फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   development: after merger it took seven decades for Jammu Kashmir to be fully integrated with India

विकास की नई इबारत : विलय के बाद भी जम्मू-कश्मीर को भारत के साथ पूरी तरह जुड़ने में लग गए सात दशक

Sun, 06 Nov 2022 06:34 AM IST
योगेश साहू जम्मू से बविंद्र वशिष्ठ, नई दिल्ली।
जम्मू से बविंद्र वशिष्ठ, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Sun, 06 Nov 2022 06:34 AM IST
सार

कभी हिंदुस्तान की सबसे बड़ी रियासत रहा जम्मू-कश्मीर आजादी के बाद पांच विदेशी हमले और चार विभाजन झेल चुका है। करीब चार दशक से यह आतंकवाद और अलगाववाद के दंश से जूझ रहा है। विस्थापन के चलते कश्मीरी पंडितों के रूप में लाखों की आबादी 32 सालों से दर-ब-दर है। पाकिस्तान की साजिश और चीन की चुनौती के बीच सीमापार से आए दिन घुसपैठ व गोलाबारी का सामना यह प्रदेश करता रहा है। बीच में आती रही हैं बाढ़ व भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं। 75 सालों में कई बदलाव देख चुका जम्मू-कश्मीर अब नई इबारत लिख रहा है। आजादी के अमृत महोत्सव में अमर उजाला ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश सरीखे राज्यों के सफर पर नजर डाली थी। इस बार पेश है जम्मू-कश्मीर की यात्रा...

विज्ञापन
development: after merger it took seven decades for Jammu Kashmir to be fully integrated with India
kashmir - फोटो : istock

विस्तार

मौसम के हिसाब से रंग बदलते सैकड़ों सालों की उम्र लिए चिनार के पेड़ जम्मू-कश्मीर में हर बदलाव के गवाह हैं। इन्होंने यहां की शैव परंपरा, सूफी मत और कश्मीरियत को महसूस किया है। विदेशी आक्रमण देखे हैं, आतंकी हमले झेले हैं। चाहे वो बालटाल का रास्ता हो या पहलगाम का, अमरनाथ यात्रियों का सालों से चिनार का पत्ता-पत्ता इस्तकबाल करता रहा है। कभी आध्यात्मिक केंद्र रही वादी में चिनार ने इबादत स्थलों से रूह कंपाने वाली वो अलगावग्रस्त आवाजें भी सुनी हैं, जिन्होंने कश्मीरियत का गला घोंटा था। धरती के स्वर्ग में चार चांद लगाते चिनार अब बदलते जम्मू-कश्मीर में निकलते नए सूरज को भी देख रहे हैं।

विज्ञापन


आजादी से पहले तिब्बत और अफगानिस्तान तक फैली रियासत से 26 अक्तूबर, 1947 को भारत का राज्य बना जम्मू-कश्मीर आज केंद्रशासित प्रदेश है। इसका विलय भले ही 1947 में हो गया था, लेकिन पूरी तरह से भारत के साथ जुड़ने में सात दशक लग गए। 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 व 35ए हटने के बाद अब यहां न दो निशान हैं और न ही दो विधान। राज्य के 205 कानून निरस्त हो चुके हैं। बीते तीन वर्ष में 890 केंद्रीय कानून जम्मू-कश्मीर में लागू हो गए हैं। दशकों पुरानी दरबार मूव व्यवस्था भी खत्म हो गई है। कई बंदिशें खत्म होने पर यह प्रदेश अब देश के साथ कदमताल करने लगा है। जम्मू-कश्मीर के द्वार सबके लिए खुल गए हैं। पहली बार त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू होने से यहां के लोगों को अपने गांव के विकास का खाका खुद खींचने का अख्तियार मिल गया है।
विज्ञापन


 सामरिक महत्व का अति संवेदनशील यह प्रदेश चुनौतियों के पहाड़ पर अब नई इबारत लिख रहा है। लद्दाख से अलग हुए जम्मू- कश्मीर का नक्शा ही नहीं, करीब तीन दशक बाद हुए परिसीमन से उसकी सियासी तस्वीर भी बदल गई है। विधानसभा हलके 83 से बढ़कर 90 हो गए हैं। कश्मीर और जम्मू संभाग के बीच सत्ता संतुलन साधा गया है। परिसीमन में जम्मू संभाग की 6 सीटें बढ़ गई हैं। अब जम्मू में 43, कश्मीर में 47 सीटें हो गई हैं। पहली बार अनुसूचित जनजाति को आरक्षण मिला है। तमाम उतार-चढ़ाव और बदलाव के बाद जम्मू-कश्मीर फिर चुनाव के लिए तैयार है। घाटी में भले ही कुछ आतंकी घटनाएं हो रही हैं, लेकिन पत्थरबाज गायब हैं। लालचौक से लेकर एलओसी तक तिरंगा लहरा रहा है। वादी में बॉलीवुड लौट आया है। आतंकवाद के दौर में तीन दशक पहले बंद हुए सिनेमा हाल खुल गए हैं। बदले हालात में घाटी फिर पर्यटकों से गुलजार है। इस साल सितंबर तक 1.22 करोड़ सैलानियों ने कश्मीर का रुख किया। एक दशक से हर साल औसतन एक करोड़ सैलानी जम्मू-कश्मीर पहुंच रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


