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CRPF: सीआरपीएफ में आत्महत्या रोकने के लिए बने समूह पर क्यों उठे सवाल? निचले रैंक को समूह में नहीं मिली जगह

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Thu, 20 Aug 2026 05:12 PM IST
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CRPF: Questions Raised Over Suicide Prevention Core Group, Lower Ranks Left Out
केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' - फोटो : आईएएनएस

देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' में कर्मियों द्वारा खुद को नुकसान पहुंचाना (आत्महत्या) या साथियों पर फायरिंग करना, ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए डीजी जीपी सिंह की अध्यक्षता में जिस कोर ग्रुप का गठन किया गया है, उस पर सवाल उठने लगे हैं। अलायंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह ने कहा, कम्पनी/बटालियन लेवल के अधिकारी सहायक कमांडेंट, डिप्टी कमांडेंट, टूआईसी, यूनिट कमांडेंट को कमेटी से बाहर रखा गया है। ये कैडर अधिकारी बेहतर राय दें सकते हैं, क्योंकि ये अफसर हमेशा जवानों के साथ रहते हैं। दैनिक जीवन में होने वाली कठिनाईयों के बारे में साथ रहने वाले सब इंस्पेक्टर या इंस्पेक्टर से बेहतर कौन जान सकता है। निचले रैंक को बल के शीर्ष कोर ग्रुप से पूरी तरह बाहर रखा गया है।

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कोर ग्रुप में शामिल हैं ये अधिकारी 
इस ग्रुप में डीजी के अलावा 9 अन्य अधिकारी शामिल हैं। बल में ऐसी घटनाएं न हों, उन्हें रोकने के लिए क्या किया जाए, इस बाबत कोर ग्रुप द्वारा उपाय सुझाए जाएंगे। ऐसे केसों की गहन समीक्षा होगी। यह कोर ग्रुप हर माह सीआरपीएफ मुख्यालय में बैठक करेगा। बल मुख्यालय में कार्यरत डीआईजी (कल्याण) को ग्रुप का संयोजक बनाया गया है। कोर ग्रुप में एसडीजी (ऑपरेशन्स), एसडीजी (प्रशासन), एडीजी (मुख्यालय), आईजी (ऑपरेशन्स), आईजी (कार्मिक), आईजी (प्रशासन), आईजी (चिकित्सा), डीआईजी (ओपीएस-2) और  डीआईजी (कल्याण) शामिल हैं। कमांडेंट और इससे निचले रैंकों का कोई भी प्रतिनिधि इस ग्रुप में नहीं है। 
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आत्महत्याएं, सुरक्षा बलों के लिए शर्म की बात 
बीएसएफ के पूर्व अधिकारी आरसी शर्मा के मुताबिक, आत्महत्याएं सुरक्षा बलों के लिए शर्म की बात है। इससे पहले गृह मंत्रालय की उच्चस्तरीय समिति ने कुछ भी हासिल नहीं किया। गतिरोध, हत्याएं, सेवा शर्तें, सामाजिक नकारात्मकताएं, अस्थिर पारिवारिक जीवन, प्रशिक्षण में खामियां, पुलिस संस्कृति, अधिकारियों के बीच आपसी संवाद की कमी और वित्तीय असुरक्षा आदि मुद्दों पर बात की जाए। जवानों के साथ हकीकत में संवाद हो। उन्हें अपने मन की बात कहने का अवसर मिले। तभी आत्महत्या जैसी घटना की जड़ तक पहुंचा जा सकता है। 
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कोर ग्रुप को असली/वाजिब कारण तलाशना होगा  
सीआरपीएफ से जुड़े मौजूदा एवं पूर्व अफसरों का कहना है कि ये कोर ग्रुप, महज एक दिखावा है। कल्याण की बातें और मेडिकल जांच, इनसे कुछ हासिल नहीं होगा। कोर ग्रुप को आत्महत्या का असली और वाजिब कारण तलाशना होगा। आखिर, बल के जवान इतने परेशान और निराश क्यों हैं कि वे आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठा रहे हैं। हर बार आत्महत्या या साथियों पर फायरिंग, ऐसी घटनाओं को व्यक्तिगत कारणों से जोड़ दिया जाता है। असली मुद्दों पर कोई बात ही नहीं कर रहा। जीवनचर्या और ड्यूटी का संतुलन, काम करने की स्थिति, आराम का ठीक समय, परिवार का साथ, इन बातों की ओर किसी का ध्यान नहीं है। बल के शीर्ष अधिकारी समझते हैं कि सैनिक सम्मेलन में समोसा-जलेबी खिलाना, पंखा देना, फॉगिंग मशीन देना ही 'कल्याण' कार्यो में आता है, जबकि समस्या इससे कहीं अलग है। कई बार जवान के साथ अपमानजनक व्यवहार भी घातक कदम उठाने की वजह बनता है। 

