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OPS vs NPS: पुरानी पेंशन पर सियासत में 'जोखिम' उठा रहा केंद्र? संसद में जवाब के बाद भी पीछे नहीं हटेंगे कर्मी

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Sat, 05 Aug 2023 08:07 PM IST
सार

राज्यसभा में वित्त मंत्री से पूछा गया था कि क्या केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति से पहले उनके आखिरी वेतन की 40 से 45 फीसदी रकम पेंशन के तौर पर देने का विचार कर रही है। वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने कहा, सरकार के सामने ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।

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Employees will not back down from protest even after govt reply in Parliament regarding old pension scheme
ओपीएस। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देश में पुरानी पेंशन लागू कराने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों के कर्मचारी संगठन एक साथ आ गए हैं। केंद्र के सभी मंत्रालय/विभाग, रक्षा कर्मी (सिविल), रेलवे, बैंक, डाक, प्राइमरी, सेकेंडरी, कालेज एवं यूनिवर्सिटी टीचर, दूसरे विभागों एवं विभिन्न निगमों और स्वायत्तशासी संगठनों के कर्मचारी 10 अगस्त को दिल्ली के रामलीला मैदान में पहुंचेंगे। दूसरी तरफ केंद्र सरकार, इस मुद्दे पर टस से मस होने का संकेत नहीं दे रही। संसद सत्र में दो दिन पहले ही वित्त मंत्रालय ने केंद्रीय कर्मचारियों को न्यूनतम पेंशन देने की खबरों से किनारा कर लिया था। राज्यसभा में वित्त मंत्री से पूछा गया था कि क्या केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति से पहले उनके आखिरी वेतन की 40 से 45 फीसदी रकम पेंशन के तौर पर देने का विचार कर रही है। वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने कहा, सरकार के सामने ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। केंद्र सरकार, मौजूदा पेंशन स्कीम की समीक्षा नहीं कर रही है। अब सवाल ये खड़ा होता है कि क्या सरकार 'पुरानी पेंशन' पर सियासत में 'जोखिम' उठा रही है, क्योंकि कर्मचारी संगठनों ने दो टूक शब्दों में कहा है कि वे संसद में दिए गए इस 'जवाब' के बावजूद ओपीएस की मांग से पीछे नहीं हटेंगे।  

