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Exclusive: NDRF को स्थापित करने वाले पूर्व IPS ने सुनाई कहानी, जब पहचान के लिए लगानी पड़ती थी काम की प्रदर्शनी

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Sat, 17 Jun 2023 02:29 PM IST
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सार
20 साल पहले अस्तित्व में आए 'राष्ट्रीय आपदा मोचन बल' आखिर किस तरह दो दशक का पड़ाव पार करते हुए आज इस ऊंचाई पर खड़ा हुआ है। एनडीआरएफ की स्थापना और इसे देश दुनिया के शिखर तक पहुंचाने में एक व्यक्ति, जिसे एक इंस्टीट्यूशन कहा जाए तो ठीक होगा, की खास भूमिका रही है। वह नाम है पूर्व आईपीएस केएम सिंह...
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Exclusive Interview: Founder of NDRF KM Singh said- I will show it, if I can't, I will resign
NDRF: Rtd IPS KM Singh - फोटो : Amar Ujala/Rahul Bisht

विस्तार

राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ), जिसे दुनिया की सबसे बड़ी रेस्क्यू फोर्स कहा जाता है, अब वह किसी परिचय की मोहताज नहीं है। जापान के न्यूक्लियर प्लांट में रिसाव हुआ, तो दुनिया के तमाम आपदा मोचन बल, वहां से चले गए थे। रिसाव के भारी खतरे के मद्देनजर करीब डेढ़ दर्जन देशों की रेस्क्यू फोर्स यानी 'आपदा मोचन बल' ने जापान छोड़ दिया, तब एनडीआरएफ का दस्ता ही अपनी जान पर खेलकर उस आपदा में घुसा था। लोगों को बचाने और हादसे वाली जगह से शवों को निकालने में एनडीआरएफ ने जो समर्पित सेवा भाव और बहादुरी दिखाई, जापान की सरकार, विभिन्न संस्थाओं और स्थानीय लोगों ने उस दस्ते की मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी।

बीस साल पहले अस्तित्व में आए 'राष्ट्रीय आपदा मोचन बल' आखिर किस तरह दो दशक का पड़ाव पार करते हुए आज इस ऊंचाई पर खड़ा हुआ है। इस बल को कभी आलोचना झेलनी पड़ी, तो कभी संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ा। नौकरशाही की हां, ना और अविश्वास वाली स्थितियों से भी इस बल को गुजरना पड़ा। एनडीआरएफ की स्थापना और इसे देश दुनिया के शिखर तक पहुंचाने में एक व्यक्ति, जिसे एक इंस्टीट्यूशन कहा जाए तो ठीक होगा, की खास भूमिका रही है। वह नाम है पूर्व आईपीएस 'केएम सिंह'।

केएम सिंह, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के महानिदेशक रहे हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के दो कार्यकाल के सदस्य थे। उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एनडीआरएफ को खड़ा करने, नियम तय करने के लिए 2003 में गठित संचालन समिति का सदस्य बनाया गया। इससे पहले उन्होंने इंटेलिजेंस ब्यूरो और भारतीय उच्चायोग लंदन में मंत्री के रूप में भी कार्य किया। आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में विशेष रूप से एनडीआरएफ को आगे बढ़ाने में उनके योगदान के लिए 2020 में केंद्र सरकार द्वारा उन्हें 'सुभाष चंद्र बोस आपदा प्रबंधन पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। केएम सिंह ने शुक्रवार को अमर उजाला डॉट कॉम के साथ विस्तृत बातचीत की है।

सवाल: किस घटना के बाद यह विचार आया कि देश में एनडीआरएफ जैसे बल का गठन होना चाहिए। इसके लिए किस देश से प्रेरणा मिली 

