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नागरिकता संशोधन विधेयक : नेहरू-लियाकत समझौते की नाकामी बनी बदलाव की वजह

Thu, 12 Dec 2019 03:49 AM IST
गौरव पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Thu, 12 Dec 2019 03:49 AM IST
सार

  • पाकिस्तान ने लगातार किया समझौते का उल्लंघन
  • कई बार उठे संसद में सवाल, सरकार रही असहाय
  • 1950 में भारत व पाक के बीच हुआ था समझौता

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Failure of Liaquat–Nehru Pact became reason behind Citizenship Amendment Bill 2019
नेहरू लियाकत समझौता

विस्तार

मोदी सरकार की नागरिकता संशोधन बिल लाने की मुख्य वजह 70 साल पहले भारत और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की गारंटी देने वाला नेहरू लियाकत समझौता है। भारत ने जहां इस समझौते के तहत अपने अल्पसंख्यकों को बराबरी का दर्जा दिया, वहीं पाकिस्तान ने इसका लगातार उल्लंघन किया। 

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आजादी के बाद पलायन करने वाले अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए समझौता किया गया था। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि पाकिस्तान में सताए जा रहे अल्पसंख्यकों को भारत में शरण और नागरिकता प्रदान करने के लिए ही यह कानून बनाया गया है। 
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1950 में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच समझौते के चार मुख्य बिंदु थे। पहला, अल्पसंख्यकों को अपने मूल देश जाकर संपत्ति बेचने का अधिकार होगा और वहां की सरकार उन्हें सुरक्षा देगी, दूसरा, अपहरण की गई महिलाओं और लूटा गया सामान वापस दिया जाएगा, तीसरा जबरन धर्म परिवर्तन मान्य नहीं किया जाएगा और चौथा अल्पसंख्यकों को बराबरी का अधिकार दिया जाएगा। 
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संसद में कई बार यह मुद्दा उठा और समझौते को लेकर सवाल पूछे गए। सरकार ने हर बार माना कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं के अधिकारों का लगातार हनन हो रहा है। लेकिन वह यह बताने में विफल रही कि वह इस बारे में क्या कर रही है। ब्यूरो

1966 : राज्यसभा में उठा था सवाल

अगस्त 1966 में भारतीय जनसंघ के सांसद निरंजन वर्मा ने सरकार से पूछा था कि नेहरू-लियाकत समझौते की स्थिति क्या है, क्या दोनों देश समझौते का पालन कर रहे हैं और पाकिस्तान कब से समझौते का उल्लंघन कर रहा है? तत्कालीन विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह ने उत्तर दिया, पाकिस्तान लगातार अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित कर रहा है।

1970 : सरकार को बताया था असहाय

राज्यसभा में 1970 में तत्कालीन विदेश मंत्री दिनेश सिंह ने भी इस समझौते पर सरकार को असहाय बताया था। उनका कहना था कि बंटवारे के 20 साल बाद तक पाकिस्तान से भारत में शरणार्थी आते रहे क्योंकि पाकिस्तान ने उनकी सुरक्षा का वादा उसने पूरा नहीं किया। लेकिन उन्होंने इस समझौते को रद्द किए जाने की किसी भी संभावना से इनकार कर दिया था।

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