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किसान आंदोलन की अंतर्कथाः क्यों बुलानी पड़ी बैठक, कहां बिगड़ी बात, जानिए पूरी कहानी

Wed, 09 Dec 2020 11:54 AM IST
Amit Mandal हरि वर्मा
हरि वर्मा Published by: Amit Mandal Updated Wed, 09 Dec 2020 11:54 AM IST
सार

  • सरकार और आंदोलनकारी किसान नेताओं के बीच गतिरोध बरकरार
  • बुधवार को किसान नेताओं से सरकार की छठे दौर की बातचीत होनी थी
  • सरकार किसान संगठनों को नए सिरे से लिखित प्रस्ताव देगी
  • किसान नेता तीनों नए कृषि कानूनों को वापस लेने पर अड़े रहे

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Farmers protest: Know the inside story of how meeting between Amit shah and farmer leaders
गृह मंत्री अमित शाह से मिलने पहुंचे किसान नेता - फोटो : आईसीएआर

विस्तार

नए कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन की समाप्ति की राह फिलहाल दिखाई नहीं पड़ रही है। सरकार और आंदोलनकारी किसान नेताओं के बीच गतिरोध बरकरार है। किसानों के शिष्टमंडल को जब अनौपचारिक बातचीत के लिए गृहमंत्री अमित शाह ने बुलाया, तो मंगल की उम्मीद जगी थी।

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भारत बंद के बाद अब नौ दिसंबर इस आंदोलन के लिए अहम हो सकता है। बुधवार को आंदोलनकारी किसान नेताओं से सरकार की छठे दौर की औपचारिक बातचीत होनी थी जो टल गई है। लेकिन सरकार किसान संगठनों को अब तक की बातचीत के बाद नए सिरे से लिखित प्रस्ताव देगी।
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बुधवार को ही मोदी कैबिनेट की बैठक है और इसी दिन विपक्षी दलों का शिष्टमंडल राष्ट्रपति से मिलने वाला है। सरकार के नरम रवैये के बाद भी किसान नेताओं के तीनों नए कृषि कानूनों को वापस लेने पर अड़ने के कारण बुधवार की बातचीत पर ब्रेक लग गया।
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बैठक रही बेनतीजा
मंगलवार को गृह मंत्री अमित शाह के अलावा कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर, वाणिज्य व रेल मंत्री पीयूष गोयल की किसान जत्थेबंदियों के 13 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ करीब दो घंटे मैराथन बैठक चली। बैठक से निकल कर क्रांतिकारी किसान यूनियन के डॉ. दर्शनपाल और भाकियू एकता डकौंदा के बूटा सिंह बुर्जगिल ने बताया कि अमित शाह के साथ अनौपचारिक बैठक बेनतीजा रही।

गृह मंत्री शाह ने किसान जत्थेबंदियों को कहा, तीन कानूनों की वापसी को छोड़कर बाकी मुद्दों पर पहले बात की जाए। कुछ मुद्दों पर हल पहले ही निकल चुका है। इस पर किसान नेताओं ने कहा, पहले भी कई मुद्दों पर कई दौर की बात हो चुकी है लेकिन अब तक सरकार की ओर से लिखित प्रस्ताव नहीं मिला है।

सूत्र बताते हैं कि शाह की तरफ से आश्वासन दिया गया कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की लिखित गारंटी, पराली जलाने पर एक करोड़ जुर्माने को न्यूनतम करने, 2020 बिजली में आंशिक बदलाव समेत चार बड़ी आपत्तियों पर संशोधन को सहमत है, लेकिन किसान नेताओं का शिष्टमंडल अड़ा रहा कि जब तक तीनों कानून वापस नहीं ले लिए जाते, तब तक वह नहीं मानेंगे। फिर बात यहीं अटक गई।

