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दिल्ली बम धमाके: 'ये बरी हो गए तो धमाके करने वाले कौन थे?'

Sun, 19 Feb 2017 06:06 PM IST
जुबैर अहमद, बीबीसी हिंदी
जुबैर अहमद, बीबीसी हिंदी Updated Sun, 19 Feb 2017 06:06 PM IST
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Delhi blasts: "They have been acquitted Who were bang? "

गुरुवार को दिल्ली की एक निचली अदालत लोगों से खचाखच भरी थी। एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया जाने वाला था। मुकदमा राजधानी में 29 अक्टूबर, 2005 को हुए सिलसिलेवार तीन बम धमाकों का था। इस मुकदमे से जुड़े सभी पक्षों के लोग अदालत में मौजूद थे। जज रितेश सिंह का फैसला आने से पहले किरण सलूजा भी कमरे में अंदर मौजूद थीं।

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सरोजिनी नगर मार्किट वाले बम धमाके में उनके पति लाल चंद सलूजा समेत 50 लोग मारे गए थे। उस दिन हुए धमाकों में ये सबसे घातक बम विस्फोट था। वैसे जो फैसला आया वो किरण सलूजा के लिए सरोजिनी नगर वाले बम धमाके से कम धमाकेदार नहीं था। तीन अभियुक्तों में से दो यानी मोहम्मद रफीक शाह और हुसैन फाजिली बरी कर दिए गए।
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तीसरे अभियुक्त तारिक अहमद डार को सजा तो सुनाई गई, लेकिन बम धमाकों में शामिल होने के लिए नहीं बल्कि चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े होने के कारण। डार को 10 साल की सजा मिली। जेल में 10 साल गुजर जाने के कारण वो भी बरी हो गए।

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तो धमाके करने वाले कौन थे?

Delhi blasts: "They have been acquitted Who were bang? "

फैसले से मायूसी
फैसला सुनने के बाद किरण और अदालत में मौजूद धमाकों में मारे जाने वालों के दूसरे कई रिश्तेदार झटके में आ गए। किरण ने बीबीसी से कहा, "आज 12 साल के बाद इन लोगों को बाइज्जत बरी कर दिया गया। तो धमाके करने वाले कौन थे?" यही सवाल सभी रिश्तेदारों के जुबानों पर था। कुछ फैसला सुनकर रो पड़े।

कुछ सदमे का शिकार हो गए। लेकिन सब को एक बात सता रही थी कि उन्हें इंसाफ नहीं मिला। किरण मायूस भी थीं और बेबस भी, "पुलिस से गलती हुई है या तफ्तीश में कमी रह गई ये नहीं मालूम। ये हमें कौन बताएगा?" पुलिस की गलती हो या न हो उसकी आलोचना जरूर की जा रही है। अगले दिन किरण जूस की अपनी दूकान पर काम करने लौट गईं।

ये वही जूस की दूकान थी जिसके ठीक बाहर बम फटने से उनके पति समेत 50 लोग मारे गए थे। और आज जहाँ किरण बैठी थीं उस जगह पर उनके पति बैठा करते थे। पिछले 12 साल से वो उसी जगह बैठी इंसाफ का इंतजार कर रही हैं। किरण को जूस की दूकान के इलावा इसमें काम करने वाले छोटू भी उस घटना की याद दिलाते हैं। छोटू अब बड़े हो चुके हैं और उस घटना के चश्मदीद गवाह हैं।

मैंने जूस की दुकान पर रखे एक लावारिस बैग को देखा।

Delhi blasts: "They have been acquitted Who were bang? "
लाशों का ढेर

बल्कि यूं कहें कि उन्हें उस दिन जीवनदान मिला, "मैंने जूस की दुकान पर रखे एक लावारिस बैग को देखा। पूछा भाई किसका बैग है। कोई सामने नहीं आया। बैग को तीन बार पटका भी। तब प्रेशर कूकर नजर आया।" छोटू के मालिक यानी किरण के पति लाल चंद सलूजा ने मार्केट के व्यापारियों के संगठन के चेयरमैन अशोक रंधावा को आवाज दी।

वो आए और देखा लोग घबराए हुए हैं। रंधावा ने बीबीसी को बताया, "हम लोगों को समझ में आ गया कि इसमें कोई बम है क्योंकि टाइमर नजर आ रहा था।" पास में एक पुलिस चौकी थी। रंधावा भागे-भागे पुलिस को बुलाने गए। पुलिस जब तक आती धमाका हो गया। रंधावा को वो दिन आज भी याद है। "मार्केट में दिवाली के कारण बहुत भीड़ थी।

धमाके के बाद भगदड़ मच गई। जूस की दुकान और आस-पास की दुकानों में आग लग गई। जब आग बुझाई गई तो लाशों का ढेर पड़ा था।" रंधावा को लगा लाल चंद और छोटू जिंदा नहीं बचे होंगे। छोटू तो बच गया लेकिन लाल चंद का शव आग लगने के कारण पहचान में नहीं आया। रंधावा कहते हैं, "लाशें इतनी बुरी तरह से जल गई थीं कि मर्द और औरत की पहचान नहीं रही थी।" 

देखा तो ऐसा लगा कि हमारे जूस की दुकान पर हमला हुआ है।

Delhi blasts: "They have been acquitted Who were bang? "

किरण को कुछ घंटों के बाद इस घटना की खबर मिली, "मैं घर पर थी। एक रिश्तेदार ने कहा टीवी खोलो। देखा तो ऐसा लगा कि हमारे जूस की दुकान पर हमला हुआ है। थोड़ी देर में खबर आई कि वो (पति) जिंदा नहीं बचे।" पिछले 12 सालों से किरण अपने दो बच्चों के लिए पिता की भूमिका भी अदा कर रही हैं, "मेरे दो बच्चे हैं। एक बेटी और एक बेटा।

उस समय वो दो और तीन साल के थे। मैंने उन्हें पाला है। उन्हें माता और पिता दोनों का प्यार दिया है।" लेकिन किरण कहती हैं कि उनके बच्चे अपने पिता की कमी महसूस करते हैं, "जब कभी स्कूल में पेरेंट्स-टीचर्स की मीटिंग होती है, या कोई फंक्शन होता है तो बच्चों को अपने पिता की कमी महसूस होती है।" सरोजिनी नगर मार्केट पुरुष दुकानदारों से भरा है।

किरण ने साहस से काम लेते हुए इन पुरुषों के बीच अपनी जगह बनाई है, किरण कहती हैं, "उस समय मैं 28 साल की थी और एक हाउसवाइफ थी। आज मैं एक व्यापारी हूँ। शुरू में बड़ी दिक्कत हुई थी। उसी जूस की दुकान को चलाने में जहाँ मेरे पति मारे गए थे। लेकिन बच्चों की परवरिश करनी थी। अब तो आदत सी पड़ गई है।"

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