जवाब: देश में 1999 से 2001 के बीच भयंकर प्राकृतिक आपदा आई थी। उड़ीसा में करीब दस हजार लोगों की जान गई थी। गुजरात में भी इतने ही लोगों का जीवन खत्म हो गया। इसके बाद भी केंद्र सरकार, आपदा से निपटने के लिए तैयार नहीं थी। चर्चा और बैठकों के दौर शुरू हुए। पहले ऐसी बाधाओं से निपटने के लिए जो छोटा मोटा तंत्र था, वह कृषि मंत्रालय के तहत आता था। वजह, तब ज्यादातर 'बाढ़ और सूखा' को ही आपदा माना जाता था।

एक बेहतरीन रेस्क्यू फोर्स की अवधारणा पर काम करने के लिए तत्कालीन केंद्रीय मंत्री शरद पवार के निर्देशन में दो कमेटी बनाई गई। कमेटी के सदस्यों ने अमेरिका में जाकर इस तरह के तंत्र का अध्ययन किया। अमेरिका में संघीय आपातकालीन प्रबंधन एजेंसी (फेमा) के सदस्यों से बातचीत कर उनकी कार्यप्रणाली को समझा। तय हुआ कि ऐसा ही तंत्र भारत में भी खड़ा किया जाए। जब गुजरात में भूकंप आया, तो इस्राइल व यूरोप की कई टीमें आई थीं। उनके पास विक्टिम लोकेटर भी थे। इसकी मदद से यह पता लगाया जा सकता था कि मलबे में कौन कहां दबा है। पीड़ितों तक कैसे पहुंचा जाए, दीवार में छेद कैसे करें। अगर आगे कोई पत्थर है या दीवार है, यदि वह पीड़ित के ऊपर गिरी, तो वह मारा जा सकता है। इसका ध्यान रखना था कि अंदर पत्थर न गिरने पाए। ये सब देखकर महसूस हुआ कि भारत के पास एक ऐसा बल हो, जो सभी तरह की आपदाओं से निपटने में सक्षम हो।

सवाल: एनडीआरएफ में कितनी बटालियन से हुई शुरुआत, किन कमेटियों का रहा योगदान। 

सवाल: साल 2002 में एक कमेटी बनी, जिसमें तत्कालीन केंद्रीय गृह सचिव गोपालास्वामी और संयुक्त सचिव 'आपदा प्रबंधन' आरके सिंह भी शामिल थे। इनके अलावा चार बलों, बीएसएफ सीआईएसएफ, सीआरपीएफ और आईटीबीपी के डीजी को कमेटी का सदस्य बनाया गया। यह मंथन शुरू हुआ कि कैसे एक समन्वित बल खड़ा हो। भारत एक बड़ा देश है, तो शुरू में आठ लोकेशन पर आठ बटालियन सृजित करने के लिए विचार हुआ। चारों केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को दो-दो बटालियन तैयार करने के लिए कहा गया।  

2003 में इन बटालियनों को कुछ उपकरण भी दिए गए। लगभग 295 करोड़ रुपये बजट स्वीकृत हुआ। इसके बाद 2004 की सुनामी आई। उस वक्त सरकार को बड़ा झटका लगा। एनडीआरएफ को त्वरित गति से प्रभावी बनाने के लिए दोबारा से मंथन प्रारंभ हुआ। मैंने आपदा की चपेट में आए अंडमान का दौरा किया। वहां पर बल ने अच्छा कार्य किया। जनवरी 2005 में एनडीएमए एक्ट बना। उसमें यह प्रावधान किया गया कि एनडीआरएफ में आठ बटालियन होंगी। सेक्शन 44 के तहत इसका निर्देशन/नियंत्रण/पर्यवेक्षण, एनडीएमए के पास रहेगा। एक डीजी एनडीआरएफ होगा। 2006 में बल की अधिसूचना जारी हुई। बल के गठन में यूरोप के कई देशों से प्रेरणा मिली।

सवाल: बल की स्थापना के वक्त क्या चैलेंज आए। कौन-कौन लोग थे, जिन्होंने इस बल के गठन में अहम भूमिका निभाई 