अंतर्कथा

सवाल, आखिरकार अचानक मंगलवार को अमित शाह के साथ किसान नेताओं की बैठक क्यों और कैसे? दरअसल, पांचवें दौर की पिछली बातचीत में यह तय हुआ था कि सरकार अगली वार्ता से पहले किसान नेताओं को यह संकेत देगी कि उनकी किन मांगों पर कैसे संशोधन या विचार हो रहा है। इसके लिए सरकार ने 7 दिसंबर की तारीख मुकर्रर की। यह डेडलाइन बीत गई।

सरकार की तरफ से किसान संगठनों को कोई संकेत नहीं मिले। भाकियू क्रांतिकारी के डॉ. दर्शनपाल कहते हैं कि सरकार का लिखित प्रस्ताव अब तक नहीं मिला। उधर, सरकार की ओर से कहा गया कि किसानों की ओर से जो एतराज आना था, नहीं मिले। डॉ. दर्शनपाल कहते हैं कि किसानों ने पहले ही दिन अपनी मांगें रख दीं और पिछली बातचीत तक यही कहा था कि कानून वापस लेंगे या नहीं।

दरअसल, सरकार के साथ-साथ आंदोलनकारी किसान नेताओं की नजरें 8 दिसंबर के भारत बंद पर टिकी रहीं। 22 विपक्षी दलों के समर्थन के बाद भारत बंद का पंजाब में तो व्यापक असर दिखा लेकिन बाकी हिस्सों में आंशिक या मिलाजुला। सरकार ने बंद के दौरान आम लोगों व किसानों के साथ-साथ विपक्ष और आंदोलनकारी किसानों की ताकत को भांपा। जिन 22 दलों ने सरकार के नए कृषि कानून के विरोध में आंदोलनरत किसान संगठनों का साथ दिया, ये विपक्षी दल पहले भी कई मुद्दों पर मोदी सरकार के खिलाफ ‘एकजुट’ होते रहे हैं।

पांचवें दौर की बातचीत के बाद जब किसान संगठनों ने 8 तारीख को बंद बुला लिया और 7 तारीख की डेडलाइन खत्म होने के बाद भी सरकार की ओर से कोई संकेत (मांगों पर विचार या संशोधन के लिखित प्रस्ताव) नहीं मिले, तो गतिरोध दूर कर मंगलवार की शाम की बातचीत के दरवाजे खुलवाने में भाकियू (यूपी) के राकेश टिकैत ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई।

किसानों के इस संघर्ष में अकेले पंजाब की 32 जत्थेबंदियां भले मजबूती से डटी हैं लेकिन देश भर के पांच सौ से अधिक किसान संगठनों के अखिल भारतीय संयुक्त किसान मोर्चा के रणनीतिकार योगेंद्र यादव को इस बातचीत का हिस्सा न बनने की पहली शर्त थी। शुरू में गृह मंत्री शाह ने बातचीत वाले शिष्टमंडल में केवल पांच प्रतिनिधियों को ही रखने को कहा। किसान जत्थेबंदियां इस पर राजी नहीं हुईं। फिर संख्या 11 से जाकर अंततः 13 पर टिकी। 

पहले तय हुआ कि बैठक अमित शाह के आवास पर होगी लेकिन बाद में गेस्ट हाउस में बैठक के लिए किसान नेताओं को अलग-अलग वाहनों से ले जाया गया। शाह के साथ इस अनौपचारिक बैठक में शामिल किसान नेताओं की संख्या 13 थी। इनमें अकेले पंजाब के 9 किसान नेता थे। एक उत्तर प्रदेश और एक हरियाणा के। पंजाब के 9 किसान नेताओं में दो बलवीर सिंह राजेवाल (भाकियू राजेवाल, पंजाब) कांग्रेस के हिमायती हैं तो हरिंदर सिंह लखोवाल (भाकियू लखोवाल, पंजाब) अकाली दल के हिमायती हैं।

