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खोज: लाखों साल की जुदाई, एक जैसी पुकार...शायद पक्षियों ने रखी भाषा की नींव

Fri, 10 Oct 2025 05:28 AM IST
शिवम गर्ग अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क Published by: शिवम गर्ग Updated Fri, 10 Oct 2025 05:28 AM IST
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Discovery: Despite Millions of Years Apart, Birds Share Similar Calls; Study Foundation of Human Language
bird - फोटो : freepik

दुनिया के चार महाद्वीपों में बसे ऐसे पक्षी जो लाखों साल पहले एक-दूसरे से जुदा हो चुके हैं, आज भी एक जैसी चेतावनी भरी पुकार निकालते हैं वह भी तब, जब उनके घोंसलों के पास कोई चालाक परजीवी पक्षी मंडरा रहा हो। यह पुकार केवल एक आवाज नहीं बल्कि सहयोग की भाषा है, जिसे वे सामाजिक रूप से सीखते हैं और साझा खतरे के खिलाफ एकजुट होकर प्रयोग करते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है यह वही व्यवहार है, जिसने शायद कभी इन्सानी भाषा की नींव रखी होगी।

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पक्षियों की दुनिया में हुई ताजा खोज ने वैज्ञानिकों के सामने एक रोमांचक सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भाषा का बीज प्रकृति में बहुत पहले बोया जा चुका था? कॉर्नेल यूनिवर्सिटी  और स्पेन के डोनाना बायोलॉजिकल स्टेशन के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया शोध बताता है कि लाखों वर्ष पहले अलग-अलग दिशाओं में उड़ चले पक्षी आज भी एक जैसी चेतावनी भरी पुकार का उपयोग करते हैं। यह शोध नेचर इकोलॉजी एंड एवोल्यूशन पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। कुछ पक्षी जैसे कोयल या कुक्कू अपने अंडे दूसरों के घोंसले में रख देते हैं। वे अपने बच्चों की परवरिश नहीं करते, बल्कि मेजबान पक्षी को धोखे में रखकर उसकी मेहनत का फायदा उठाते हैं। इस परजीवी व्यवहार से बचने के लिए कई प्रजातियों ने समय के साथ एक रणनीति विकसित कर ली। एक खास चेतावनी पुकार, जो सुनते ही आसपास के पक्षी तुरंत सतर्क हो जाते हैं और घोंसले के आसपास गश्त बढ़ा देते हैं। वैज्ञानिकों ने ऑस्ट्रेलिया, चीन, अफ्रीका और यूरोप के 20 से अधिक पक्षियों का अध्ययन किया। इन पक्षियों की चेतावनी कॉल लगभग एक जैसी थी।
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इस तरह सीखते हैं पक्षी चेतावनी पुकार
शोधकर्ताओं का कहना है,यह पुकार आधी जन्मजात है और आधी सीखी हुई। जब कोई पक्षी यह चेतावनी सुनता है तो वह सहज रूप से आसपास झांकने आता है। अगर उसे कोई परजीवी पक्षी दिखाई देता है तो वह समझ जाता है कि यह पुकार किस खतरे से जुड़ी है। बाद में जब वही स्थिति दोहराई जाती है, तो वह खुद भी वही पुकार निकालता है यानी उसने अर्थ सीख लिया। इसे वैज्ञानिक सामाजिक संचरण (सोशल ट्रांसमिशन) कहते हैं। एक ऐसा व्यवहार जो समाज में रहकर सीखा जाता है।

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इन्सानी कहानी की झलक
शोध सिर्फ पक्षियों की कहानी नहीं बताता, बल्कि यह इन्सान की कहानी की झलक भी देता है। संभव है, शुरुआती मनुष्य भी डर, चेतावनी या गुस्से जैसी भावनाओं को आवाजों में व्यक्त करते होंगे। धीरे-धीरे उन्होंने इन ध्वनियों को अर्थ देने शुरू किए और यहीं से भाषा का जन्म हुआ होगा। जैसे पक्षी एक सामान्य पुकार से एकजुट होकर खतरे को दूर भगाते हैं, वैसे ही इन्सानों ने शब्दों के जरिए एक-दूसरे से जुड़ना सीखा। यह खोज याद दिलाती है कि प्रकृति में भाषा और अर्थ का अंकुर बहुत गहराई तक फैला है। एक अन्य शोध से यह भी पता चला दुनिया के सबसे तेज आवाज वाले पक्षियों में व्हाइट बेल्ड बेलबर्ड और स्क्रीमिंग पिहा शीर्ष पर माने जाते हैं। बेल्ड बेलबर्ड की आवाज की तीव्रता करीब 125 डेसिबल मापी गई है  यानी एक रॉक कॉन्सर्ट या उड़ान भरते जेट इंजन जितनी तेज।

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