पराली जलाने को किसानों ने बताया मजबूरी, प्रशासन कड़ी कार्रवाई को तैयार
दिल्ली एनसीआर में दम घोंटू माहौल खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। यहां तक कि स्वास्थ्य आपातकाल (हेल्थ इमरजेंसी) तक घोषित करनी पड़ी है। दिल्ली एनसीआर के करीब 55 हजार वर्ग किमी पर सफेद धुंध छाई हुई है। यही नहीं मेरठ से हरियाणा के भिवाड़ी तक यही हाल है। पराली के धुएं व धूल के महीन कणों ने मिलकर दिल्ली-एनसीआर की हवा का जहरीला बना दिया है। सांस लेना भी दूभर हो गया है। समस्या को लेकर अमर उजाला ने विशेषज्ञों से लेकर किसानों से बात की। किसानों ने जहां अपनी समस्याएं बताईं तो वहीं विशेषज्ञों ने इसके समाधान पर बात की।
पराली जलाना मजबूरी
हरियाणा के जींद के एक किसान पवन कुमार ने अपनी समस्या बताते हुए कहा कि कोई भी इसे जलाना पसंद नहीं करता। बिजाई नहीं होने से पराली जलाना मजबूरी है। किसान जीरी के अवशेष को आखिर कहां लेकर जाए। इसी तरह रोहतक के किसान नेता प्रीत सिंह ने कहा कि किसान की आर्थिक मदद की जाए ताकि पराली में आग नहीं जलाए। सरकार अनुदान पर उपकरण दे। उन्होंने कहा कि यह हमें पता है कि आग लगाने से पर्यावरण को नुकसान तो होता ही है साथ ही खेती के मित्र जीवाणु और कीटाणु भी मर जाते हैं। खेत की उपजाऊ क्षमता भी घट जाती है। इसलिए सरकार मदद करे। रोहतक के ही किसान सतपाल सिंह का कहना है कि पराली को बाहर निकालने का साधन नहीं है। मजदूरी भी ज्यादा लगती है। किसान मजबूरी में आग लगाता है। सरकार किसानों की मदद करे।
पराली निकालने में खर्चा अधिक
कैथल के किसान सुरेश ने बताया कि इस क्षेत्र में किसान पराली जलाने की बजाय बेच रहे हैं। कंबाइन के बाद थोड़ा बहुत भूसा बचता है, जिसे जलाया जाता है। इसे निकालने में खर्च ज्यादा है और इसे निकाले बिना गेहूं की बिजाई भी नहीं की जा सकती। सांघी रोहतक के किसान मोनू के मुताबिक एक तो भाव कम, ऊपर से धान में बीमारी लग गई है। इसके अलावा पराली निकालने का खर्चा भी अधिक है। ट्रैक्टर वाला खेत में मिलाने के लिए 6 से 7 हजार रुपये मांग रहा है। इसकी खाद बनाने में एक माह का समय लग जाता है। ऐसे में गेहूं की बिजाई नहीं हो पाएगी। एक अन्य किसान धोला ने भी अपनी यही परेशानी बताई है। उन्होंने कहा कि धान में बीमारी लगने और खर्चा अधिक आने से किसान मजबूरी में ऐसा कर रहे हैं।
पराली न जलाने से जमीन में बढ़ेगा कार्बन
गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय हिसार के डीन ऑफ रिसर्च व हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य प्रोफेसर नरसी बिश्नोई के मुताबिक अगर किसान पराली नहीं जलाएंगे तो जमीन की ताकत बढ़ सकती है। उन्होंने बताया कि पराली जलाने से धरती की ऊपरी परत जल जाती है। इससे जमीन की ताकत और उपजाऊ क्षमता कम हो जाती है।

जलाने के बजाय जमीन में दबाएं
प्रोफेसर बिश्नोई ने बताया कि किसान पराली को जमीन में दबा दें या फिर इस पर ट्रैक्टर चला दें। इससे कार्बन का स्तर बढ़ जाएगा। हरियाणा के खेतों में कार्बन की मात्रा बहुत ही कम है। पराली जलाने से नाइट्रोजन, फास्फोरस और कार्बन कम हो जाता है। पेस्टीसाइड डालने से पक्षी और मित्र कीट खत्म हो रहे हैं और बीमारी बढ़ रही है।
बारिश से ही मिलेगी निजात
प्रोफेसर नरसी बिश्नोई ने कहा कि हवा चले या बारिश हो तभी प्रदूषण से निजात मिल सकती है। किसान जागरुक हों और सरकार किसानों को आधुनिक उपकरण दे। इसके अलावा पराली का उपयोग गत्ता बनाने वाली फैक्टरी में हो सकता है। अन्य उद्योगों में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए सरकार चार-पांच गावों के बीच एक क्लस्टर बनाकर पराली खरीदे।
148 किसानों पर कार्रवाई
फतेहाबाद के कृषि उपनिदेशक बलवंत सहारण ने बताया कि प्रशासन ने इस संबंध में कड़ी कार्रवाई भी की है। उन्होंने बताया कि हमारी टीम लगातार कार्रवाई कर रही है। अभी तक 148 किसानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा चुके हैं। किसान की मजबूरी तो है लेकिन मंशा भी नहीं है। किसान खेतों में पराली को मिला दे तो जमीन में जीवांश बढ़ जाएंगे और अगली फसल अच्छी होगी।