मुश्किल हालात में बीते साढ़े सात दशकों की मेहनत एवं संघर्ष के बूते जम्मू-कश्मीर ने एक मुकाम हासिल किया है। स्वास्थ्य, शिक्षा व प्रति व्यक्ति आय जैसे मानव विकास मानकों में यह प्रदेश आज देश के अग्रिम पंक्ति के राज्यों में शुमार है। बीते 75 साल में यहां जीवन प्रत्याशा (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) दोगुना से ज्यादा बढ़ गई है। साल 1947 के दौरान जम्मू-कश्मीर में औसत आयु 32 साल थी जो 2021 में 74.2 साल आंकी गई है। साक्षरता दर में करीब 10 गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वर्ष 1955-56 में 216 रुपये के मुकाबले प्रति व्यक्ति आय 1,04,860 रुपये पहुंच गई। वर्ष 1973-74 में 40.83 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे थी, जो अब 10.35 फीसदी रह गई है। अस्थिरता के बावजूद सकल घरेलू उत्पाद बढ़ रहा है। 1955-56 में एनएसडीपी 67.97 करोड़ आंकी गई थी, बीते वित्त वर्ष में जम्मू-कश्मीर की जीडीपी 1.76 लाख करोड़ रिकॉर्ड की गई। प्रदेश की जीडीपी में 8.51 बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 

कश्मीर पहुंच गई रेल, सुरंगों ने घटा दीं दूरियां : कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और मौसम की दुश्वारियों के चलते कभी महीनों अलग-थलग रहने वाले कश्मीर में आज रेल दौड़ रही है। दस हाईवे के साथ एलओसी से एलएसी तक सड़कों का जाल बिछ गया है। साल 1950-51 में जम्मू-कश्मीर में महज 2003 किमी सड़कें थीं। अब 35 हजार किमी सड़क नेटवर्क है। आजादी से पहले जम्मू-सियालकोट के बीच रेल सेवा थी। उधमपुर-बारामुला रेल लिंक परियोजना के जरिये कश्मीर को जल्द पूरे देश से जोड़ने की तैयारी है। इसके लिए रियासी में दुनिया का सबसे ऊंचा रेल पुल बन रहा है। पूरा साल जम्मू, कश्मीर व लद्दाख को जोड़े रखने के लिए पांच बड़ी टनल परियोजनाओं पर काम चल रहा है।

पर्यटन, बागवानी और हस्तशिल्प में जम्मू-कश्मीर ने देश-दुनिया में पहचान बनाई है। देश के सबसे बड़े सेब उत्पादक प्रदेश जम्मू-कश्मीर का केसर, ड्राई फ्रूट और बासमती विदेशों में महक रही है। पहला स्कूल 1880 में कश्मीर में खुला। महाराजा हरि सिंह ने 1930 में प्राइमरी शिक्षा अनिवार्य कर दी थी। यहां 1950 से ही विश्वविद्यालय स्तर तक की पढ़ाई निशुल्क है। इसके बावजूद दशकों तक शिक्षा का वैसा ढांचा विकसित नहीं हो सका, जैसी नींव रखी गई थी। इसके पीछे की बड़ी वजह आतंकवाद और अलगाववाद रहा है।

...उद्यमियों ने किया रुख
आतंकवाद, अलगाववाद और अस्थिरता के चलते निवेशकों ने प्रदेश की ओर रुख नहीं किया। भ्रष्टाचार, प्रशासनिक खामियां, अनुच्छेद 370 और 35ए भी निवेश की राह में रोड़ा बने। लेकिन बदले जम्मू-कश्मीर में अड़चनें हटने के बाद अब देश-दुनिया के निवेशक यहां निवेश के लिए आगे आने लगे हैं। निवेश की संभावनाएं तलाशने के लिए खाड़ी देशों के उद्यमियों का एक प्रतिनिधिमंडल हाल ही में कश्मीर का दौरा करके लौटा है। कभी आतंकियों के गढ़ रहे इलाके में खाद्य प्रसंस्करण और लॉजििस्टक हब बनाने के लिए दुबई के लुलु ग्रुप ने करार किया है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद प्रदेश में लगभग 56 हजार करोड़ निवेश के करीब 4500 प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर सरकार को मिले हैं। अगले छह महीने में 70 हजार करोड़ निवेश का लक्ष्य है। 

