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Report: फास्ट ट्रैक कोर्ट में जल्दी मिल रहा यौन अपराध से जुड़े मामलों में न्याय, दावा- 2023 में 94% केस निपटे

Wed, 11 Sep 2024 04:51 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: बशु जैन Updated Wed, 11 Sep 2024 04:51 PM IST
सार

रिपोर्ट के मुताबिक फास्ट ट्रैक कोर्ट में 2022 में जहां 83 फीसदी और 2023 में 94 फीसदी मामलों का निपटारा किया गया। वहीं अन्य भारतीय अदालतें यौन शोषण से जुड़े अपराध के महज 10 फीसदी मामलों का निपटारा कर सकीं।

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Fast track court is providing quick justice in csexual crimes, claim  94% cases will be resolved
अदालत ने निपटाए मामले (सांकेतिक) - फोटो : ANI

विस्तार

यौन शोषण से जुड़े अपराधों में तेजी से न्याय दिलाने के लिए शुरू किए गए फास्ट ट्रैक कोर्ट पीड़ितों की बड़ी मदद कर रहे हैं। यहां पीड़ितों को जल्द से जल्द न्याय मिल रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक फास्ट ट्रैक कोर्ट में 2022 में जहां 83 फीसदी और 2023 में 94 फीसदी मामलों का निपटारा किया गया। वहीं अन्य भारतीय अदालतें यौन शोषण से जुड़े अपराध के महज 10 फीसदी मामलों का निपटारा कर सकीं।

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इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन एनजीओ की रिपोर्ट फास्ट ट्रैकिंग जस्टिस: केस बैकलॉग को कम करने में फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों की भूमिका में फास्ट ट्रैक कोर्ट की कार्रवाई का जिक्र किया गया है।  रिपोर्ट में फास्ट ट्रैक कोर्ट के सकारात्मक प्रभाव को दिखाया गया है। साथ ही न्यायिक प्रणाली की चुनौती भी दिखाई गई है।
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रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त 2024 तक देश में 1023 निर्धारित अदालतों में से 410 विशिष्ट पॉक्सो अदालतों सहित कुल 755 फास्ट ट्रैक कोर्ट कार्यरत हैं। 2019 में फास्ट ट्रैक कोर्ट शुरू होने के बाद से दुष्कर्म और पॉक्सो के 4,16,638 मामले दर्ज किए गए। इनमें से कुल 2,14,463 यानि 52 प्रतिशत मामलों का निपटारा किया गया।
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महाराष्ट्र में 80 प्रतिशत और पंजाब 71 प्रतिशत समेत सबसे ज्यादा मामले निपटाए गए। जबकि पश्चिम बंगाल में सबसे कम 2 प्रतिशत मामलों का निपटारा हो सका। रिपोर्ट में बताया गया कि पश्चिम बंगाल में लक्ष्य के 123 फास्ट ट्रैक कोर्ट में से केवल तीन कोर्ट ही काम कर रही हैं। इसलिए यहां मामलों को निपटाने की दर कम रही। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2023 में दुष्कर्म और पॉक्सो के 81,471 नए मामले दर्ज किए गए। फास्ट ट्रैक कोर्ट ने इनमें से 76,319 मामलों का निपटारा किया। जबकि फास्ट ट्रैक कोर्ट से विपरीत देश की अन्य अदालतों में दुष्कर्म और पॉक्सो के महज 10 फीसदी मामले ही निपटाए जा सके। 

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि बैकलॉग को खत्म करने के लिए अदालतों को हर तीन मिनट में एक मामले को हल करना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ और ज्यादा फास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं शुरू किए गए तो बैकलॉग से उबरना संभव नहीं होगा। रिपोर्ट में सरकार से शेष फास्ट ट्रैक कोर्ट को क्रियाशील बनाने और बैकलॉग को दूर करने के लिए 1,000 अतिरिक्त अदालतों की स्थापना की मांग की गई। कहा गया कि निर्भया फंड में प्रयोग नहीं हो सके 1700 करोड़ रुपये दो वर्ष तक नई अदालतों को चला सकते हैं। 

बाल अधिकार कार्यकर्ता और बाल विवाह मुक्त भारत के संस्थापक भुवन रिभु ने कहा कि बैकलॉग को निपटाना बहुत जरूरी है। रिपोर्ट में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 289 और 359 के सख्त पालन की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है। डाटा से पता चलता है कि 2022 में ऐसे सैकड़ों मामलों का समझौता के जरिये समाधान किया गया। 


रिपोर्ट में न्यायिक बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण के महत्व पर प्रकाश डाला गया। इसमें अदालत कक्ष में तकनीक को मजबूत करने और पीड़ितों के लिए गवाह बयान केंद्र (वीडब्ल्यूडीसी) की स्थापना करना शामिल है। 

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