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6 महीने में 40 फीसदी तक महंगा हुआ अखबारी कागज, 52,000 प्रति टन तक पहुंचे दाम

Sat, 10 Mar 2018 10:58 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 10 Mar 2018 10:58 AM IST
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during last 6 month newspaper sheet price hiked by 40 percent
अखबार

अखबारों की छपाई के लिए आयात किया जाने वाला कागज दिन-प्रतिदिन महंगा होता जा रहा है। पिछले छह माह में कीमतों में 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। यह 52 हजार रुपये प्रति टन तक पहुंच गई है। एक साल पहले अखबारी कागज का दाम 33 हजार रुपये प्रति टन था। सबसे ज्यादा समाचारपत्र प्रकाशित करने वाले देशों में शामिल भारत अखबारी कागज की आधी जरूरत आयात से पूरी करता है। भारत में हर साल 28 लाख टन अखबारी कागज की आवश्यकता होती है, जबकि लगभग 14 लाख टन का ही उत्पादन हो पाता है। 

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पिछले साल की शुरुआत में भारत को 33,500 रुपये प्रति टन की दर से अखबारी कागज का निर्यात हो रहा था। इसमें डिलीवरी की लागत जोड़ देने पर दाम 36,000 से 37,000 रुपये प्रति टन तक पहुंच जाते थे। अक्टूबर 2017 से इसमें तेजी का दौर शुरू हुआ। इस समय दाम 52,000 रुपये प्रति टन पर पहुंच गए हैं। दरअसल, ज्यादा दाम मिलने के चलते अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों ने चीन को अखबारी कागज की आपूर्ति बढ़ा दी है। वहीं अमेरिका में अखबारी कागज के उत्पादन पहले के मुकाबले कम हो रहा है। इसके उलट, पिछले पांच साल में भारत में अखबारी कागज का आयात बढ़ा है। 2012 में यह 12.39 लाख टन था जबकि 2016 में 14.33 लाख टन पर पहुंच गया है।
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वैश्विक उत्पादन गिरा

दुनिया भर में अखबारी कागज के उत्पादन और मांग में गिरावट का दौर है। संयुक्त राष्ट्र के फूड एवं एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ) के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2013 में 289.6 लाख टन उत्पादन के मुकाबले मांग 287.4 लाख टन रही। 2014 में उत्पादन गिरकर 269.6 लाख टन पर आ गया। खास बात यह है कि मांग भी उत्पादन के सापेक्ष कम होती जा रही है। 2014 में अखबारी कागज की मांग महज 268.6 लाख टन ही रही। 2015 में यह आंकड़ा और गिरकर 248.6 लाख टन पर आ गया। हालांकि उस वर्ष मांग उत्पादन के लगभग बराबर रही। 2016 में मांग के मुकाबले उत्पादन कम रहा। यहां 239.6 लाख टन की मांग के मुकाबले उत्पादन 239.4 लाख टन ही हुआ।
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मिलों के बंद और यूरो के महंगा होने की पड़ रही मार

अमेरिका, कनाडा, यूरोप और रूस से सबसे ज्यादा अखबारी कागज का निर्यात होता है। अमेरिका और यूरोप में पिछले कुछ साल में न्यूजप्रिंट बनाने वाली कंपनियां बंद हुई हैं। इसके अलावा यूरो लगातार महंगा हो रहा है। इससे यूरोपीय कंपनियों का मार्जिन घट गया है, इसलिए वे ज्यादा दाम मांग रही हैं। चीन के लिए आपूर्ति बढ़ने से भी भारत को होने वाले अखबारी कागज के निर्यात में कमी आई है।

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