

सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं पहलवान गीता और बबीता के बचपन का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री जायरा वसीम (गीता) और सुहानी भटनागर (बबीता)। इन दोनों ही लड़कियों ने जिस तरह हरियाणवी बोल चाल के तरीके को अपनाया है और फिल्म के रोल के लिए न सिर्फ बाल कटवाए, बल्कि कड़ी फिजिकल ट्रेनिंग भी की है - वो पर्दे पर दिखाई देती है। फिल्म के निर्देशक नितेश कहीं भी फिल्म से अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देते और दृश्यों को बेवजह खींचते नहीं हैं।

उन्होनें एक एक दृश्य में अभिनय से लेकर बोली, पीछे दिखने वाली पृष्ठभूमि और समय (टाईम फ्रेम) का खासा ध्यान रखा है। फिल्म के क्लाईमैक्स में दिखाए गए कुश्ती के दृश्यों में तो निर्देशक और कलाकारों के इस खेल को समझने और फिल्माने की तकनीक़ दिल जीत लेती है। यह जानते हुए भी कि फिल्म में गीता फोगाट के जीवन को दिखाया जा रहा है और वो अंत में गोल्ड मेडल जीत ही लेंगी,

Film Review- box office movie 'Aamir and Dangal the Dangal'

आप फिल्म के अंतिम दृश्यों में अपनी कुर्सियों के किनारों पर आ जाते हैं। फिल्म में देशभक्ति का भी जबर्दस्त तड़का है और इस फिल्म को देख रहे दर्शक स्वर्ण जीतने वाले सीन के बाद बजने वाले राष्ट्रगान पर तालियां बजाते हुए उठ खड़े होते हैं।

इसी साल कुश्ती पर आई फिल्म सुल्तान की इस फिल्म से काफी तुलना की जा रही थी क्योंकि यह दोनों ही फिल्में पहलवानी की पृष्ठभूमि पर बनी है। लेकिन दंगल के पहले कुछ दृश्य देखते ही आपको समझ आ जाता है कि 'सुल्तान' एक मसाला फिल्म थी और 'दंगल' कुश्ती की बारीकियों को दिखाती हुई फिल्म है।

सुल्तान में सलमान जहां कोशिश कर के भी ठीक से हरियाणवी नहीं बोल पा रहे थे वहीं आमिर ने इस बार खड़ी बोली के लहजे को अच्छे से पकड़ लिया है और वो एक देहाती पहलवान लगते हैं। अगर खेल पर बनी किसी फिल्म से तुलना करें तो इसी साल आई फिल्म 'एम एस धोनी' भी 'दंगल' के सामने नहीं ठहरती, क्योंकि एम एस धोनी में धोनी की लव लाईफ और निजी जिंदगी के बारे में बातें तो थीं, मगर खेल की बारीकियां नहीं थीं। 

Film Review- box office movie 'Aamir and Dangal the Dangal'
आमिर का दंगल लुक - फोटो : ANI
वहीं दंगल आपको कुश्ती के अंदर तक ले जाती है, वो नियमों की बात करते हैं, खेल की राजनीति की बात करते हैं, पहलवानों की जिंदगी की कठिनाइयों से रुबरू करवाते हैं और अगर आप कभी पहलवानी या हरियाणा से संबंधित रहे हैं

 तो इस फिल्म में डूब जाएंगे। फिल्म का सबसे अच्छा भाग है कि यह फिल्म पुरुष प्रधान समाज के अनुसार नहीं चलती है, जहां हीरो गुंडो को उड़ाता हुआ एक बेबस लड़की को बचाता है। ये महिलाओं को बराबरी के दर्जे पर रखती है साथ ही समाज पर इस बराबरी का क्या असर पड़ता है, इसे दिखाती है।

फिल्म को साढ़े चार स्टार - पहला कमाल की कहानी और थीम के लिए, दूसरा जीवंत अभिनय के लिए, तीसरा जबरदस्त फिल्मांकन और निर्देशन के लिए, चौथा अमिताभ भट्टाचार्य के कमाल के गीत संगीत के लिए और आधा स्टार इस फिल्म में लगी जीतोड़ मेहनत के लिए, जो पर्दे पर दिखती है।
 
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