Shiv Sena: शिवसेना पर चुनाव आयोग के फैसले में संविधान विशेषज्ञ ने बताई खामी, पूर्व चुनाव आयुक्तों ने किया बचाव
कुरैशी ने बताया कि पार्टी में फूट की स्थिति में जिसके पास बहुमत होता है, वही विजेता माना जाता है। अगर एक गुट ही पार्टी है तो वहां बंटवारे का सवाल ही नहीं उठता।
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बीते दिनों चुनाव आयोग ने अपने एक अहम फैसले में शिवसेना के एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना मानते हुए उसे पार्टी का चुनाव चिन्ह धनुष बाण देने का फैसला किया था। चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के फैसले को स्टे करने से इनकार कर दिया। ऐसे में ये चर्चा शुरू हो गई है कि चुनाव आयोग का फैसला कितना सही है। संविधान विशेषज्ञ पीडीटी अचारी का मानना है कि चुनाव आयोग का फैसला त्रुटिपूर्ण है। वहीं दो पूर्व चुनाव आयुक्तों ने आयोग के फैसले को सही ठहराया है।
चुनाव आयुक्तों ने चुनाव आयोग के फैसले का सही बताया
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने शिवसेना मामले पर चुनाव आयोग के फैसले को सही बताया। उन्होंने कहा कि आयोग हमेशा ऐसे मामलों में सादिक अली सुप्रीम कोर्ट मामले का पालन करता है। साथ ही उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि ऐसे मामलों पर चुनाव आयोग का फैसला ही मान्य है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के फैसले को स्टे भी नहीं किया है।
वहीं पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने भी चुनाव आयोग के फैसले का समर्थन किया है। जुलाई 2010 से जून 2012 के बीच देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एसवाई कुरैशी ने कहा कि चुनाव आयोग का फैसला नियमों के तहत लिया गया है। हमेशा विधायकों और सांसदों की संख्या ही ऐसे मामलों में निर्णायक साबित होती हैं। साल 1971 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कुरैशी ने बताया कि पार्टी में फूट की स्थिति में जिसके पास बहुमत होता है, वही विजेता माना जाता है। अगर एक गुट ही पार्टी है तो वहां बंटवारे का सवाल ही नहीं उठता। हालांकि उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट द्वारा विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने के मामले पर सुनवाई के बाद चुनाव आयोग फैसला देता तो ज्यादा ठीक रहता।
क्या था चुनाव आयोग का फैसला
चुनाव आयोग ने अपने फैसले में एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना माना था। चुनाव आयोग ने जांच में पाया कि 2019 विधानसभा चुनाव के दौरान शिवसेना के 55 विधायकों को जो कुल वोट मिले थे, उनमें से 76 फीसदी वोट शिंदे गुट के विधायकों के पास थे। वहीं उद्धव ठाकरे गुट के विधायकों को 23.5 फीसदी वोट ही मिले थे। यही वजह थी कि तीन सदस्यों वाले आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट के पक्ष में फैसला दिया।
संविधान विशेषज्ञ ने बताई फैसले की कमी
संविधान विशेषज्ञ और पूर्व लोकसभा महासचिव पीडीटी अचारी ने शिवसेना मामले पर चुनाव आयोग के फैसले को त्रुटिपूर्ण बताया है। अचारी ने कहा कि चुनाव आयोग ने अपने फैसले में शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट के संगठन की ताकत को नजरअंदाज किया। चुनाव आयोग को पार्टी के विधायी विंग के साथ ही संगठनात्मक विंग की ताकत को भी आधार बनाना चाहिए था। चुनाव आयोग ने सिर्फ विधायी ताकत के आधार पर एकनाथ शिंदे गुट के पक्ष में फैसला सुनाया। अचारी ने ये भी कहा कि चुनाव आयोग ने पार्टी के संविधान को लेकर भी टिप्पणी की लेकिन चुनाव आयोग किसी राजनैतिक पार्टी के ढांचे और उसके कामकाज पर टिप्पणी नहीं कर सकता है।
चुनाव आयोग का तर्क
चुनाव आयोग ने अपने फैसले में कहा था कि शिवसेना का संविधान लोकतांत्रिक तरीके से काम नहीं कर रहा था और सभी शक्तियां शीर्ष व्यक्ति (ठाकरे) के पास थीं। फैसले में कहा गया कि पार्टी संस्थापक बाला साहेब ठाकरे के निधन के बाद पार्टी संविधान में संशोधन किया गया, जो कि अलोकतांत्रिक तरीके से हुआ और पार्टी में पदाधिकारियों की नियुक्ति भी मनमाने ढंग से की गई। आयोग ने कहा कि पार्टी के संविधान में कई बार संशोधन किए गए। आयोग ने बताया कि इसी वजह से उन्होंने शिवसेना की संगठन की ताकत को अपने फैसले में शामिल नहीं किया।