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दस साल बाद मिली सिंगुर के किसानों को अपनी जमीन

Thu, 20 Oct 2016 10:16 PM IST
रीता तिवारी/ सिंगुर (हुगली)
रीता तिवारी/ सिंगुर (हुगली) Updated Thu, 20 Oct 2016 10:16 PM IST
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Farming resumes in Singur after a decade
- फोटो : PTI

पश्चिम बंगाल में हुगली जिले के सिंगुर के किसानों को 10 साल तक उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच झूलने के बाद बृहस्पतिवार को आखिर अपनी जमीन वापस मिल ही गई। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जमीन लौटाने की कवायद शुरू करते हुए आज पहले चरण में लगभग तीन सौ किसानों को उनकी 100 एकड़ जमीन सौंप दी। राज्य की पूर्व वाममोर्चा सरकार ने वर्ष 2006 में टाटा की लखटकिया नैनो परियोजना के लिए इस जमीन का अधिग्रहण किया था। 

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दो महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने जमीन के अधिग्रहण के अवैध ठहराते हुए उसे खारिज कर दिया था और किसानों को उनकी जमीन लौटाने का निर्देश दिया था। तब ममता ने कहा था कि सरकार खेती लायक बनाने के बाद ही जमीन लौटाएगी। आज जो जमीन लौटाई गई है वह पूरी तरह खेती लायक है। मुख्यमंत्री ने खुद कई खेतों में सरसों के बीच डाल कर नए सिरे से उनमें खेती की शुरुआत की। इस मौके पर आयोजित समारोह में मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार ने आज से किसानों को उनकी जमीन लौटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। उन्होंने कहा कि 10 नवंबर तक सभी 997 एकड़ जमीन को उनके मालिकों को सौंप दिया जाएगा।
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इलाके में खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने किसानों को मुफ्त बीज और खाद देने का फैसला किया है। आज जिन लोगों को जमीन सौंपी गई उनको खाद व बीज भी सौंपे गए। ममता ने कहा कि इस जमीन पर सरसों के बाद आलू की खेती हो सकती है। हुगली जिले पूरे बंगाल में अपने आलू के  लिए मशहूर है। मुख्यमंत्री ने कहा कि कल से रोजाना पचास एकड़ के हिसाब से खेत उनके मालिकों को सौंपे जाएंगे। इसके लिए सिंगुर में पांच मंच बनाए गए हैं।

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जमीन मिलने से किसान गदगद

Farming resumes in Singur after a decade

राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि कुल 997 एकड़ अधिग्रहीत जमीन में से लगभग 80 फीसदी को खेती लायक बना दिया गया है। बाकी काम भी शीघ्र पूरा हो जाएगा। दूसरी ओर, दस साल बाद अपने खेत वापस मिलने की वजह से सिंगुर के किसानों में भारी उत्साह है। गोपाल नगर के एक किसान देवज्योति दास कहते हैं कि हमने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी। खासकर यह मामला जब सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा तो हमें लगा कि इस पर फैसला आने तक हमारी कई पीढ़ियां गुजर जाएंगी। लेकिन अदालत में शीघ्र फैसला सुनाया और सरकार ने भी दो महीने के भीतर खेत हमें सौंप दिए।  

73 साल की देवारती के लिए तो एक बीघे खेत ही उनके पति की आखिरी निशानी थी, वह कहती हैं कि टाटा का कारखाना लगने की बात सुन कर इलाके के उज्जवल भविष्य के बारे में सोच कर उनके पति ने अपना खेत बेच दिया था। लेकिन न कारखाना लगा और न ही खेत मिला। मुझे तो लग रहा था कि अब मैं अपने जीवन में इस खेत को कभी अपना नहीं कह सकूंगी। लेकिन भला हो अदालत का जिसने मेरे पति की आखिरी निशानी मुझे सौंप दी। इलाके के दूसरे लोगों में भी इसी तरह उत्साह का माहौल है।

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