जवाब: 2006 में जब राष्ट्रीय आपदा मोचन बल, खड़ा हो गया तो चारों बलों के डीजी की बैठक हुई। मैनपावर को लेकर चर्चा हुई। सीआईएसएफ ने तमिलनाडु व उड़ीसा में दो बटालियन खड़ी कीं। ये पहली बैठक थी, जिसमें चारों डीजी मौजूद थे। कई डीजी का कहना कि हमारे पास पहले ही संख्या बल कम है। खुद के ही बहुत से चैलेंज हैं। एनडीआरएफ को खड़ा करने में हमें दो साल लग जाएंगे। चूंकि मुझे तो यह काम हर सूरत में करना ही था, इसलिए निजी तौर पर मैनपावर को ट्रेनिंग दी गई। उसी वक्त आर्मी का प्रपोजल आया। आर्मी ने कहा, वे आठ बटालियन खड़ी कर देंगे। उनके पास सारे संसाधन हैं। अर्धसैनिक बल, एनडीआरएफ को ठीक से नहीं खड़ा कर सकेंगे। आर्मी के पास मेडिकल, इंजीनियरिंग व दूसरी कोर हैं। आर्मी ने उड़ीसा और गुजरात की आपदा में भी अच्छा काम किया है। हमें यह टॉस्क दो, छह माह में बटालियन खड़ी कर देंगे। दूसरी ओर, कोई भी सीएपीएफ डीजी, मैनपावर देने को तैयार नहीं था।

एनसी विज, पूर्व आर्मी चीफ जो उस वक्त एनडीएमए के वाइस चेयरमैन थे, ने भी चिंता जताई कि यह बल कैसे खड़ा होगा। मैंने उनके साथ लंबी चर्चा की। उन्हें बताया कि आपदा प्रबंधन में सेना को लाना ठीक नहीं है। सेना में तो 'वन बुलेट वन पर्सन' का माइंडसेट होता है। वहां दया भाव कम ही रहता है। आर्मी की इस सोच में बदलाव बहुत मुश्किल होगा। मुझे आपका फुल स्पोर्ट चाहिए। मैं करके दिखा दूंगा और नहीं कर सका तो त्यागपत्र दे दूंगा। इसके बाद एनसी विज ने मुझे भरपूर सहयोग दिया। दूसरा चैलेंज यह रहा कि 2006 से 2013 के बीच एनडीआरएफ में कोई स्थायी डीजी नहीं आया। सिविल डिफेंस, होम गार्ड व फायर सर्विस से ही डीजी आते रहे। एनडीआरएफ डीजी का पद कुछ समय तक अतिरिक्त कार्यभार में भी रहा। औसतन छह-सात माह तक ही डीजी रहे। मैने सबका सहयोग किया। चूंकि मैंने वादा किया था कि एनडीआरएफ को दुनिया का श्रेष्ठ बल बनाना है, इसलिए मैं आगे बढ़ता रहा।

सवाल: प्रारंभ में किस तरह की आपदाओं पर ज्यादा फोकस रहा, क्या पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ा?

जवाब: शुरुआत में बल के खड़ा होने व इसकी ट्रेनिंग में कई तरह की समस्याएं आई। उस वक्त हर साल आने वाली बाढ़ पर हमारा ज्यादा फोकस था। बिहार और उड़ीसा में 2006-07 में टीम भेजी। तब बल को कोई नहीं जानता था। आपदा वाली सब जगहों पर आर्मी को बुलाते थे। खुद को साबित करना और लोगों को समझाना एक बड़ी चुनौती थी। इसमें बहुत समय लग गया। पहचान स्थापित करने के लिए हमें हर जिले में एनडीआरएफ के कामकाज को लेकर प्रदर्शनी लगानी पड़ी। कार्यशाला आयोजित की गईं। हमें बताना पड़ा कि हम आपदा में मदद करते हैं। जिस काम के लिए आर्मी आती है, वह हम कर सकते हैं। आठों बटालियन को अपने अपने क्षेत्रों में अफसरों से मिलकर परिचय भ्रमण करने के लिए कहा गया। तब लोग सुनने के आगे आए। वे सवाल भी करते कि आपके पास क्या उपकरण हैं। तभी 2007 में बिहार में भयंकर बाढ़ आ गई। कोलकाता से एनडीआरएफ को भेजा गया। डेढ़-दो साल पहले बने इस बल के पास खुद की नाव तक नहीं थी। मीडिया में खूब आलोचना हुई कि एनडीआरएफ के पास तो नाव तक नहीं है।