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एनपीएस में कोई सुधार मंजूर नहीं है ... 
ओपीएस के लिए गठित नेशनल ज्वाइंट काउंसिल ऑफ एक्शन (एनजेसीए) की संचालन समिति के राष्ट्रीय संयोजक एवं स्टाफ साइड की राष्ट्रीय परिषद 'जेसीएम' के सचिव शिवगोपाल मिश्रा ने कहा है, केंद्र सरकार संसद में यह बात कह रही है कि ओपीएस लागू नहीं होगी। इसमें चिंता की कोई बात नहीं है। सरकार ये कह रही है कि कर्मियों के आखिरी वेतन की 40 से 45 फीसदी रकम पेंशन के तौर पर देने का कोई विचार नहीं है। अगर कल को सरकार, एनपीएस में कोई सुधार भी करती है, जिसके लिए वित्त मंत्रालय ने कमेटी का गठन कर रखा है तो वह कर्मियों को मंजूर नहीं होगा। कर्मियों का केवल एक ही मकसद है, बिना गारंटी वाली 'एनपीएस' योजना को समाप्त करना। केंद्र सरकार को कर्मियों की मांग पर परिभाषित एवं गारंटी वाली 'पुरानी पेंशन योजना' को बहाल करना होगा। दस अगस्त को केंद्र एवं विभिन्न राज्यों से करीब दो लाख कर्मचारी दिल्ली के रामलीला मैदान में पहुंचेंगे। देश में केंद्र और राज्यों, विभिन्न निगमों एवं दूसरे स्वायत्तता प्राप्त गारंटी वाली ओपीएस योजना को बहाल करना होगा। 
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केंद्र सरकार ने नेशनल पेंशन स्कीम में बदलाव के लिए वित्त सचिव की अध्यक्षता में चार सदस्यों की जिस कमेटी का गठन किया था, उसने 9 जून को स्टाफ साइड की राष्ट्रीय परिषद 'जेसीएम' के पदाधिकारियों के साथ बैठक की थी। इसमें केंद्र सरकार के बड़े कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों ने कमेटी को स्पष्ट तौर पर बता दिया था कि उन्हें पुरानी पेंशन के अलावा और कुछ भी मंजूर नहीं है। इस समस्या को हल करने का एकमात्र तरीका यही है कि बिना गारंटी वाली 'एनपीएस' योजना को खत्म किया जाए और परिभाषित एवं गारंटी वाली 'पुरानी पेंशन योजना' को बहाल किया जाए। समिति के अध्यक्ष ने आश्वासन दिया है कि कर्मचारी पक्ष द्वारा अपने ज्ञापन में दिए गए सभी बिंदुओं पर ध्यान दिया जाएगा। शिव गोपाल मिश्रा ने कहा, एनपीएस में कर्मियों जो पेंशन मिल रही है, उतनी तो बुढ़ावा पेंशन ही है। कर्मियों ने कहा है कि देश में सरकारी कर्मियों, पेन्शनरों, उनके परिवारों और रिश्तेदारों को मिलाकर वह संख्या दस करोड़ के पार पहुंच जाती है। अगर ओपीएस लागू नहीं होता है तो लोकसभा चुनाव में भाजपा को राजनीतिक नुकसान झेलना होगा। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों ने ओपीएस को अपने चुनावी एजेंडे में शामिल किया है। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की जीत के पीछे ओपीएस एक बड़ा कारण रहा है। 
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पेंशन न तो एक इनाम है और न ही अनुग्रह की बात  
एआईडीईएफ के महासचिव सी.श्रीकुमार के मुताबिक, एनपीएस में पुरानी पेंशन व्यवस्था की तरह महंगाई राहत का भी कोई प्रावधान नहीं है। जो कर्मचारी पुरानी पेंशन व्यवस्था के दायरे में आते हैं, उन्हें महंगाई राहत के तौर पर आर्थिक फायदा मिलता है। एनपीएस में सामाजिक सुरक्षा की गारंटी भी नहीं रही। रिटायरमेंट के बाद सरकारी कर्मियों को जानबूझकर कष्टों में धकेला जा रहा है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय पीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश बीडी चंद्रचूड, जस्टिस बीडी तुलजापुरकर, जस्टिस ओ. चिन्नप्पा रेड्डी एवं जस्टिस बहारुल इस्लाम शामिल थे, के द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत रिट पिटीशन संख्या 5939 से 5941, जिसको डीएस नाकरा एवं अन्य बनाम भारत गणराज्य के नाम से जाना जाता है, में दिनांक 17 दिसंबर 1981 को दिए गए प्रसिद्ध निर्णय का उल्लेख करना आवश्यक है। इसके पैरा 31 में कहा गया है, चर्चा से तीन बातें सामने आती हैं। एक, पेंशन न तो एक इनाम है और न ही अनुग्रह की बात है जो कि नियोक्ता की इच्छा पर निर्भर हो। यह 1972 के नियमों के अधीन, एक निहित अधिकार है जो प्रकृति में वैधानिक है, क्योंकि उन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 148 के खंड '50' का प्रयोग करते हुए अधिनियमित किया गया है। पेंशन, अनुग्रह राशि का भुगतान नहीं है, बल्कि यह पूर्व सेवा के लिए भुगतान है। यह उन लोगों के लिए सामाजिक, आर्थिक न्याय प्रदान करने वाला एक सामाजिक कल्याणकारी उपाय है, जिन्होंने अपने जीवन के सुनहरे दिनों में, नियोक्ता के इस आश्वासन पर लगातार कड़ी मेहनत की है कि उनके बुढ़ापे में उन्हें ठोकरें खाने के लिए नहीं छोड़ दिया जाएगा। 

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