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Farmer Protest: क्या 4 दिसंबर को केंद्र सरकार की उम्मीदों पर पानी फिरने वाला है? पीछे हटने को तैयार नहीं किसान

Thu, 02 Dec 2021 09:53 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Thu, 02 Dec 2021 09:53 PM IST
सार

किसान आंदोलन के दौरान लंगर में इस्तेमाल हुई तकनीक ने पूरे देश को चौंकाया। अब ठंड ने दिल्ली में दस्तक दे दी है। इसे ध्यान में रखकर किसानों की सहूलियत को ध्यान में रखकर दो दिसंबर को सिंघु बार्डर पर 52 फीट की लंबी ट्रॉली पहुंची है।

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Farmer Protest: Are the hopes of the central government going to be dashed on 4th December Farmers not ready to back down Latest News Update
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : amar ujala, meerut

विस्तार

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह किसानों को मनाने में लगे हैं। वे सतनाम सिंह जैसे किसान नेताओं के संपर्क में हैं। अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह समेत तमाम शुभचिंतकों के पास चाहे जितने फोन घनघनाएं, लेकिन गुरुनाम सिंह चढ़ूनी जैसे नेता भी किसान आंदोलन को लेकर अभी कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं। सूचना यह भी है कि संयुक्त किसान मोर्चा के तमाम बड़े नेता अपनी मुख्य मांगों को लेकर बिना किसी ठोस नतीजे के आंदोलन से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। सूत्र बताते हैं कि 4 दिसंबर को होने वाली बैठक में किसान चर्चा करके और अपनी मांगों का प्रस्ताव सरकार के पास भेजेंगे। इस पर सरकार के रुख को देखने के बाद ही आंदोलन के स्वरूप पर कुछ कहा जा सकता है।

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लंगर से लेकर आंदोलन के समर्थन में 52 फीट लंबी ट्रॉली पहुंची सिंघु बॉर्डर
किसान आंदोलन के दौरान लंगर में इस्तेमाल हुई तकनीक ने पूरे देश को चौंकाया। अब ठंड ने दिल्ली में दस्तक दे दी है। इसे ध्यान में रखकर किसानों की सहूलियत को ध्यान में रखकर दो दिसंबर को सिंघु बार्डर पर 52 फीट की लंबी ट्रॉली पहुंची है। यह काफी खास किस्म की है। एक किसान नेता ने बताया कि इसके आने के बाद आंदोलन को लंबे समय तक चलाए रखने में मदद मिलेगी। इस ट्राली के पहुंचने की सूचना ने सरकारी महकमें में भी हलचल पैदा कर दी है। इसके आने का मतलब साफ है कि किसान अभी दिल्ली का बार्डर छोड़कर लौटने वाले नहीं है। केंद्र सरकार किसानों के मुद्दे पर लगातार मंथन कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इसको लेकर बेहद संवेदनशील हैं। समझा जा रहा है कि केंद्र सरकार को 4 दिसंबर को होने वाली संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक का इंतजार है। इससे पहले किसान और सरकार के बीच में संवाद के कई मध्यस्थ सक्रिय किए गए हैं।
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'आखिर 13 महीने बाद हम क्या लेकर गांव लौट जाएं?'
किसान नेता बलविंदर सिंह खैरा का कहना है कि 13 महीने बाद आखिर वह क्या लेकर दिल्ली बॉर्डर से अपने गांव लौट जाएं? खैरा कहते हैं कि किसान केंद्र सरकार के केवल तीन कृषि कानून के विरोध में ही दिल्ली नहीं आए थे। हमारी कई समस्याएं और मांगें हैं। हमें डाई, यूरिया, खाद मिलने में अधिक दिक्कत हो रही है। महंगा भी मिल रहा है। डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं। किसान के बिजली का बिल तीन-चार गुणा बढ़ गया है। 
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उन्होंने कहा कि सरकार गेहूं का रेट 1900 रुपये प्रति कुंतल तय करती है, हमारा गेहूं 1400-1500 में बिक रहा है। सरकार धान का जो रेट तय करती है उससे 700-800 रुपये प्रति क्विंटल कम में बिकता है और इसे बेचना हमारी मजबूरी हो जाती है। जबकि बाजार में कोई भी आटा 28-29 रुपये, चावल 30 रुपये किलो से कम में नहीं बिकता। हमारा आलू डेढ़-दो रुपये किलो के हिसाब से बिकता है और बाजार में जाते ही कीमत कई गुणा बढ़ जाती है। केवल एक छोटे आलू का लेज चिप्स 10 रुपये में बिक रहा है। अब आप ही बता दो क्या यह प्रधानमंत्री मोदी जी को नहीं पता है?

खैरा की इस बात पर वहां बैठे दर्जनों किसान खुश होकर ताली बजाने लगते हैं। बिहार के किसान धीरज कुमार को यह बड़ा जायज लगता है और वह किसान एकता जिंदाबाद के नारे लगाने लगते हैं। इस बीच में पंजाब के किसान लखविंदर सिंह नई लाइन जोड़ते हैं। वह कहते हैं कि जो रेट सरकार ने तय किया है, वहीं तो माग रहे हैं। आखिर हमारे देश की कैसी सरकार है जो अपनी ही घोषणा को हमारा अधिकार नहीं बनने देना चाहती।

'हमें पता है एमएसपी का समाधान इतना आसान नहीं है'
सिंघु बार्डर पर एग्रीकल्चर में स्नातक एक किसान नेता ने माना कि एमएसपी की गारंटी देने की मांग मानना सरकार के लिए बहुत आसान नहीं है। फिर यह एमएसपी तो कुछ ही फसलों पर है, लेकिन वह कहते हैं कि सरकार को कुछ तो ईमानदारी से करना पड़ेगा। सुरेन्दर सिंह कहते हैं कि सरकार पूरे किसान आंदोलन के दौरान लगातार खूब काईट फ्लाईंग करती रही है। अब भी इससे बाज नहीं आ रही है। तमाम मंत्रियों, भाजपा नेता के बोल देख लीजिए। इन्होंने खुद ही किसानों को अपना दुश्मन बना लिया है। अब यह संसद में किसानों के मुद्दे पर चर्चा भी नहीं होने देना चाहते। पहले सरकार कहीं तो ईमानदारी दिखाए। 


पानीपत से आकर डटे राजेश भारद्वाज वकील और किसान दोनों हैं। कचहरी से खाली होने के बाद बार्डर पर आ जाते हैं। कहते हैं कि मीडिया ट्रायल से किसान आंदोलन खत्म हो तो सरकार करा ले? राजेश कहते हैं कि किसान आतंकवादी, अलगाववादी, भिंडरावाले, आईएसआई न जाने क्या हैं? यह सब कौन बोल रहा है? क्यों बोल रहा है? आखिर सरकार देश भर के किसानों को अपना दुश्मन क्यों बना रही थी। अब चाहती है कि तीन कानून वापस हो गए और किसान लौट जाएं। कहीं ऐसा भी होता है।

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