एनसी विज से बात हुई तो उन्होंने आर्मी से 32 बाउट नाव 'ओपीएम' दिला दी। उस वक्त बिहार में एनडीआरएफ की खासी बदनामी हुई थी। इस वजह से आठ बाउट, बिहार में ही दे दीं। मौजूदा केंद्रीय मंत्री आरके सिंह, उस वक्त बिहार में ही पोस्टेड थे, तो उन्होंने कुछ जगह दिलाने में हमारी मदद कर दी। 2008 में एनडीआरएफ में बदलाव हुए। कोशी बैराज में लीकेज हुई, तो वहां त्वरित गति से आठ बाउट भेज दी गई। मैन पावर दूसरी जगह से बुला ली गई। कुल 16 बाउट भेजे गए। लगातार बढ़ते पानी में रेस्क्यू आपरेशन शुरू हुआ। पहले एयरक्राफ्ट ही सुविधा भी नहीं थी। पूर्णिया के निकट एयर पट्टी पर रोजाना आदमियों का आना जाना हुआ। एक सप्ताह में वह भी बहुत कम संसाधानों में, एनडीआरएफ ने एक लाख लोगों को पानी से बाहर निकाला। इसके लिए बल को काफी प्रशंसा मिली।

सवाल: शुरुआत में एनडीआरएफ की कितनी संख्या रखी गई। बाद में कब और कैसे बदलाव हुआ। यहां बड़ा चैलेंज क्या रहा।  

जवाब: शुरू में तो आठ बटालियन खड़ी की गईं। जब बिहार में अच्छा काम किया, तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा, हमें भी यह बल दे दो। हम फ्री लैंड दे देंगे। आंधप्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी ने बल की मांग की। उन्होंने भी कहा, हम भी फ्री लैंड देंगे। नीतीश कुमार ने कहा, बटालियन की संख्या आठ से 12 होनी चाहिए। नॉर्थ ईस्ट में बल को तैनात किया गया। बल की संख्या 12 बटालियन कर दी गई। तब मैं एनडीएमए का बतौर सदस्य काम करा रहा था। एडवांस वार्निंग सिस्टम को लेकर भी हां ना चलती रही। कभी टीए-डीए जैसे खर्च की बात सामने आ गई। मैंने तर्क दिया कि एक जान बचाने की कोशिश में लाखों खर्च होते हैं, तो उसमें कोई गुरेज नहीं है। शुरू में बलों की ट्रेनिंग को लेकर माइंडसेट नहीं बन सका। सीएपीएफ डीजी तो पहले ही कह रहे थे कि मैन पावर नहीं है। उसके बाद एमएचए भी पूरी तरह से जवानों की ट्रेनिंग कराने पर एक सटीक आदेश जारी करने से कतरा रहा था। हमने कहा, एनडीआरएफ को एक डेडिकेट फोर्स बनाना है। इसके लिए ट्रेनिंग जरूरी है। हर बटालियन को 16 टीमों में बांटा गया। भले ही सभी लोगों का अलग रोल रहे, मगर उनके लिए समन्वित ट्रेनिंग जरुरी थी। आपदा तो कई तरह की हो सकती हैं। बाढ़ में अलग तरह का कार्य होता है, अलग उपकरण होते हैं। भूकंप के दौरान बल को अन्य तरीके से काम करना पड़ता है। कटर कौन चलाएगा, डॉग स्क्वॉड कौन संभालेगा, स्मॉग या अन्य कोई कार्य, बल में सबका अलग रोल तय किया गया। ये चैलेंज 2009 में पीएम की मीटिंग में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने खत्म कर दिया। उन्होंने कहा, एनडीआरएफ केवल आपदा की स्थिति से निपटने के लिए बनाई गई है। इस फोर्स का 'लॉ एंड ऑर्डर' ड्यूटी से कोई लेना देना नहीं होगा।

सवाल: किसी भी आपदा से मुकाबला करना है तो उसके लिए तकनीकी विशेषज्ञ भी जरुरी होते हैं, एनडीआरएफ में ऐसे एक्सपर्ट कहां से लिए गए?

