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फैसला लिखते समय कंजूसी न दिखाएं अदालतें: सुप्रीम कोर्ट
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sun, 29 Jul 2018 01:04 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने सभी अदालतों से अपील की है कि फैसला ऐसा लिखा जाना चाहिए कि जीतने वाले पक्ष को जीत का कारण पता चल सके और हारने वाले को हार का कारण। उन्हें फैसला लिखने में किसी तरह की ‘कंजूसी’ नहीं दिखानी चाहिए। न्यायमूर्ति अभय मोहन सप्रे और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि अदालतों को हर मामले में तार्किक फैसला देना चाहिए। फैसले में मामले का तथ्य होना चाहिए। पक्षकारों की दलीलें होनी चाहिए।
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मामले में कानूनी सिद्धांत लागू करने और किन आधारों पर फैसला किया गया, इसका जिक्र जरूर होना चाहिए। पीठ ने कहा कि फैसले में इन तथ्यों का अभाव सही नहीं है क्योंकि ऐसे फैसलों में यह पता नहीं चल पाता है कि आखिर एक पक्ष क्यों जीता और दूसरे पक्ष की हार क्यों हुई। विस्तृत जानकारी के बिना लिखे फैसलों का कोई औचित्य नहीं है। इन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एक फैसले पर आपत्ति जताते हुए यह तल्ख टिप्पणी की है। पीठ ने पाया कि हाईकोर्ट की पीठ ने बिना तार्किक विश्लेषण, बिना आधार बताए और दोनों पक्षों की दलीलों पर गौर किए बिना फैसला लिया। मामला प्रदेश की एक कंपनी द्वारा अपने कुछ कर्मचारियों के खाते में कम भविष्य निधि (पीएफ) जमा करने से संबंधित है। इस पर केंद्रीय न्यासी बोर्ड ने कंपनी को ब्याज सहित पीएफ की रकम जमा करने का निर्देश दिया था। इस निर्णय को कंपनी ने ईपीएफ अपीलीय न्यायाधिकरण को चुनौती दी।
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न्यायाधिकरण ने कंपनी के हक में फैसला देते हुए केंद्रीय न्यासी बोर्ड के आदेश को दरकिनार कर दिया। इसके बाद बोर्ड ने न्यायाधिकरण के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी। न्यासी बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। बोर्ड के वकील दुष्यंत पाराशर की ओर से दलील दी गई कि हाईकोर्ट को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए था।
साथ ही उन्होंने कहा कि बिना कोई तर्क व आधार बताए हाईकोर्ट ने फैसला दे दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने बिना न्यायिक दिमाग लगाए फैसला दिया है। लिहाजा सुप्रीम कोर्ट ने मामले को दोबारा हाईकोर्ट के पास भेजते हुए नए सिरे से याचिका पर गौर करने के लिए कहा है।