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दलित समूहों ने लैटरल एंट्री को लेकर दी भारत बंद की धमकी, कहा- दलितों को किया जा रहा किनारे

Thu, 14 Jun 2018 10:19 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 14 Jun 2018 10:19 AM IST
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Dalit activist Ashok Bharti says Dalit groups plan Bharat bandh over lateral entry  
दलित कार्यकर्ता अशोक भारती - फोटो : Twitter

नौकरशाही में सीधे प्रवेश का मामला दलित समूहों के लिए असंतोष का नया बिंदु बन गया है। इसी मुद्दे को लेकर दलित समूहों ने एक बार फिर भारत बंद की धमकी दी है। दलित कार्यकर्ता अशोक भारती ने कहा कि 'लैटरल एंट्री' मुद्दे पर चिंतित दलित सरकार के इस फैसले को यूपीएससी जैसे संवैधानिक तंत्र में दलितों को किनारे करने के कदम के रूप में देखते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने वंचित समुदायों के उत्थान के लिए बनाए गए अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए अनिवार्य आरक्षण मानदंड को नजरअंदाज कर दिया। 

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दलित समूह अगस्त महीने में इसी मुद्दे को लेकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन करने की योजना बान रहे हैं। दलित कार्यकर्ता ने आगे कहा कि हमारी योजना संसद के मानसून सत्र के दौरान दूसरा राष्ट्रव्यापी 'भारत बंध' आयोजित करने की है। उन्होंने कहा कि विरोध करने का उद्देश्य सरकार को एक संदेश भेजना है कि अगर हमारी चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया जाता है, तो दलित समुदाय सरकार को 2019 के लोकसभा चुनावों में उचित जवाब देगा। 
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बता दें कि इससे पहले, दलित समुदाय ने सुप्रीम कोर्ट के एससी-एसटी एक्ट में तत्काल गिरफ्तारी नहीं किए जाने के आदेश के खिलाफ 2 अप्रैल को एक दिवसीय भारत बंद का राष्ट्रव्यापी आह्वान किया था। 
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उल्लेखनीय है कि हाल ही में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने एक ऐसी पहल की है जिसके तहत अधिकारी बनने के लिए अब यूपीएससी की परीक्षा पास करना जरूरी नहीं होगा। इस पहल से अब प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले सीनियर अधिकारी भी सरकार का हिस्सा बन सकेंगे। लैटरल एंट्री के जरिए सरकार ने इस योजना को नया रूप दिया है। 


2005 से लंबित था यह प्रस्ताव

ब्यूरोक्रेसी में लैटरल ऐंट्री का पहला प्रस्ताव 2005 में ही आया था, जब प्रशासनिक सुधार पर पहली रिपोर्ट आई थी। लेकिन तब इसे सिरे से खारिज कर दिया गया। फिर 2010 में दूसरी प्रशासनिक सुधार रिपोर्ट में भी इसकी अनुशंसा की गई। लेकिन पहली गंभीर पहल 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद हुई। पीएम मोदी ने 2016 में इसकी संभावना तलाशने के लिए एक कमिटी बनाई, जिसने अपनी रिपोर्ट में इस प्रस्ताव पर आगे बढ़ने की अनुशंसा की। 

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