जवाब: हमनें कहीं बाहर से कोई तकनीकी एक्सपर्ट नहीं लिया। अपने लोगों को ही ट्रेनिंग दिलाई। चूंकि इस बल में सभी जवान या अधिकारी, सीएपीएफ से आए हैं, तो हमने वहां के मेडिकल कैडर से मदद ली। हमें डॉक्टर मिल गए। वाहन मैकेनिक, इलेक्ट्रिीशियन आ गए। इसी तरह से जिस बल में जो भी तकनीकी एक्सपर्ट दिखा, उसे बुला लिया। यह भी तय हुआ कि एनडीआरएफ का अपना कैडर नहीं होगा। एनएसजी व एसपीजी बहुत अहम फोर्स हैं। इनका भी डायरेक्ट कैडर नहीं है। इन बलों में जवान या अफसर पांच साल की प्रतिनियुक्ति पर आते हैं। खुद का कैडर खड़ा करने में कई सारी दिक्कतें आती हैं। हमने निर्णय लिया कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में जवानों को इस बल में आने का मौका मिले। कोई भी नव गठित फोर्स इतनी अच्छी ट्रेनिंग नहीं ले सकती, जैसे कि आज एनडीआरएफ को दी जा रही है। पांच साल में हमारे लोग फुल ट्रेंड बन जाते हैं। वे 40 साल से अधिक आयु के न हों। अगर खुद का कैडर होगा तो बढ़ती आयु में आपदा से निपटने में जवान उतने सक्षम नहीं होंगे।

सवाल: क्या अब महिलाओं का भी दस्ता तैयार किया जा रहा है, इसके पीछे खास वजह? 

जवाब: प्रारंभ में बल को खड़ा करने में कई सारी दिक्कतें आई थीं। जैसा कि हम पहले के सवालों में चर्चा कर चुके हैं। तब 12 जगहों पर एनडीआरएफ थी। अपने बलों के लिए जमीन लेना आसान काम नहीं था। मुख्यमंत्रियों से बातचीत कर जमीन ली गई। कुछ समय तक जवानों को टैंटों में रहना पड़ा। संभव है कि वहां सभी तरह की सुविधाएं नहीं रही हों। महिला जवानों की कम से कम मूलभूत जरुरतें पूरी हों, ये तो ध्यान में रखना ही होगा। अब हर बटालियन में पर्याप्त जगह है। सभी तरह की सुविधाएं हैं। इसके मद्देनजर अब एनडीआरएफ में महिलाओं को लाया जा रहा है।

सवाल: आज विदेश में भी जा रही है एनडीआरएफ, इसके लिए बल की कौन सी खासियत को अहमियत देते हैं?

जवाब: 2011 में जापान में आपदा आई। भूकंप के बाद बहुत मुश्किल हालात थे। करीब 15 देशों की फोर्स लोगों को बचाने पहुंची थी। उस समय तक एनडीआरएफ को दूसरे मुल्क में काम करने का अनुभव नहीं था। हमने भी जापान जाने के लिए गृह मंत्रालय में अर्जी लगा दी। वहां से मंजूरी मिलना भी बहुत मुश्किल था। जब तक एनडीआरएफ को जापान में जाने की मंजूरी मिली, तो वहां न्यूक्लियर प्लांट में लीकेज हो गया। वहां से अधिकांश बल अपने देशों में वापस चले गए थे। वजह, वहां पर बहुत ज्यादा जोखिम था।

