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84 फीसदी किसानों का दर्द तो अभी बाकी है, जिन्होंने कभी नहीं चखा एमएसपी का स्वाद
Wed, 09 Dec 2020 04:58 PM IST
Harendra Chaudhary
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Wed, 09 Dec 2020 04:58 PM IST
सार
केंद्र सरकार कहती है कि हम साल में तीन बार किसानों को दो-दो हजार रुपये की आर्थिक मदद दे रहे हैं। हमारा सवाल है कि सरकार इस मदद की बजाए किसानों की फसल अच्छे दामों पर क्यों नहीं खरीद लेती...
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farmers protest, किसान आंदोलन
- फोटो : अमर उजाला (फाइल)
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विस्तार
केंद्र सरकार और किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के मध्य बातचीत जारी है। हालांकि किसानों ने सरकार का मसौदा प्रस्ताव खारिज कर दिया है, क्योंकि ज्यादातर संगठन इस प्रस्ताव के खिलाफ बताए जा रहे थे। इनका कहना है कि तीनों कृषि कानून रद्द होने चाहिए। उन्हें संशोधन मंजूर नहीं है। दूसरी तरफ किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट कहते हैं, किसान के हितों की लड़ाई तो अभी लंबी चलेगी।
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देश के ऐसे 84 फीसदी लघु सीमांत किसानों का दर्द तो अभी बाकी है, जो मुश्किल से दो-तीन एकड़ जमीन के मालिक हैं। इन्होंने तो एमएसपी का स्वाद कभी चखा ही नहीं है। इन छोटे किसानों की तो कोई बात ही नहीं कर रहा।
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बुधवार को एक खास बातचीत में रामपाल जाट ने कहा, एमएसपी को लेकर एक बात तो सरकार भी मान गई है। वो ये है कि एमएसपी का फायदा केवल छह फीसदी किसानों को ही मिल पा रहा है। इनमें भी ज्यादातर पंजाब और हरियाणा के किसान शामिल हैं। छोटे किसानों के लिए एमएसपी की लड़ाई कौन लड़ेगा। इन लघु सीमांत किसानों को मालूम नहीं है कि इन्हें एमएसपी कब मिलेगा। अब सरकार कह रही है कि वे कहीं भी जाकर अपनी फसल बेच सकेंगे।
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बतौर रामपाल, हमारा सवाल है कि वे बड़ी मंडी या बाजार तक कैसे पहुंचेंगे। दो सौ किलोमीटर दूर स्थित बाजार में वे कैसे टिक पाएंगे। इन किसानों की हैसियत तो केवल इतनी है कि जिस जगह पर इनके खेत हैं, उसके पांच-दस किलोमीटर के दायरे में मंडी हो। वहां पहुंचकर ये किसान अपनी फसल बेच सकते हैं।
वह कहते हैं, सरकार जिन कानूनों का बढ़ा-चढ़ा कर बखान कर रही है, उसके तहत जो तकनीक आएगी, उसका इस्तेमाल छोटे किसान नहीं कर सकेंगे। अगर वे उस तकनीक को उपयोग में लाए तो उसका खर्च ही नहीं निकल पाएगा। वजह, ये बहुत छोटी जोत वाले किसान हैं। इन किसानों के लिए एमएसपी की बात कोई नहीं कर रहा।
केंद्र सरकार कहती है कि हम साल में तीन बार किसानों को दो-दो हजार रुपये की आर्थिक मदद दे रहे हैं। हमारा सवाल है कि सरकार इस मदद की बजाए किसानों की फसल अच्छे दामों पर क्यों नहीं खरीद लेती। सरकार ऐसा क्यों चाहती है कि किसान मदद के लिए किसी के सामने हाथ फैला कर खड़ा रहे। किसान को उसके पैरों पर खड़े करने की दिशा में कुछ फैसले क्यों नहीं लिए जा रहे।
सरकार के पीछे कॉर्पोरेट सेक्टर खड़ा है, यही कारण है कि किसानों के हित में फैसला नहीं लिया जा रहा। रामपाल के मुताबिक, सरकार की मजबूरी है कि वह कॉर्पोरेट सेक्टर का साथ नहीं छोड़ सकती। हां किसान को जब चाहे दुत्कार सकती है। दरअसल, किसान और कॉर्पोरेट सेक्टर के हित विपरित हैं। जब तक निवेश आधारित मॉडल नहीं होगा, तब तक किसान की बात नहीं सुनी जाएगी। हमारे देश में कृषि आधारित विकास मॉडल की जरूरत है। हमें उद्योगधंधों से कोई गुरेज नहीं है। विकास की दौड़ में किसान भी तो शामिल है, मगर सरकार केवल एक पक्ष को लेकर आगे बढ़ेगी तो किसानों को सड़क पर उतरना ही पड़ेगा।