केंद्र की बैसाखी पर अर्थव्यवस्था
बेशक, जम्मू-कश्मीर अब विकास की पटरी पर दौड़ने लगा है, लेकिन इसकी अर्थव्यवस्था केंद्र की बैसाखी पर ही टिकी है। बजट में कुल राजस्व का 50 फीसदी हिस्सा अनुदान के रूप में केंद्र का रहता है। देश की लगभग एक फीसदी आबादी वाले जम्मू-कश्मीर को सभी राज्यों को मिलने वाले कुल केंद्रीय अनुदान का करीब 10 फीसदी हिस्सा मिलता रहा है। प्रदेश में 250 से अधिक आबादी वाले कई गांव सड़क सुविधा से महरूम हैं। अपने संसाधन विकसित न कर पाने के कारण प्रदेश पर करीब एक लाख करोड़ का कर्ज है।

स्याह दाग
महजब के नाम पर 32 साल पहले घाटी में हुए नरसंहार के घाव आज भी रिस रहे हैं। नब्बे के दशक में अपने ही घर से कश्मीरी पंडितों का निष्कासन एक ऐसी हकीकत है, जो शर्मसार करती है। लाखों कश्मीरी पंडितों की तीन दशक बाद भी घाटी में वापसी नहीं हो सकी है। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अग्निशेखर कहते हैं कि कश्मीरी पंडितों का तीन स्तर पर संहार हुआ है। पहले डायरेक्ट किलिंग यानी मार-काट हुई। सांस्कृतिक और आर्थिक तौर पर भी उन्हें मारा गया। पंडितों को जड़ों से अलग, परंपराओं से बेदखल कर दिया गया। अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई में एक नहीं, दो-दो पीढ़ियां चलीं गईं। निर्वासन के भीतर एक और निर्वासन हो गया। शिक्षा और नौकरी के लिए बच्चे, मां-बाप से अलग हो गए। ये पीढ़ी पूरी तरह जड़ों से कट गई।

पचहत्तर सालों में 20 हुक्मरान
75 साल में जम्मू-कश्मीर में 20 हुक्मरान रहे हैं। इनमें 1947 से 1965 तक मेहर चंद महाजन, शेख अब्दुल्ला, बख्शी गुलाम मोहम्मद, ख्वाजा शम्सुद्दीन और गुलाम मोहम्मद शेख के रूप में पांच प्रधानमंत्री शामिल हैं। फारूक अब्दुल्ला तीन, शेख अब्दुल्ला और मुफ्ती मोहम्मद सईद दो-दो और महबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला, गुलाम नबी आजाद, गुलाम मोहम्मद शाह, सैयद मीर कासिम और गुलाम मोहम्मद एक-एक बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे हैं। 

एक लाख करोड़ से ऊपर जम्मू-कश्मीर का बजट
केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर का 1,12,950 करोड़ का सालाना बजट वित्त वर्ष 2022-23 के लिए संसद ने पारित किया है। पिछले साल यह 1,08,621 करोड़ रुपये था।

आतंकवाद-अलगाववाद के बीच अफसर बन रहे घाटी के युवा
आतंकवाद, अलगाववाद और निर्वासन के दंश के बावजूद जम्मू-कश्मीर के युवाओं ने खुद को साबित किया है। प्रदेश की नई पीढ़ी प्रशासनिक सेवा समेत विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही है। साल 2009 में शाह फैसल के यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में टॉप करने के बाद जम्मू-कश्मीर के 100 से ज्यादा युवा आईएएस, आईपीएस व आईएफएस जैसी प्रतिष्ठित सेवाओं के लिए चयनित हो चुके हैं।


100 से ज्यादा युवा आईएएस, आईपीएस व आईएफएस के लिए चयनित हो चुके हैं
जम्मू-कश्मीर में 1947 में साक्षरता दर 8 फीसदी थी। साल 2011 में यह 67.16 फीसदी दर्ज की गई। ताजा सर्वे में इसे 76.77 फीसदी आंका गया है। साल 1950 -51 में प्रदेश में 1500 शिक्षण संस्थान थे, जो अब 30,000 हो गए हैं। 1948 में कश्मीर में पहला विश्वविद्यालय बना। आज दो सेंट्रल यूनिवर्सिटी समेत 12 विश्वविद्यालयों के अलावा आईआईटी, एनआईटी एवं आईआईएम हैं। 2021-22 के बजट में शिक्षा के लिए 1873 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed