चुनाव आयोग में विवादों की कहानी: 'दो गधे' वाले बयान से खींचतान, 1989 से अब तक सीईसी-आयुक्तों में टकराव क्यों?
चुनाव आयोग में सीईसी और दूसरे आयुक्तों के बीच मतभेद कोई नई बात नहीं है। 1989 में बहुसदस्यीय आयोग बनने के बाद विवाद शुरू हुए और 1993 में टीएन शेषन ने गिल व कृष्णमूर्ति को दो गधे तक कह दिया। इसके बाद गोपालस्वामी-चावला और लवासा-अरोड़ा विवाद सामने आए। अब मौजूदा आयोग में कथित आपत्तियों की चर्चा है। आखिर 1989 से अब तक चुनाव आयोग में टकराव क्यों होते रहे? आइए, सबकुछ विस्तार से समझते हैं...
विस्तार
चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी और दूसरे चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद की कहानी नई नहीं है। आयोग के बहुसदस्यीय बनने के बाद से ही अधिकार और कामकाज को लेकर कई बार टकराव सामने आया। इस पूरी कहानी में टीएन शेषन का दौर सबसे ज्यादा चर्चित रहा, जब उन्होंने एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को लेकर इतनी तीखी नाराजगी जताई। उन्होंने उन दोनों को अपने कार्यालय के दो गधे तक कह दिया था।
इसके बाद भी आयोग में मतभेद के कई मामले सामने आए। एन गोपालस्वामी और नवीन चावला के बीच विवाद से लेकर 2019 में अशोक लवासा और सुनील अरोड़ा के बीच मतभेद तक, अलग-अलग दौर में आयोग के अंदर की खींचतान सार्वजनिक होती रही है। अब मौजूदा दौर में भी आयोग के भीतर कथित असहमतियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में 1989 से अब तक की इस पूरी कहानी को समझना जरूरी है। आइए, सबकुछ
1989 में बहुसदस्यीय चुनाव आयोग बना तो विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
- अक्तूबर 1989 में एसएस धनाओआ और वीएस सीगल को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। उस समय आरवीएस पेरी शास्त्री मुख्य चुनाव आयुक्त थे।
- शास्त्री ने सार्वजनिक तौर पर इस व्यवस्था को लेकर कुछ नहीं कहा, लेकिन ऐसा माना गया कि उन्हें लगा कि दो नए आयुक्तों की नियुक्ति से उनके अधिकार सीमित हो रहे हैं।
- यह व्यवस्था ज्यादा समय तक नहीं चली और जनवरी 1990 तक दोनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति रद्द कर दी गई। इसके बाद चुनाव आयोग फिर एक सदस्यीय संस्था बन गया।
- कुछ ही वर्षों बाद बहुसदस्यीय व्यवस्था दोबारा लाई गई। 1993 में टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे और एमएस गिल तथा जीवीजी कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त बनाया गया।
- इसके बाद शेषन और दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच लगातार टकराव सामने आया। शेषन इन नियुक्तियों को अपने कार्यालय की स्वतंत्रता पर सीधा हमला मानते थे।
- उन्होंने दोनों नए आयुक्तों को स्वीकार करने से इनकार किया और उनके साथ आयोग के कामकाज को लेकर भी दूरी बनाए रखी।
शेषन ने गिल और कृष्णमूर्ति को दो गधे क्यों कहा था?
शेषन के कार्यकाल में सीईसी और दूसरे चुनाव आयुक्तों के बीच विवाद खुलकर सामने आया। दिए गए विवरण के अनुसार, शेषन ने एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति के साथ आयोग के आधिकारिक दस्तावेज साझा नहीं किए। उन्हें महत्वपूर्ण बैठकों में शामिल नहीं किया गया और आयोग से जुड़ा काम भी नहीं दिया गया। मीडिया से बातचीत में भी शेषन ने दोनों पर तीखी टिप्पणियां कीं। उन्होंने दोनों चुनाव आयुक्तों को अपने कार्यालय के दो गधे कहा।
यह बयान उस समय आयोग के भीतर चल रही खींचतान की गंभीरता को दिखाता है। विवाद केवल व्यक्तिगत मतभेद तक सीमित नहीं था। इसके केंद्र में यह सवाल भी था कि बहुसदस्यीय आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकार क्या होंगे और दूसरे चुनाव आयुक्तों की भूमिका कितनी होगी। शेषन ने सरकार के साथ अपने विवाद के बारे में भी विस्तार से बताया था। उनके अनुसार, चुनावी काम के लिए कर्मचारियों की जरूरत और उन पर अनुशासनात्मक नियंत्रण के अधिकार को लेकर सरकार से लंबे समय तक मतभेद रहा। उन्होंने कर्मचारियों को दंड देने की अपनी शक्ति पर सवाल उठाए जाने का भी जिक्र किया था।
शेषन और सरकार के बीच टकराव इतना बढ़ा कैसे?
