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महाराष्ट्र के नए क्षत्रप बने देवेंद्र फडणवीस, सीएम पद के रेस की बाधाओं को निपटाया

Sat, 05 Oct 2019 10:53 PM IST
आसिम खान डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आसिम खान Updated Sat, 05 Oct 2019 10:53 PM IST
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Devendra Fadnavis took CM post by defeating other BJP senior leaders in Maharashtra
देवेंद्र फडणवीस (फाइल फोटो) - फोटो : Facebook

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फणवीस ने चुनाव की घोषणा से पूर्व महाजनादेश यात्रा में दावा किया था कि वह ही फिर से मुख्यमंत्री बनेंगे। तब सूबे में भाजपा के कुछ नेताओं ने अंदरखाने इस पर चुटकी ली थी लेकिन, पांच बड़े नेताओं के पर कतरे जाने और कई मौजूदा विधायकों को घर बैठाए जाने के बाद उनका दावा सही साबित हुआ है। इससे अब प्रदेश में पार्टी के नेता दबी जुबान से कहने लगे हैं कि फडणवीस में दम है बाकी सब पानी कम हैं। 

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फडणवीस ने पार्टी में उन नेताओं से चुन चुनकर बदला लिया जो मुख्यमंत्री पद की रेस में थे। पहले रास्ते के कील कांटे दुरुस्त किया और फिर विधानसभा फतह करने के लिए निकल पड़े हैं। इस तरह महाराष्ट्र की राजनीति में देवेंद्र फडणवीस एक नए क्षत्रप के रूप में उभरे हैं। देवेंद्र फडणवीस ने प्रतिकूल परिस्थिति में गठबंधन की सरकार चलाते हुए बीते पांच साल में न सिर्फ विपक्षी दल कांग्रेस-एनसीपी की हर रणनीति की धार को कुंद किया बल्कि पार्टी के अंदर भी विरोधियों को चित कर नेतृत्व कौशल का लोहा मनवाया। 
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वह शिवसेना को भी साधने में सफल हुए और पार्टी में उन प्रतिद्वंदियों को भी आईना दिखाया जो मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे थे। फडणवीस को नागपुर से मुंबई आने के रास्ते मे जो भी कांटे दिखे उन कील कांटों को दुरुस्त कर सपाट रास्ता बना लिया है जो सीधा बिना किसी अवरोध के वर्षा बंगले (मुख्यमंत्री आवास) तक जाएगा। 
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दिवंगत भाजपा नेता प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे के साथ महाराष्ट्र में भाजपा की जमीन तैयार करने वालों में से एक पूर्व मंत्री एकनाथ खडसे 2014 के चुनाव के बाद ही मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे लेकिन पार्टी ने उन्हें किनारे कर देवेंद्र फडणवीस की ताजपोशी कराई। 

पुणे में जमीन घोटाले के एक आरोप में पहले उनसे मंत्री पद छिना और अब विधानसभा की उम्मीदवारी भी नहीं मिली। इस प्रखर नेता को अब जलगांव तक सीमित कर दिया गया है। न रहेंगे विधायक और न बनेंगे मुख्यमंत्री। दूसरे, विनोद तावड़े ऐसे मजबूत नेता हैं जिन्हें पार्टी ने उम्मीदवारी नहीं दी। तावड़े को महाराष्ट्र भाजपा में ताकतवर मराठा नेता माना जाता है, लेकिन पार्टी ने उन्हें भी किनारे कर दिया। फडणवीस मंत्रिमंडल में तावड़े खुद को ही प्रति-मुख्यमंत्री समझते थे। 

मंत्रालय सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री कार्यालय से आने वाली फाइल देखते ही बगल कर देने वाले तावड़े ने अपने दफ्तर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर तो लगाई थी लेकिन प्रोटोकॉल को धता बताते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री की तस्वीर को कभी अपने ऑफिस की शोभा नहीं बनने दिया। पहले फर्जी डिग्री मामले में निशाने पर आए। फिर जिस मुंबई बैंक पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया उसी बैंक से शिक्षकों के वेतन के आदेश से तावड़े अड़चन में आए। आखिरकार, उन्हें यह भारी पड़ गया।

तीसरे, मुंबई में गुजराती समाज के बड़े नेता के रूप में पहचान बनाने वाले निवर्तमान गृहनिर्माण मंत्री प्रकाश मेहता भी अब राजनीति में हाशिए पर चले गए हैं। छह बार विधायक रहे मेहता झोपड़पट्टी पुनर्वास योजना के एक घोटाले में क्या फंसे उनके राजनीतिक कैरियर को ग्रहण लग गया। शुरुआत में मेहता को फडणवीस ने अपना विश्वासपात्र माना लेकिन जल्द ही मेहता शक के दायरे में भी आ गए। फडणवीस की नाराजगी का नतीजा सामने है। 

नागपुर से तीन बार विधायक रहे निवर्तमान ऊर्जामंत्री चंद्रशेखर बावनकुले केंद्रीय मंत्री गडकरी के समर्थक माने जाते हैं, उनका भी पत्ता कट गया। दक्षिण मुंबई की कोलाबा सीट से विधायक और दर्जा प्राप्त कैबिनेट मंत्री रहे राज पुरोहित का टिकट कटना आश्चर्यजनक रहा। क्योंकि राजपुरोहित का मुंबई में राजस्थानी और उत्तर भारतीय समाज को पार्टी से जोड़ने में उल्लेखनीय योगदान रहा है। चार बार विधायक रहे पुरोहित की मुख्यमंत्री फडणवीस से अच्छे संबंध थे लेकिन उन्हें भी नही बख्शा गया। 

सम्भवतः गोपीनाथ मुंडे गुट और पार्टी के वरिष्ठ नेता होने के कारण उनका पर कतरा गया। माना जा रहा है कि चुनाव के बाद विधान परिषद की रिक्त होने वाली छह सीटों में से एक पर उनकी पुख्ता दावेदारी रहेगी। इस तरह देवेंद्र फडणवीस ने एक-एक कर पार्टी में अपने प्रतिद्वंद्वियों को घर बैठाकर साफ संदेश दे दिया है कि फिलहाल, वही महाराष्ट्र के क्षत्रप हैं।

चंद्रकांत पाटिल को मिला वफादारी का इनाम

फडणवीस मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्यों में से एक महाराष्ट्र भाजपा अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल भी एक समय में मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। लेकिन उन्होंने जल्द ही पाला बदल दिया था। पाटिल ने चतुराई से न केवल फडणवीस का हर कदम पर साथ दिया बल्कि पार्टी हाईकमान का भी दिल जीता। विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाकर उन्हें इसका ईनाम भी मिला।


इतना ही नहीं, फडणवीस ने खुद पाटिल के लिए सुरक्षित सीट की तलाश की और मौजूदा विधायक का टिकट काटकर पुणे की ब्राह्मण बाहुल्य सीट कोथरुड से चुनाव लड़ाने की तैयारी की। 

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