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मोदी ने खींच दी 2019 के लिए बड़ी लकीर

Sat, 11 Mar 2017 04:38 PM IST
सुदीप ठाकुर/ अमर उजाला, दिल्ली
सुदीप ठाकुर/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Sat, 11 Mar 2017 04:38 PM IST
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Election Results 2017: pm modi draws clear line for 2019 elections
एक्जिट पोल के आधार पर मैंने लिखा था कि 'ब्रांड मोदी' की चमक फीकी पड़ती दिख रही है। मैंने जब यह लिखा था, उस समय तक चाणक्य और एकाध अन्य एजेंसी के एक्जिट पोल नहीं आए थे, जिनमें उत्तर प्रदेश में भाजपा को 285 या 250 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया था।
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नतीजों ने एक्जिट पोल को काफी हद तक गलत साबित कर दिया है। किसी भी एक्जिट पोल ने भाजपा को तीन सौ सीटें नहीं दिखाई थी और न ही किसी ने सपा-कांग्रेस गठबंधन को सौ से नीचे या बसपा को पचास से कम सीटें दिखाई थीं। नतीजे भाजपा के लिए भी चौंकाने वाले हैं, क्योंकि पार्टी के कुछके नेताओं को छोड़ दिया जाए, तो किसी ने भी तीन सौ सीटों का अनुमान नहीं जताया था।
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नतीजों ने दिखाया है कि भारतीय राजनीति में आज नरेंद्र मोदी सबसे बड़ा ब्रांड हैं और उनकी चमक बरकरार है। उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिली ये जीत मई, 2014 में लोकसभा चुनाव में उसे इस सूबे में मिली सीटों जैसी है।
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नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने यह चुनाव जिस तरह से लड़ा, उसकी काट विपक्ष ढूंढ नहीं सका। इस चुनाव के बाद कुछ महीने में राज्यसभा का गणित भी बदल जाएगा। इसके बाद शायद भाजपा को विपक्षी दलों की मदद की जरूरत भी न पड़े। विपक्ष की इन चुनावों में जो हालत हुई है, उसके बाद भाजपा और मोदी के समक्ष कोई बड़ी चुनौती भी नहीं होगी। आप इसे लहर कहें, सुनामी कहें या आंधी, मगर हकीकत यही है कि मोदी ने देश की राजनीति में इतनी बड़ी लकीर खींच दी है कि उसे 2019 में विपक्ष का लांघ पाना मुश्किल है।

मोदी के पास अवसर है कि वे तीन कदम उठाएं

Election Results 2017: pm modi draws clear line for 2019 elections
ध्यान रहे, भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 403 में से एक भी सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था, इसके बावजूद उसने तीन सौ का आंकड़ा पार किया है। वहीं मुस्लिमों को 90 से अधिक सीटें देने वाली बसपा 20 सीटें भी हासिल नहीं कर सकी है। इस चुनाव ने दिखाया है कि नोटबंदी को लेकर आर्थिक आंकड़े चाहे कुछ भी हों, विश्लेषक चाहे कुछ कहें, इसका असर आम मतदाताओं पर नहीं पड़ा है।

मोदी खासतौर से निचले तबके के मतदाताओं को यह समझाने में सफल रहे हैं कि नोटबंदी ने वह कर दिखाया है, जिसके नारे कम्युनिस्ट पार्टियां लगाती रही हैं। आखिर भाजपा नेत्री उमा भारती ने इस कदम के लिए मोदी की मार्क्स से ही तुलना कर दी थी!

मगर हम सब जानते हैं कि मोदी मार्क्स नहीं हैं। मोदी मोदी हैं और उन्होंने 2002 के बाद लंबा सफर तय किया है। मई, 2014 ने इस देश को एक नया नेता दिया था, तो उत्तर प्रदेश के चुनाव ने दिखाया कि वह नेता कितना आदमकद है। वास्तव में इन नतीजों ने मोदी पर कहीं अधिक बोझ लाद दिया है।

इसमें भला क्या शक करना कि वह आज देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं, लेकिन क्या उन्हें जैसा कि अंग्रेजी का एक शब्द है (जिसके बराबर का हिंदी का शब्द नहीं मिलता) 'स्टेट्समैन'कहा जा सकता है? मोदी का महिमामंडन करने वाले ऐसा कह सकते हैं, लेकिन मोदी ने अभी तक स्टेट्समैन जैसा व्यवहार नहीं किया है।

उनके पास अवसर है कि वे तीन कदम उठाएं, पहला विपक्षी या विरोधियों के प्रति थोड़ी उदारता बरतें, दूसरा देशभर में राष्ट्रवाद को लेकर उभरती संकीर्ण परिभाषा को खारिज करें और तीसरा अल्पसंख्यकों खासतौर से मुस्लिमों के मन में यह विश्वास पैदा करें कि वे भी उनके 'सबका साथ सबका विकास' के नारे का हिस्सा हैं। क्या वे ऐसा करेंगे?

विपक्ष की चुनौती बढ़ी

Election Results 2017: pm modi draws clear line for 2019 elections
पांच राज्यों के चुनावों को लेकर यह भी कयास लगाए गए थे, कि इनके नतीजों के आधार पर देश को 2019 के लिए मोदी के मुकाबले के लिए विपक्ष का कोई नेता भी देंगे, मगर ऐसा नहीं हो सका। मैंने खुद भी लिखा था कि ये चुनाव अखिलेश यादव, राहुल गांधी, मायावती और अरविंद केजरीवाल के लिए मौका हैं, जिसके जरिये वह विपक्ष की जगह भर सकते हैं।

सपा-कांग्रेस गठबंधन की इस चुनाव में जो हालत हुई है, उसके बाद सपा के भीतर अखिलेश के खिलाफ आवाज उठनी शुरू हो गई हैं। बेशक, अखिलेश के पास अभी उम्र है, मगर 2019 से पहले हुआ ये सेमीफाइनल मैच हार चुके हैं। 20 से भी कम सीटें मिलने के कारण मायावती भी उस स्थिति में नहीं रह गई हैं, जो विपक्षी एकता की धुरी बन सकें।

आम आदमी पार्टी को पंजाब में 20 से अधिक सीटें मिलती दिख रही, मगर अरविंद केजरीवाल कोई बड़ा चमत्कार नहीं कर पाए। गोवा में भी आप कुछ नहीं कर सकी। केजरीवाल ने पंजाब चुनाव के दौरान ही अगला मुकाम गुजरात को बताया था, मगर इन नतीजों के बाद उन्हें अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने की जरूरत होगी। आप ने भारतीय राजनीति में जगह तो बना ली है, मगर उसकी अनुभवहीनता उसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा है।

पंजाब में कांग्रेस ने करीब दो तिहाई बहुमत हासिल कर लिया है, लेकिन इस जीत का श्रेय कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ ही अकाली-भाजपा गठबंधन के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान को जाता है। पार्टी भले ही इसका श्रेय राहुल गांधी को दे, मगर वह एक बार फिर नाकाम साबित हुए हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की जो दुर्गति हुई है, उससे उसके लिए 2019 में अमेठी और रायबरेली सीटों को बचाने के लिए अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए!

इस चुनाव में सर्वाधिक नुकसान किसी का हुआ है, तो वह हैं मायावती। मई, 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में उसे हुए नुकसान की भरपाई तो और मुश्किल है। वह विपक्ष की गोलबंदी के विमर्श में अब शायद ही कोई अहम भूमिका निभा सकें।
पांच राज्यों के चुनाव ने विपक्ष की खाली जगह को और गहरा किया है।
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