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किसान आंदोलन: अगर 'कप्तान' की वजह से जहाज डूबा तो कौन बनेगा भाजपा का 'राजीव गांधी' और 'वीपी सिंह'?

Thu, 18 Feb 2021 04:52 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 18 Feb 2021 04:52 PM IST
सार

राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तो बोफोर्स के चलते पार्टी की छवि खराब हो रही थी। इस वजह से अरुण नेहरू, मो. आरिफ खान, सत्यपाल सिंह मलिक और वीपी सिंह ने पार्टी से किनारा कर लिया था। बाद में वीपी सिंह तो प्रधानमंत्री पद तक पहुंच गए थे...

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Farmers protest: Political expert says, Movement has been crossed delhi border but government still stiff on revoke of farm bills
Rakesh Tikait - फोटो : PTI (फाइल फोटो)

विस्तार

किसान आंदोलन रोजाना आगे बढ़ता जा रहा है। अब ये आंदोलन दिल्ली की सीमाओं से बाहर निकल चुका है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार अभी अपने स्टैंड पर कायम है। कृषि कानून वापस नहीं होंगे। आंदोलनकारी किसानों को समझाया जाएगा कि ये कानून उनके हित में हैं। जेएनयू में समाजशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर और राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. आनंद कुमार कहते हैं, किसान आंदोलन अब कई तरह की करवटें लेने लगा है। दोनों पक्ष अपनी बात पर अड़े हैं।

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यह तय है कि किसान आंदोलन में केंद्र सरकार रूपी जहाज अगर कैप्टन की वजह से डूबता है तो नाविकों में बगावत की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। उसके बाद भाजपा का 'राजीव गांधी' और 'वीपी सिंह' कौन बनेगा, ये वक्त बताएगा। भाजपा ये सोच रही है कि बंगाल जीत गए तो किसान आंदोलन के नुकसान की भरपाई हो जाएगी। उसे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अब किसान आंदोलन गाजीपुर से बाहर निकल चुका है।
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डॉ. आनंद कुमार ने किसान आंदोलन और भाजपा की मौजूदा स्थिति को लेकर अमर उजाला डॉट कॉम से खास बातचीत की है। उन्होंने कहा, किसी भी आंदोलन के कई पड़ाव होते हैं। उसका नेतृत्व बदला जाए, मुद्दा बदल जाए, नरमपंथी या गरमपंथी जैसा कोई जुड़ाव हो जाए या वह आंदोलन व्यापक स्तर पर जनता के बीच पहुंच जाए। जब ऐसी स्थिति होती है, तो वह आंदोलन बरसाती नदी का रूप ले लेता है। अनुकूल अवसर पर उसके दोबारा से खड़े होने की संभावना बनी रहती है। आंदोलन तेज होता है और सरकार का आधार कमजोर पड़ता है, तो वह सरकार के लिए चेतावनी होती है। जैसे गंभीर रोगी को डॉक्टर बता देते हैं कि वह मृत्यु पूर्व स्थिति में है। हालांकि सर्जरी या ट्रांसप्लांट जैसा कुछ हो तो स्थिति संभाली जा सकती है। किसान आंदोलन के दौरान केंद्र सरकार के लिए भी कुछ ऐसी ही स्थिति बन रही है।

सरकार की सोच है कि किसान आंदोलन पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब तक बिखरा हुआ है। इसके राजनीतिक नुकसान की भरपाई पश्चिम बंगाल के चुनाव में हो जाएगी, अगर जीत गए तो। बंगाल की जीत हुई तो भाजपा अपने मौजूदा कृषि कानूनों के स्टैंड को साबित करने का प्रयास करेगी। डॉ. आनंद कुमार के मुताबिक किसी भी पार्टी को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि मुसीबत के समय जहाज के कैप्टन पर बड़ी जिम्मेदारी रहती है।

वजह, कैप्टन की जिद्द या गलती के चलते जहाज डूबता है तो बाकी के नाविकों में बगावत की संभावना बन जाती है। भाजपा की सहयोगी पार्टी रही अकाली दल के साथ अब दूरी बन चुकी है। जेडीयू के साथ जो संबंध नजर आ रहा है, उसकी भाषा अलग है। किसानों की नाराजगी का नतीजा पंजाब के स्थानीय निकाय चुनावों में दिख गया है। उससे पहले हरियाणा में विधानसभा की एक सीट का नतीजा भाजपा के विपरित रहा। बाद में कुछ सीटों पर हुए स्थानीय निकाय चुनाव में भी मनोहरलाल सरकार को मुंह की खानी पड़ी। ऐसे में बंगाल नहीं जीत सके तो पार्टी में बगावती सुर उठ सकते हैं।

इस तरह के बदलते राजनीतिक हालात में यह सोचा जाएगा कि भाजपा में राजीव गांधी या वीपी सिंह कौन बनेगा। राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तो बोफोर्स के चलते पार्टी की छवि खराब हो रही थी। इस वजह से अरुण नेहरू, मो. आरिफ खान, सत्यपाल सिंह मलिक और वीपी सिंह ने पार्टी से किनारा कर लिया था। बाद में वीपी सिंह तो प्रधानमंत्री पद तक पहुंच गए थे। डॉ. आनंद कुमार कहते हैं कि अगर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की जिद के कारण किसान आंदोलन खत्म नहीं होता है, तो इस पार्टी के कई नेता खुद को राजनीतिक पटल पर आगे ला सकते हैं।


किसान आंदोलन की मौजूदा स्थिति को लेकर राजनीतिक विशेषज्ञ डॉ. कुमार ने कहा, अब ये आंदोलन गाजीपुर से बाहर निकल चुका है। आंदोलन का स्वरूप भी बदल रहा है। ये वही आंदोलन था, जो गणतंत्र दिवस पर लोगों की नजर में एक बुरे सपने वाली स्थिति में आ गया था। ऐसा लग रहा था कि अब सब कुछ खत्म हो गया है, लेकिन आंदोलन के नेताओं ने 15 दिन के भीतर अपनी खोई हुई जमीन वापस ले ली।

किसान नेताओं ने लालकिले पर हुए उपद्रव को लेकर लोगों से माफी मांग ली। साथ ही कह दिया कि हमारा उपद्रवियों से कोई लेना-देना नहीं है। अब पुलवामा या कारगिल जैसा कुछ अप्रत्याशित हो जाए तो ही आंदोलन पर ब्रेक लग सकता है, अन्यथा यह गतिमान रहेगा। इसके नेताओं को बहुत संभलकर चलना होगा। धीरज और मध्यम मार्ग का ख्याल रखना पड़ेगा। किसान संगठनों को देखना होगा कि समाज में आंदोलन के प्रति गलत भावना न पनपे। हालांकि अब किसान नेता ऐसा कुछ नहीं करेंगे, जिसका आंदोलन पर प्रतिकूल असर पड़े। किसान नेता, अब आम लोगों को साथ लेने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

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