विवादित रहा राजनीतिक सफर, फिर भी समर्थक करते थे 'अम्मा' की पूजा
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जयललिता के राजनीतिक करियर से कई विवाद जुड़े रहे हैं लेकिन अपने लोकलुभावन और गरीब समर्थक नीतियों की वजह से उनके समर्थक लगभग उनकी पूजा करते हैं। जयललिता ने 1982 में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) से जुड़ कर राजनीति की शुरुआत की थी।
इस पार्टी की नींव करिश्माई नेता एम जी रामचंद्रन में रखी थी। अभिनय की दुनिया से राजनीति में आईं जयललिता ने क डलोर में अपने पहले भाषण में महिलाओं की महानता पर बोला था और इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। एक साल बाद ही जयललिता को पार्टी का प्रोपगंडा सेक्रेट्री बना दिया गया।
उन्होंने पार्टी के लिए तिरुचेंदुर उप चुनाव में पार्टी के लिए जम कर प्रचार किया। इसके बाद उन्हें पहली बार 1984 में पार्टी की ओर से राज्यसभा में भेजा गया। यह उनकी राजनीति का अहम मोड़ साबित हुआ। इसी साल स्ट्रोक की वजह से पार्टी के सबसे बड़े नेता एम जी रामचंद्रन राजनीतिक कामकाज में अक्षम हो गए।
उन्हें अमेरिका के अस्पताल में भर्ती कराया गया। कहा जाता है कि इधर जयललिता ने राजीव गांधी से मुलाकात कर खुद को मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर दी।
जयललिता 1991 में पहली बार सीएम बनीं
बाद के दिनों में एमजीआर से बढ़ते विवाद की वजह से जयललिता को पार्टी में दिए गए पदों को छीन लिए गए। हालांकि एमजीआर की अनुपस्थिति में उन्होंने अन्नाद्रमुक को उसी साल लोकसभा और फिर बाद में विधानसभा चुनावों में शानदार जीत दिलाई।
एमजीआर के निधन के बाद पार्टी दो फाड़ हो गई और एक गुट का नेतृत्व एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन के हाथ में आ गया। पार्टी के 132 समर्थकों में से 97 के समर्थन से वह मुख्यमंत्री बन गईं। लेकिन उनकी सरकार 21 दिन ही चल पाई। राजीव गांधी ने 1988 में राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया।
जयललिता 1991 में पहली बार सीएम बनीं। हालांकि उनका पहला कार्यकाल विवादों से घिरा रहा। उन पर विवादास्पद जमीन सौदे, ग्रेनाइट खनन में फंड के दुरुपयोग, आय के ज्ञात स्त्रोतों से ज्यादा धन इकट्ठा करने का आरोप लगा और 1996 में वह चुनाव हार गईं। उनकी पार्टी को सिर्फ चार सीटें मिलीं।
राजनीतिक करियर पर लगते रहे भ्रष्टाचार के दाग
जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने अदालत में जयललिता पर आय से अधिक संपत्ति के मामले में एक निजी शिकायत दर्ज कराई थी। इस संबंध में चले मुकदमे में जयललिता गिरफ्तार हो गईं और उन्हें एक साल की जेल की सजा हुई। 2000 में वह रिहा हो गईं ।
उन्हें कुछ मामलों में बरी कर दिया गया लेकिन अभी भी कुछ मामले उन पर चल रहे हैं। जयललिता को 2001 में भारी बहुमत से विजयी हुईं और वह मुख्यमंत्री बनीं लेकिन कोर्ट में लंबित मामलों की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियुक्ति रद्द कर दी।
ओ पनीरसेलवम को उनकी जगह मुख्यमंत्री बनाया गया। 2003 में मद्रास हाई कोर्ट ने उन्हें कई मामलों मे बरी कर दिया और वह फिर सीएम बन गईं। उन्होंने अंडीपट्टी क्षेत्र से उपचुनाव जीता। इसके बाद उनकी पार्टी चुनाव हार गई।
2011 में अन्नाद्रमुक एक बार फिर सत्ता में आई। तीसरी बार जयललिता सीएम बनीं। हालांकि उनके राजनीतिक करियर पर भ्रष्टाचार का दाग लगा रहा।
तमिलनाडु में 'अम्मा' को मसीहा की हैसियत
2014 में एक बार फिर उन्हें आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में कर्नाटक हाई कोर्ट की ओर से चार साल की सजा और 100 करोड़ रुपये के जुर्माने का सामना करना पड़ा। हालांकि एक महीने जेल में रहने के दौरान उनकी अनुपस्थिति में पनीर सेलवम में सीएम बने रहे।
जयललिता फिर 2016 में सीएम बनीं। 32 साल में यह पहली बार है जब कोई निर्वाचित सीएम को लगातार जेल की सजा काटनी पड़ी। बहरहाल, जयललिता का राजनीतिक करियर भले विवादों से घिरा रहा लेकिन तमिलनाडु में उन्हें मसीहा की हैसियत हासिल है।
लोग उनकी पूजा करते हैं। उनके लोकलुभावन और गरीब समर्थक कार्यक्रमों के वजह से उन्हें अपार जनसमर्थन हासिल है। अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान राज्य में जिस तरह उनके समर्थक उनके स्वस्थ होने की कामना कर रहे थे उससे उनकी लोकप्रियता का अंदाजा लगया जा सकता है।