हमारा बल सभी आपदाओं से निपटने में सक्षम हैं, इस सोच के साथ हम जापान में गए। कमांडेंट, आलोक अवस्थी के नेतृत्व में एनडीआरएफ दस्ते को रवाना किया गया। इससे पहले उन्हें थोड़ी बहुत ट्रेनिंग दी गई। वहां माइनस दस तापमान था। हम यह बात गौरव के साथ कह सकते हैं कि न्यूक्लियर प्लांट के लीकेज में आलोक अवस्थी घुसे। अपने जवानों के साथ उन्होंने वहां दस दिन तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया। हालांकि जिंदा लोगों की संख्या बहुत कम रही। भारी जोखिम की स्थिति में एनडीआरएफ ने वहां से डेड बॉडी निकाली। इसके बाद जापान की सरकार ने एनडीआरएफ की खूब सराहना की। हमारे जवानों को पहली बार दूसरे मुल्क में सम्मान मिला। आज एनडीआरएफ दुनिया का सबसे बड़ा डेडिकेटेड बल है। यूएस, चीन और जापान सहित कई दूसरे देशों में ऐसा बल नहीं है, जो एक साथ सभी आपदाओं से निपटने में सक्षम हों।

सवाल: एनडीआरएफ के पास खुद का एयरक्रॉफ्ट हो, इस बाबत क्या स्थिति रही है। क्या इसकी जरूरत है या एयरफोर्स की मदद काफी है। 

जवाब: एयरक्रॉफ्ट देने पर विचार हुआ था, लेकिन आज तक नहीं मिल सका। उसका मैनेजमेंट भी मुश्किल होता है। अगर मिल जाए तो अच्छी बात है। आज एनडीआरएफ को दुनिया जानती है। अभी तक बल को किसी भी आपदा के समय प्लेन मिलने में कोई खास दिक्कत नहीं होती। आपदा के समय 'टाइम' बहुत अहम होता है। एयरफोर्स से मदद मिल जाती है। हर बटालियन में 16 टीमें हैं, इसलिए दो टीमों को रास्ते में ही रखा जाता है। पता नहीं कब कहां जरूरत पड़ जाए। 2015 में नेपाल में दिन के समय 11 बजकर 55 मिनट पर भूकंप आया था। एनडीआरएफ की टीम शाम पांच बजे वहां पहुंच गई थी। दूसरे देश में पांच घंटे में पहुंचना, आसान नहीं है।

सवाल: विश्व में आज एनडीआरएफ की स्थिति क्या है। आने वाले समय में इस बल को किस तरह से और ज्यादा बेहतर बनाया जा सकता है?

जवाब: इसके लिए कुछ सुझाव हैं। एनडीआरएफ का ट्रेनिंग सेंटर नागपुर में तैयार हो रहा है। हालांकि अभी औपचारिक तौर पर इसका उद्घाटन नहीं हुआ है। वहां पर ट्रेनिंग का स्तर कैसा हो, इसके लिए हमारी टीम यूएस का दौरा करने गई थी। इस संस्थान में टीओटी (प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण) पर खास फोकस रहे। सभी बटालियनों में भी टीओटी रहें। राज्य की फोर्स यानी एसडीआरएफ को भी यहां ट्रेंड किया जाए। हमें दक्षिण एशिया के देशों के साथ ज्यादा से ज्यादा समन्वय करना चाहिए। जैसे 'सार्क' देशों में आपदा से निपटने की ट्रेनिंग का जिम्मा भारत को मिला है। हालांकि अभी इस बल की ट्रेनिंग गांधीनगर में भी हो रही है, उसे नागपुर में होना चाहिए। हमारे ट्रेनिंग सेंटर ऐसे हों कि वहां दुनिया के बड़े देश अपने बलों को ट्रेनिंग लेने के लिए भेजें। इसके लिए मॉडर्न इक्विपमेंट्स होना बहुत जरुरी है। ट्रेनिंग के स्तर को समय और जरुरतों के मुताबिक अपडेट किया जाना चाहिए।

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