न जाने कब खत्म होगा इन सबसे छोटी इकाइयों का लॉकडाउन, इन्हें तो सरकारी लोन भी नहीं मिलता!
- 17 औद्योगिक क्षेत्रों में केवल दस फीसदी कार्यबल से चल रही औद्योगिक इकाइयां
- मजदूरों की कमी, मांग में कमी, नकदी की कमी से जूझ रहे व्यवसायी
- श्रमिकों के समर्थन में भारतीय मजदूर संघ 20 मई को, एआईटीयूसी 22 मई को करेंगे देशव्यापी प्रदर्शन
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विस्तार
लॉकडाउन की सबसे गहरी मार इन्हीं इकाइयों को उठानी पड़ी है। बेहद कम पूंजी से चलने वाले इन उद्योगों के पूरी तरह से बंद हो जाने का खतरा पैदा हो गया है क्योंकि इन्हें चलाने के लिए फैक्ट्री मालिकों के पास आर्थिक संसाधन नहीं बचे हैं। पूंजी की कमी, मांग न होने और मजदूरों की कमी के कारण इस उद्योग की कमर टूटती दिख रही है।
वहीं बवाना, नरेला और पटपड़गंज जैसे रजिस्टर्ड औद्योगिक क्षेत्रों में चलने वाली बड़ी औद्योगिक इकाइयां अभी भी बेहद कम क्षमता पर काम कर रही हैं। कई औद्योगिक इकाइयों में दस फीसदी कार्यबल से काम चलाना पड़ रहा है, तो कई इकाइयों के सामानों की मांग न होने के कारण फैक्ट्री मालिक स्वयं ही उन्हें न चलाने की रणनीति बनाए हुए हैं।
मजदूर संगठनों का कहना है कि सबसे ज्यादा मार दिल्ली की उन अनधिकृत इकाइयों को उठानी पड़ रही है, जो घरेलू स्तर पर बेहद कम मानव श्रम के साथ छोटे-छोटे सामानों का उत्पादन करते हैं।
इन्हें सरकारी मदद भी नहीं मिलती और ये अब अपने मजदूरों को वेतन देने की स्थिति में भी नहीं हैं। मजदूर संगठन इन इकाइयों और श्रमिकों के हितों को ध्यान में रखकर 20 और 22 मई को राष्ट्रीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन आयोजित करने जा रहे हैं।
दिल्ली-एनसीआर में इतने उद्योग
एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर एरिया में दो लाख से ज्यादा छोटे-बड़े उद्योग चलते हैं। अकेले राजधानी दिल्ली के 17 आधिकारिक औद्योगिक क्षेत्रों में पांच लाख उद्योग पंजीकृत हैं। जबकि आसपास के क्षेत्रों गाजियाबाद में 20 हजार, नोएडा में 10 हजार, फरीदाबाद में 25 हजार और गुरुग्राम में 10 हजार से ज्यादा उद्योग रजिस्टर्ड हैं।
इनके अलावा गांधी नगर, शास्त्री पार्क, सीलमपुर, जाफराबाद, आनंदपर्वत, पटेलनगर और भजनपुरा जैसे क्षेत्रों में लाखों की संख्या में बेहद छोटी-छोटी लाखों इकाइयां काम करती हैं, जिनमें दो-चार से लेकर दस मजदूर तक काम करते हैं।
कोरोना की सबसे ज्यादा मार इन्हीं लोगों को उठानी पड़ी है क्योंकि मांग खत्म हो जाने के कारण ये अपने मजदूरों को दिहाड़ी चुकाने की स्थिति में भी नहीं हैं। वहीं मजदूरों के पलायन के कारण भी अनेक जगहों पर कामकाज ठप है।
श्रमिक संगठनों के मुताबिक इन औद्योगिक क्षेत्रों में 15 लाख के लगभग रजिस्टर्ड श्रमिक काम करते हैं। अनुमान है कि लगभग 70 फीसदी श्रमिक गैर-पंजीकृत तौर पर काम करते हैं।
मौजूदा समय में श्रमिकों के पलायन के कारण ज्यादातर औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूरों की संख्या में कमी आई है और औद्योगिक इकाइयों को कम कार्यबल के साथ काम करना पड़ रहा है।
द ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की महासचिव अमरजीत कौर ने अमर उजाला को बताया कि ग्रीन जोन में औद्योगिक गतिविधियों की अनुमति पहले ही मिल चुकी है।
लेकिन इन क्षेत्रों में भी केवल दस फीसदी श्रमिक रह गए हैं। इसलिए यहां पर भी कामकाज नहीं चल पा रहा है। उन्होंने कहा कि जो श्रमिक यहां स्थाई तौर पर रहते हैं, उद्योग केवल उन्हीं के सहारे चल रहे हैं।
22 को प्रदर्शन
द ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) केंद्र सरकार के खिलाफ शुक्रवार को देशव्यापी प्रदर्शन करेगा। यह विरोध प्रदर्शन श्रम कानूनों को निलंबित किए जाने, मानव श्रम के घंटे बढ़ाने और फैक्ट्री मालिकों को मार्च-अप्रैल का वेतन न देने संबंधी केंद्र द्वारा निर्देश पारित करने के खिलाफ आयोजित किया जा रहा है।
इस विरोध प्रदर्शन के द्वारा केंद्र से सभी मजदूरों को 7500 रुपये की नकद आर्थिक सहायता देने की मांग की जाएगी। इसके अलावा निलंबित श्रम कानूनों की बहाली, मनरेगा योजना में क्षमता बढ़ाने, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग की इकाइयों के मजदूरों का वेतन मालिक की तरफ से न दिए जाने की स्थिति में केंद्र द्वारा वहन किये जाने की मांग की जाएगी।
भारतीय मजदूर संघ का प्रदर्शन 20 मई को
वहीं, भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) बुधवार को देशव्यापी प्रदर्शन करेगा। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों से निलंबित कानूनों को बहाल करने, मजदूरों के लिए भोजन-आश्रय स्थल देने, काम न मिलने तक रोजगार की व्यवस्था करने और तब तक के लिए कुछ आर्थिक सहायता देने की मांग की जाएगी।