फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   descendants of babar are labour in varanasi

बदहाली की दास्तां! बनारस में मजदूरी कर रहे बाबर के वंशज

Thu, 21 Apr 2016 04:54 AM IST
अनूप ओझा/अमर उजाला, वाराणसी
अनूप ओझा/अमर उजाला, वाराणसी Updated Thu, 21 Apr 2016 04:54 AM IST
सार

  • वाराणसी में चांदी का वर्क बनाते हैं बाबर के वंशज
  • खामोशी से मजदूर बन गए शाही खानदान के चिराग
  • 220 साल पहले वाराणसी आ गए थे उनके पुरखे

विज्ञापन
descendants of babar are labour in varanasi
बाबर के वंशज - फोटो : amar ujala bureau

विस्तार

वक्त का फेर है कि बादशाह बाबर के खानदानी शहर में आबाद हैं मगर इस कदर गुमनाम और तंगहाल कि मजदूरी करके जिंदगी की गाड़ी खींच रहे हैं। गोविंदपुरा (छत्तातले) की संकरी गली में छोटी मस्जिद के पास एक तीन मंजिला मकान है- सीके 43/84-1। इसी मकान के एक छोटे से कमरे में हथौड़ी चलाकर चांदी के तारों को वर्क की शक्ल देने में जुटे बुजुर्ग मिर्जा आलमगीर हैं।
विज्ञापन


पुरखों ने कभी हिन्दुस्तान पर हुकूमत की मगर उनकी हुकूमत में विरासत में मिला यह मकान है, जिसके किराये और खुद की मजदूरी से घर चलता है। हुकूमत की नाराजगी से खुद की हिफाजत ही उनके पुरखों के दिल्ली छोड़कर बनारस आ बसने की वजह बनी। बकौल मिर्जा आलमगीर, शहजादे जहांदार शाह का अपने वालिद शहंशाह शाहआलम से किसी बात पर झगड़ा हो गया था।
विज्ञापन


शाहआलम की नाराजगी के चलते जान जाने के अंदेशे में उन्होंने दिल्ली से लखनऊ होते हुए बनारस में आकर शरण ले ली। यह बात करीब 220 साल पुरानी है। वंशावली के मुताबिक शाहआलम (द्वितीय) के दो बेटे अकबर शाह (द्वितीय) और जवां बख्त उर्फ जहांदार शाह थे। मिर्जा आलमगीर बख्त जहांदार शाह के बाद की सातवीं पीढ़ी से हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


शाही खानदान का सदस्य होने के नाते उनके कुनबे को पहले बाकायदा पेंशन मिलती थी। उनके वालिद फरीदुद्दीन भी पेंशनयाफ्ता थे। यह मकान उन्हीं ने बनवाया था। मिर्जा आलगीर ने पढ़ाई-लिखाई की नहीं और जब कुनबे की जिम्मेदारी सिर पर आ पड़ी तो समझ में न आया कि कहां से शुरू करें। उन्होंने मकान के कमरे किराए पर लगा दिए। बचपन में सीखा वर्क बनाने का हुनर काम आ गया। उन्होंने इसी काम को आजीविका बना लिया। बेगम आकिला भी सिलाई करके जिम्मेदारी बांट लेती हैं।

परिवार के पास है रॉयल फेमिली का प्रमाणपत्र

descendants of babar are labour in varanasi
बाबर के वंशज - फोटो : amar ujala bureau
सरकार की ओर से मिर्जा आलमगीर के परिवार को शाही खानदान का प्रमाण पत्र जरूर मिला हुआ है मगर इस नाते मिलने वाली पेंशन 53 साल पहले बंद हो चुकी है। आलमगीर के वालिद मिर्जा फरीदुद्दीन बख्त को 1925 से ही रॉयल फेमिली के सदस्य के रूप में राजनीतिक पेंशन मिलती थी। तब यह रकम 1 टका 26 आना आठ पैसे थी। मिर्जा फरीदुद्दीन को वर्ष 1953 तक पेंशन मिलती रही। उनके गुजर जाने के बाद मिर्जा आलमगीर ने राजनीतिक पेंशन के लिए आवेदन किया लेकिन फाइल जाने कहां अटकी कि आज तक कुछ न हो पाया।

मौजूदा हालात पर बात छेड़ते ही मिर्जा मुस्कुराने की कोशिश करते हैं मगर उनकी आंखें डबडबा जाती हैं। कहते हैं, वक्त ने इस हाल में ला छोड़ा है और इससे पार पाने के लिए जो कर सकता हूं, करता हूं। बड़ा बेटा बीमारी से चल बसा, छोटे को अदावत में दाल मंडी के पास गोली मार दी। मंझला, जिसे लोग बड़े मिर्जा कहते हैं, दो महीने से जेल में है। बकौल आलमगीर, छोटे बेटे की हत्या का जिस विक्की खान पर आरोप है, हाल ही में उस पर हमला हो गया। इस मामले में बड़े मिर्जा को शक के आधार पर फंसा दिया गया।

सन् 1962 से वह वर्क बनाते आ रहे हैं। पढ़ाई-लिखाई नहीं हो पाई इसलिए बचपन में ही चांदी कूटने का काम सीख लिया और फिर इसी धंधे में रह गए। पहले एक गड्डी वर्क बनाने पर 1.90 रुपये मजदूरी मिलती थी। इधर कुछ वर्षों तक 150-200 रुपये मिल जाते हैं। 2010 तक आलमगीर ने आठ से 12 घंटे तक हथौड़ी चलाई मगर अब 75 साल की उम्र में सांस फूलने लगती है। सो यह भी कब तक चल पाएगा, कुछ पता नहीं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed