अपने कमांडर को मिट्टी देने की ख्वाहिश मन में ही रह गई, क्वारंटीन में बैठे CRPF जवानों ने ऐसे दी अंतिम विदाई
- सीआरपीएफ की 31वीं बटालियन में सब-इंस्पेक्टर तैनात थे इकराम हुसैन
- उनके भाई भी दिल्ली में थे, लेकिन लॉकडाउन के कारण आखिरी वक्त पर मिल नहीं पाए
- उनकी यूनिट के जवानों ने मोबाइल पर फोटो देख कर दी अंतिम विदाई
विस्तार
उनका बहुत मन था कि वे कब्रिस्तान पहुंचकर अपने साहब को अंतिम विदाई देते, मगर कोरोना की बंदिशों के कारण संभव नहीं हो पाया। यहां तक कि हुसैन के सगे भाई खैरुल इस्लाम दिल्ली में ही थे, लेकिन वे भी उनके अंतिम दर्शन नहीं कर सके। जब उन्हें खबर मिली कि बड़ा भाई हुसैन अस्पताल में है, तो वे वहां जाना चाह रहे थे, लेकिन नियमों के चलते नहीं जा पाए।
थोड़ी देर में खबर मिली कि अब हुसैन साहब नहीं रहे। जब एसआई इकराम हुसैन को कब्रिस्तान में दफनाया जा रहा था, तो ये लोग अपने मोबाइल फोन में उनका फोटो निकालकर उन्हें देख रहे थे। बहुत से जवानों की आंखों में आंसू थे। कई जवानों ने अपने कमरे में खड़े होकर उन्हें सैल्यूट किया।
आपके भाई को हम बचा नहीं पाए, ये फोन सुनते ही...
इत्तेफाक तो देखिये एसआई इकराम हुसैन के का सगा भाई हवलदार खैरूल इस्लाम भी सीआरपीएफ में है। घटना के दौरान वह भी दिल्ली में ही तैनात था। यह बात किसी को नहीं मालूम थी। दोनों भाईयों की ड्यूटी अलग-अलग जगह पर थी। इस्लाम बताते हैं कि तीन चार दिन पहले मेरे मोबाइल पर सामान्य संदेश आया था। मैने उसे पढ़ा तो पता चला कि वो तो मेरा भाई है।
इसके बाद मैने कंपनी कमांडर को सारी बात बताई। उन्होंने आला अधिकारियों से बातचीत की। मैने अपने भाई का नंबर मिलाया तो वह स्विच ऑफ था। उस वक्त वे सफदरजंग अस्पताल में जा चुके थे। वहां पर मिलने की इजाजत नहीं थी। मैं बार-बार फोन मिलाता रहा, मगर भाई का फोन स्विच ऑफ आया।
28 अप्रैल को दिन में डॉक्टर का फोन आया कि आपके भाई की सांसें ठीक तरह से नहीं चल पा रही है। हम प्रयास कर रहे हैं, लेकिन वह रिक्वर नहीं हो पा रही। इसके बाद 2.20 पर मेरे पास दोबारा फोन आया। इस बार डॉक्टर बोले, आपके भाई को हम बचा नहीं पाए। मैं ये सोचकर रोने लगा कि इतना निकट होते हुए भी भाई को नहीं बचा सका।
खैरूल मूलत: 136वीं बटालियन में तैनात हैं। असम से इस बटालियन की एक कंपनी दंगे के दौरान दिल्ली आई थी। उसके बाद लॉकडाउन के चलते वह कंपनी यहीं पर रह गई।
इकराम हुसैन बहुत ही नेक एवं कमर्ठ अधिकारी थे: एम. दिनाकरण
सीआरपीएफ मुख्यालय में डीआईजी इंटेलिजेंस एम. दिनाकरण कहते हैं कि इकराम ने मेरे साथ काम किया था। मैं जिस बटालियन को कमांड करता था, वे भी उसी का हिस्सा रहे हैं। उस वक्त हम उत्तर-पूर्व में तैनात थे। तब भी इकराम हुसैन अपनी ड्यूटी के प्रति बहुत सजग रहते थे।
वे अपने सहयोगियों को भी हमेशा अनुशासन की बात सिखाते रहते थे। नियम का उल्लंघन, ये शब्द तो उनकी डिक्शनरी में था ही नहीं। आज सीआरपीएफ का हर जवान उन्हें सलाम करता है। दूसरी ओर इकराम हुसैन की प्लाटून के कई जवान जो अभी क्वारंटीन में हैं, वे उनके चले जाने की खबर सुनकर बहुत दुखी थे।
हुसैन लंबे समय तक सीआरपीएफ की 31वीं बटालियन में तैनात रहे हैं। इस बटालियन में कोरोना के कई केस आने के कारण यहां के अधिकांश स्टाफ को क्वारंटीन किया गया है।
जनाजा, कफन, मिट्टी...हम कुछ भी नहीं कर पाए
खैरूल इस्लाम बताते हैं कि सब बातें मन में ही रह गई। भाई का न जनाजा उठा, न कफन पहनाया और न ही मिट्टी डाल पाए। उनकी प्लाटून के जवानों की आंखें भर आई थी, वे अपने मोबाइल फोन पर साहब का फोटो निकालकर उसे देख रहे थे।
उनकी कमांड में ड्यूटी देने वाले सिपाही अरशद इकबाल बोले, हमारा साहब बहुत नेक आदमी था। उसने कभी किसी का बुरा नहीं किया। आज कोरोना न होता तो सीआरपीएफ और उनके परिवार के सैकड़ों लोग उन्हें अंतिम विदाई देते। हम यहां क्वारंटीन में बैठे हैं और उधर हमारा साहब अंतिम यात्रा पर चला गया।
दिल्ली गेट के निकट जिस कब्रिस्तान में इकराम हुसैन को दफनाया गया, वहां किसी को जाने की इजाजत नहीं थी। सीआरपीएफ की एक टुकड़ी ने अपने अधिकारी को हवा में फायर कर अंतिम सलामी दी। उस वक्त एंबुलेंस को कब्रिस्तान के बाहर रोका गया था। वहां मौजूद अधिकारियों ने दूर से इकराम साहब को सैल्यूट किया।