Water Crisis: दिल्ली-गाजियाबाद-NOIDA के बीच बसा है खोड़ा, पानी के लिए त्राहि-त्राहि; सरकारों पर अनदेखी के आरोप
भीषण गर्मी के बीच दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा में जल संकट का मुद्दा उठने लगा है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में एक और इलाका है जहां रहने वाले लोग पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। 15 लाख से अधिक लोगों के सामने जल संकट कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 800 फीट से अधिक गहराई तक बोरिंग कराने के बाद भी बमुश्किल पानी मिलता है। 12.5 किमी के दायरे में बसे खोड़ा के जल संकट पर पढ़ें ये विशेष रिपोर्ट
विस्तार
तमाम घरों पर बोर्ड लगा है, मकान बिकाऊ है। महेश मिश्रा ने जब दिल्ली-एनसीआर में ठांव लेने की कोशिश की थी तो उन्हें खोड़ा ने सहारा लिया था। बड़े शौक से कहते हैं कि दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद को लाखों कारीगर, मजदूर, तकनीशियन, बिजली, पानी, मकान के कामगारों का ठिकाना यही खोड़ा कालोनी है। लेकिन आज बेजार है।
खोड़ा रेजीडेंट्स एसोसियेशन के अध्यक्ष दीपक जोशी कहते हैं कि राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय, मुख्यमंत्री, नगर विकास मंत्री तक अपनी बात पहुंचा चुके हैं, लेकिन हमारी सुनता कौन है? थोड़ी सी पहल के बाद बस फाइलें घूमती हैं। सांसद अतुल गर्ग और चार बार के विधायक, राज्य सरकार में मंत्री सुनील शर्मा भी बस भरोसा देते हैं। उपचार नहीं।
कैसा है 15 लाख की आबादी वाला खोड़ा थोड़ा जान लीजिए
सबकुछ है, बस जल नहीं है। हनुमान तिवारी तो इसे एशिया की सबसे बड़ी अवैध कालोनी बता देते हैं। दीपक जोशी कहते हैं कि 3500-4000 टीडीएस का भू-जल है। 800-1200 फिट की गहराई पर बोरिंग करने पर पानी मिलता है। इस पानी से लोगों को लीवर की बीमारी, पीलिया, कैंसर जैसी घातक बिमारियां हो रही हैं। किड़नी फेल हो रही है और लोग पलायन के लिए मजबूर हैं। दीपक जोशी कहते हैं कि उ.प्र. के नगर विकास मंत्री से लेकर सांसद, विधायक सब बस आश्वासन देते हैं। सरकार के दफ्तर में इधर-उधर मामला लटकता रहता है। बिजली, फोन का सिस्टम नोएडा से है।सेक्टर 62 में बिजली बिल भरते हैं। लोनी, गाजियाबाद हमारा ब्लाक है और मकान की रजिस्ट्री गाजियाबाद से होती है। कई लोगों के मकान की रजिस्ट्री नोएडा के दादरी से है। ऐसे में हमें यह भी पता नहीं कि यह कालोनी अवैध या है क्या? हाऊस टैक्स खोड़ा को देते हैं। यहां नगर पालिका की बिल्डिंग है, लेकिन हाऊस टैक्स भी नकद लिया जाता है। चेक से आप जमा नहीं कर सकते। बच्चे दिल्ली में पढ़ते हैं और इलाज की सुविधा के लिए दिल्ली जाते हैं। अंतिम संस्कार गाजीपुर में हो जाता है।
अनिरुद्ध सिंह कहते हैं कि खोड़ा का क्षेत्रफल कोई 12.5 किमी के क्षेत्र में फैला है। अब यह अवैध कालोनी नहीं है। गाजियाबाद, नगर निगम के अधीन है। 34 वार्ड हैं, पार्षद चुने जाते हैं। इसके सामने नेशनल हाई-वे के दूसरी तरफ गाजियाबाद के इंदिरापुरम की अट्टालिकाएं हैं। बिल्डरों की विकसित की तमाम सोसाइटिया हैं। लाखों की संख्या में फ्लैट हैं। खोड़ा के एक तरफ दिल्ली एनसीआर का विकसित और योजनागत तरीके से विकसित नोएडा शहर शुरू होता है। नोएडा और गाजियाबाद के अलावा खोड़ा खालोनी दिल्ली की मयूर विहार फेस-3, न्यू कोंडली से सटा हुआ है। तीनों शहरों के घरेलू कामगार, कंपनियों में काम करने वालेग ,दिहाड़ी मजदूर सब खोड़ा से ही निकलकर जाते हैं। खोड़ा की आबादी भी 15 लाख से अधिक है। मकानों की बात करें तो इनकी संख्या भी 55-60 हजार के करीब होगी। 60 प्रतिशत से अधिक मकान तीन से चार मंजिला हैं।