बाकी के सात नेताओं में डा. दर्शन पाल (क्रांतिकारी किसान यूनियन, पंजाब) कुलवंत सिंह संधू (जम्हुरी किसान सभा, पंजाब), बूटा सिंह बुर्जगिल (भाकियू एकता डकौंदा, पंजाब), जगजीत सिंह धल्लेवाल (भाकियू एकता सिद्धूपुर), बोघ सिंह मानसा (भाकियू मानसा, पंजाब), रुलदु सिंह मानसा (पंजाब किसान यूनियन, पंजाब), मंजीत सिंह राय कादियां (भाकियू कादियां, पंजाब) शामिल हैं। इनके अलावा उत्तर प्रदेश से भाकियू के राकेश टिकैत और हरियाणा से गुरनाम सिंह चढ़ूनी (कुरुक्षेत्र) हैं। दो अन्य में हन्नान मोल्लाह और शिव कुमार कक्काजी हैं।

ये था सरकार का प्रस्ताव 

दिल्ली चलो आंदोलन के बाद पहली बातचीत के दौरान सरकार का एक प्रस्ताव गौरतलब रहा। सरकार की ओर से कहा गया कि बातचीत के लिए कुछ चुनिंदा नेताओं के नाम तय कर लें और वही प्रतिनिधिमंडल मिल-बैठकर सरकार से हल निकाले। इस पर किसान जत्थेबंदियां सहमत नहीं हुईं और सामूहिक बातचीत की वकालत की। पहले दौर में 35 से पांचवें दौर की बातचीत तक प्रतिनिधिमंडल में 40 सदस्य हो गए।

आज की भले औपचारिक बातचीत नहीं थी लेकिन सरकार ने पहले दिन जो प्रस्ताव दिया था, उस पर किसान नेताओं को ला दिया। यानी सामूहिक बातचीत की बजाए चुनिंदा 13 प्रतिनिधि। यह भले सरकार और किसान संगठनों की हार-जीत का सवाल नहीं था लेकिन जब अमित शाह के साथ किसान प्रतिनिधियों की बात चल रही थी, तभी पंजाब के मालबा की सबसे प्रभावी किसान जत्थेबंदी भाकियू उगराहा के प्रांतीय अध्यक्ष योगेंद्र सिंह उगराहा का लिखित बयान सामने आया, सरकार की अनौपचारिक बातचीत में किसान जत्थेबंदियों को शामिल नहीं होना चाहिए था। 

भाकियू एकता उगराहा के ही झंडा सिंह जेठूके ने कहा, अमित शाह से बातचीत की बाबत उनके संगठन को सूचना तक नहीं। इस घटना की चर्चा इसलिए कि 32 जत्थेबंदियों का आंदोलन पंजाब से दिल्ली कूच करने के बाद भी उगराहा गुट दिल्ली के साथ-साथ पंजाब के मालबा में डटा है। इसी मजबूती के कारण शुरुआती बातचीत में उगराहा के प्रतिनिधि शामिल नहीं हुए लेकिन बाद की वार्ता में उनके दो-दो नुमाइंदे शामिल होते रहे। मंगलवार की शाह के साथ अनौपचारिक बैठक में प्रभावी किसान यूनियन उगराहा को दरकिनार करना गौरतलब है।

याद दिला दें कि इससे एक दिन पहले ही हरियाणा के प्रगतिशील किसानों के 20 संगठन अतर सिंह के नेतृत्व में कृषि मंत्री से मिलकर नए कृषि कानूनों को लिखित समर्थन दे चुके हैं। इसी क्रम में मंगलवार को भी हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल की कृषि मंत्री तोमर से मुलाकात के मायने हैं। साफ है कि किसान आंदोलन ‘हाफ’की दिशा में बढ़ता कदम है। उधर, पीएम मोदी ने अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। गौरतलब यह भी है कि शाह से बातचीत में शामिल भाकियू लखोवाल अकाली हिमायती हैं। अब सभी की निगाहें फिर 9 दिसंबर को सरकार के लिखित प्रस्ताव मिलने के बाद किसान जत्थेबंदियों के आपसी मंथन और रूख पर नजरें टिक गई हैं।

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