खानाबदोश की तरह तो जीवन जी रहे जवान 
पूर्व अधिकारी के मुताबिक, सीआरपीएफ के जवान खानाबदोश की तरह जीवन जी रहे हैं। परिवार, दोस्तों और सामाजिक जिम्मेदारियों के लिए उनके पास समय ही नहीं है। लगातार ड्यूटी, पीस/स्टेटिक जगहों पर जवान को इतना ज्यादा व्यस्त रखा जाता है कि परिवार के लिए वह समय ही नहीं निकाल पाता। आदमी मजबूत है तो वह झेल जाता है। कई जवान मैनेज करके काम चलाते रहते हैं। कुछ कार्मिक टूट जाते हैं और वे आत्महत्या जैसा घातक उठा लेते हैं। ऐसे जवान, जो सुकमा, बीजापुर जैसी जगहों पर खून-पसीना बहाकर आते हैं, वो आरएएफ या किसी 'स्थायी' पोस्टिंग में खुशी-खुशी जाते हैं। सोचते हैं अब परिवार के साथ कुछ समय बिताएंगे। अगले ही पल फिर झटका लगता है। उन्हें मणिपुर, दिल्ली का प्रदर्शन या चुनावी ड्यूटी आदि में भेज दिया जाता है। जब वे आखिर में बेस पर लौटते हैं, तो 'संभव' ऐप पर ट्रांसफर के लिए फॉर्म भरने का मैसेज आ जाता है। तब तक तथाकथित स्थायी जगह का कार्यकाल भी खत्म ही हो चुका होता है। 

कोर ग्रुप को समस्या की जड़ तक जाना होगा 
बल को काम करने की संस्कृति/तरीका बदलना होगा। थकान, परिवार से दूरी, अनिश्चितता और लगातार ड्यूटी को एकदम 'सामान्य' बताना, इस पर गंभीरता से विचार करना पड़ेगा। काम और जीवन का संतुलन, इनके बीच की दूरी कम करनी होगी। जैसे, बटालियनों की संख्या बढ़ाई जाए, ताकि जवानों को सही रोटेशन और आराम मिले। तैनाती के नियम सटीक बनाए जाएं। तीन साल ड्यूटी के बाद कम से कम 3 साल परिवार के साथ जवान रह सकें, ऐसी कोई ठोस योजना बने। परिवारों के लिए सुरक्षित जगहों पर क्वार्टर बनें। एचआरए इतना कम है कि जवानों के परिवारों को महानगरों के खराब इलाकों में रहना पड़ रहा है। सम्मान से जीने लायक एचआरए मिलना चाहिए। कोर ग्रुप में ऐसे अफसरों को जगह दी जाए, जो दिन रात जवानों के बीच रहते हों। कई शीर्ष अफसर ऐसे भी रहे हैं, जिन्होंने कैम्पस में जवानों के साथ कभी रात नहीं बिताई। उन्होंने ग्राउंड कमांडर्स की पोस्ट में जवानों के साथ काम नहीं किया। वे अधिकारी फील्ड ऑपरेशन में भी नहीं रहे। ऐसे में वे अधिकारी जवानों की समस्याओं को लेकर और उनके तनाव के बारे में कितने सख्त फैसले ले पाएंगे, ये बताना मुश्किल है। 

क्या काम करेगा ये कोर ग्रुप 
कोर ग्रुप हर महीने एक बार (अधिमानतः महीने के तीसरे सप्ताह में) बैठक करेगा। पिछली अवधि में सामने आई खुद को नुकसान पहुंचाने की सभी घटनाओं की विस्तृत समीक्षा करेगा। समीक्षा में कारण, घटना की परिस्थितियाँ, कल्याण/चिकित्सा/मनोवैज्ञानिक सहायता तंत्र की उपलब्धता और उपयोग, उठाए गए रोकथाम के उपाय और सुधारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता वाले किसी भी प्रणालीगत मुद्दे शामिल होंगे। खुद को नुकसान पहुंचाने के प्रत्येक मामले के संबंध में, संबंधित बटालियन/कार्यालय के एचओओ/कमांडेंट ऑनलाइन वीसी के माध्यम से कोर ग्रुप के सामने 4/5 स्लाइड की एक व्यवस्थित प्रस्तुति देंगे। उसमें घटना का कारण, व्यक्ति की प्रासंगिक पृष्ठभूमि और परिस्थितियां, यूनिट/कार्यालय द्वारा की गई कार्रवाई, प्रदान की गई कल्याणकारी और चिकित्सा सहायता, प्रारंभिक जाँच/पड़ताल के निष्कर्ष और ऐसी घटनाओं को दोबारा होने से रोकने के लिए उठाए गए विशिष्ट उपाय शामिल होंगे। 


हर मामले की निष्पक्ष जांच करेगा कोर ग्रुप 
कोर ग्रुप हर मामले की निष्पक्ष रूप से जांच करेगा। जहां भी जरूरी हो, बचाव, कल्याण, प्रशासन, चिकित्सा और अन्य उचित उपाय सुझाएगा। समिति समीक्षा किए गए मामलों से सामने आने वाले आम रुझानों और बार-बार होने वाले जोखिम कारकों की पहचान भी करेगी और फोर्स के स्तर पर उचित संस्थागत कदम उठाएगी। समिति का गठन और मासिक समीक्षा व्यवस्था को संस्थागत बनाने का मकसद सीआरपीएफ कर्मियों के बीच खुद को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं को कम करने के लिए लगातार निगरानी, समय पर हस्तक्षेप, जवाबदेही और बचाव के उपायों को मज़बूत करना है।

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