सोचिए, 55-60 हजार मकान। बेतरतीब बसी कालोनी। पतली-पतली सड़कें। मंगल बजार, बुद्ध बजार समेत तमाम कालोनियों के नाम के आगे जुड़ा शब्द बिहार। रहने वाले भी अधिकांश उ.प्र. और बिहार के लोग। ऐसे में मकानों का पता ढूंढना भी किसी कसरत से कम नहीं है। 2020 में पूर्व केन्द्रीय मंत्री और गाजियाबाद के सांसद वीके सिंह तथा साहिबा बाद के विधायक सुनील शर्मा ने खोड़ा के हर मकान को नंबर आवंटित करने का वादा किया। काम शुरू हुआ। योजना है कि 10 सेक्टर में खोड़ा को बांटकर, गूगल मैपिंग के साथ हर मकान को एक नंबर मिल जाएगा। लेकिन कहते हैं कि यह शुरू होता है और फिर अटक जाता है। ऐसा बसा है खोड़ा कि किधर से शुरू करें और किसे कौन सा नंबर दें? सब तिलिस्मी खेल जैसा है। दिलचस्प है कि खोड़ा में न कोई चार प्राइमरी स्कूल हैं। इसके बाद न कोई सरकारी स्कूल है, न अस्पताल, न प्राथमिक उपचार केंद्र और न कुछ।
राज किशोर नोएडा सेक्टर 10 की एक फैक्ट्री में काम करते हैं। 35 गज के प्लाट में किसी तरह से मकान बनाया था, लेकिन पानी के लिए बेजार हैं। बताते हैं पहले 750 फीट की बोरिंग की कराई थी। अब 800 फीट से अधिक की बोरिंग हुई है, लेकिन पानी नहीं मिल पा रहा है। जो पानी आ रहा है, उसका रंग लाल है। पीना तो दूर, नहाने के लायक नहीं है। सीवर की भी समस्या विकराल है। कपड़े भी नहीं साफ किए जा सकते। पहले खोड़ा की हालत बड़ी नारकीय थी। खोड़ा में सड़के नहीं थी। बारिश में भारी जल जमाव हो जाता था। गलियों में तार लटके रहते हैं। बिजली कटौती भी खूब होती थी। छोटे-छोटे माचिस की डिब्बियों से मकान। यही खोड़ा था। अब खोड़ा में सड़के हैं। रंग-बिरंगे, अच्छे मकान हैं। सड़क है, बिजली है, लेकिन जीवन का आधार पानी गायब। अनवर सिलाई का काम करते हैं। अनवर का भी छोटा सा 50 गज के प्लाट में मकान है। तीन मंजिला बना रखा है। मकान में बिजली है, सामने सड़क है, लेकिन साफ पानी की बूंद दूभर है। बताते हैं कि 30 रुपये के हिसाब से रोज 20 ली. पानी की तीन-चार केन खरीदते हैं। इसी से खाना बनता है। हफ्ते में परिवार के लोग दो दिन ही नहा पाते हैं। सीमा यादव बुद्ध विहार में मिली। सीमा के पति ई-रिक्शा चलाते हैं। बेटी नोएडा की गारमेंट फैक्ट्री में काम करती है। बेटा 12 वीं पास हो गया है, लेकिन पानी की किल्लत ने जीना दूभर कर रखा है। मकान बेंच कर वह हिंडन के किनारे छजारसी जाना चाहती है, लेकिन सीमा को पानी के संकट के कारण खरीददार भी नहीं मिल पा रहे हैं।
एटा के संजीव भी परेशान हैं। सेक्टर 62 से दिल्ली के पटपड़गंज, आनंद विहार तक आटो चलाते हैं। संजीव की पत्नी घर में बच्चों को संभालती हैं, लेकिन रोज की कमाई का 22-25 प्रतिशत हिस्सा पानी में चला जाता है। रोहन बताते हैं कि कभी टैंकर का पानी आ गया तो पूरे महाभारत की फिल्म चलने लग जाती है। कारण बस एक है। एक टैंकर पानी आता है और एक अनार के 100 बीमार सिर फुटौव्वल शुरू कर देते हैं। पलक झपकते ही टैंकर का पानी भी ऊंट के मुंह में जीरा की तरह खत्म हो जाता है। बताते हैं विधायक जी आए थे। वादा कर गए थे कि गंगा नदी की पाइप लाइन आएगी। सबको पीने का साफ मिलेगा। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी खोड़ा में पानी की आपूर्ति बड़ा मुद्दा था, लेकिन चुनाव हो गया तो अब नेता जी भी नहीं आते। बताते हैं इन दिनों कोई बड़ा नेता, चाहे वह केन्द्र का हो या राज्य सरकार का खोड़ा कालोनी में नहीं आना चाहता। उसे पता है कि एक सुर में बस पानी की मांग की उठेगी।
सुरेन्द्र मोहन गुप्ता ठीक-ठाक काम धंधे के सिलसिले में बलिया से आए थे। मकानों में पीओपी करते हैं।मजबूरी में लाल पानी पीना पड़ा। तीन महीने भी नहीं बीते और उनके पाचन तंत्र अब कड़ी चेतावनी दे रहा है। अनिल कुमार का कहना है कि बोरिंग का पानी खारा है। इसके अलावा कोई और पानी की पाइप लाइन नहीं है। जो इस पानी को मजबूरी में इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें लीवर और कैंसर जैसी घातक बीमारी का शिकार होना पड़ रहा है।