- शेषन के अपने बयान के अनुसार, सरकार के साथ उनका विवाद कई मुद्दों पर लगातार बढ़ता गया था। उन्होंने बताया था कि उन्होंने चुनावी काम के लिए कर्मचारियों की जरूरत और उन पर नियंत्रण को लेकर सरकार से स्पष्ट आदेश मांगा था। उनका कहना था कि 1988 में कानून में चुनाव आयोग के अनुशासन से जुड़ा प्रावधान जोड़ा गया था, लेकिन जब उन्होंने कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की तो उनकी दंड देने की शक्ति पर सवाल उठाए गए। उन्होंने प्रधानमंत्री से इस मामले में कानूनी राय लेने को कहा था।
- उनके मुताबिक, उन्हें आदेश देने का भरोसा दिया गया, लेकिन लंबे समय तक आदेश नहीं आया। बाद में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती और चुनाव कराने के अधिकार को लेकर भी सरकार से मतभेद हुआ। शेषन के अनुसार, जब उन्हें केंद्रीय बल मांगने का अधिकार नहीं होने की बात कही गई तो उन्होंने चुनाव टाल दिए। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। शेषन ने बताया था कि अदालत ने अंतरिम आदेश में उनकी स्थिति को सही माना। इसके बाद उन्होंने चुनाव दोबारा कराने का फैसला किया। बाद में बहुसदस्यीय आयोग की व्यवस्था लागू किए जाने के साथ उनका टकराव और बढ़ गया।
सुप्रीम कोर्ट ने सीईसी और दूसरे आयुक्तों की भूमिका पर क्या कहा था?
टीएन शेषन ने सरकार की ओर से चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। 1995 में अदालत ने सीईसी और दूसरे चुनाव आयुक्तों की स्थिति, अधिकार और निर्णय लेने की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण व्यवस्था दी। इसके अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्तों को दर्जे, शक्तियों और निर्णय लेने के अधिकार के मामले में बराबर माना गया। सीईसी को समानों में प्रथम यानी फर्स्ट अमंग इक्वल्स कहा गया।
इसका मतलब यह था कि बहुसदस्यीय आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त को दूसरे आयुक्तों से ऊपर अलग तरह की निर्णायक शक्ति वाला सदस्य नहीं माना गया। आयोग के फैसलों में दूसरे चुनाव आयुक्तों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। शेषन के दौर का विवाद इसलिए भी अहम रहा, क्योंकि इसी दौर में यह सवाल बहुत मजबूती से सामने आया कि चुनाव आयोग के भीतर अधिकारों का बंटवारा किस तरह होना चाहिए। इस विवाद ने आगे के वर्षों में आयोग के कामकाज और उसके सदस्यों के बीच मतभेदों को समझने का आधार भी तैयार किया।
2006 से 2009 के बीच गोपालस्वामी और नवीन चावला में क्या विवाद हुआ?
चुनाव आयोग के भीतर अगला बड़ा विवाद तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी और चुनाव आयुक्त नवीन चावला के बीच सामने आया। यह विवाद 2006 से 2009 के बीच चला। अपने कार्यकाल के खत्म होने से कुछ महीने पहले गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर चावला को हटाने की सिफारिश की। उन्होंने चावला पर कांग्रेस के प्रति पक्षपात का आरोप लगाया।
गोपालस्वामी ने आरोप लगाया कि चावला आयोग की बैठकों से जुड़ी जानकारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं तक पहुंचाते थे। उनके आरोप के अनुसार, वह आयोग की बैठकों के दौरान कई बार ‘टॉयलेट ब्रेक’ लेकर यह जानकारी देते थे। हालांकि तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने गोपालस्वामी की सिफारिश को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद नवीन चावला ने गोपालस्वामी के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला। इस पूरे विवाद ने भी आयोग के सदस्यों के बीच मतभेद, राजनीतिक पक्षपात के आरोप और संस्था की निष्पक्षता को लेकर बहस को सामने ला दिया।
2019 में अशोक लवासा और सुनील अरोड़ा के बीच मतभेद क्यों चर्चा में आए?
- 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा और चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के बीच मतभेद चर्चा में आए। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतों से जुड़े कुछ मामलों में अलग राय दी थी।
- रिपोर्टों के अनुसार, उनकी राय को आयोग के फैसलों में जगह नहीं मिली और उनकी असहमति की टिप्पणी सार्वजनिक नहीं की गई। इसके बाद चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया था कि असहमति की टिप्पणियां आयोग के अर्ध-न्यायिक आदेशों में ही सार्वजनिक की जाती हैं। लवासा ने 18 अगस्त 2020 को अपने कार्यकाल से करीब दो साल पहले इस्तीफा दे दिया।
- बाद में वह मनीला स्थित एशियाई विकास बैंक में उपाध्यक्ष बने। इसके बाद अरुण गोयल भी कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव आयुक्त के पद से इस्तीफा देने वाले प्रमुख नाम बने। उन्होंने 9 मार्च 2024 को इस्तीफा दिया और निजी कारणों को वजह बताया। हालांकि उनके इस्तीफे को लेकर तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के साथ संबंधों को लेकर अटकलें भी लगती रहीं।
मौजूदा दौर में चुनाव आयोग के अंदर मतभेद की चर्चा क्यों हो रही?
मौजूदा चुनाव आयोग को लेकर भी अंदरूनी मतभेदों की चर्चा सामने आई है। दिए गए इनपुट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 मौकों पर कुछ फैसलों और आदेशों को लेकर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। उनका दावा था कि कुछ फैसले और आदेश उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए। इन आपत्तियों में वैधानिक मतदाता पंजीकरण फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता सूची के डेटाबेस के केंद्रीकृत नियंत्रण जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
चुनाव आयोग ने कहा है कि विचारों में अंतर किसी भी विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा है और अंतिम फैसले, जिसमें विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से जुड़े फैसले भी शामिल हैं, सर्वसम्मति से लिए गए हैं। संधू और जोशी ने अपने नाम से जुड़ी इन आपत्तियों पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है। वहीं विपक्षी दलों ने एसआईआर के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने और सत्तारूढ़ भाजपा के पक्ष में काम करने के आरोप लगाए हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज कर दिया।