प. बंगाल के मालदा जिले में थम गया जाली नोटों का सीमा पार का सिलसिला
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देश में जाली नोटों के सबसे बड़े केंद्र के तौर पर बदनाम पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में जाली नोटों की आवक अचानक थम गई है। पांच सौ और हजार के नोटों पर पाबंदी लगाने के मोदी सरकार के फैसले के बाद जाली नोटों के कारोबार से हमेशा चहकने वाले सीमावर्ती इलाकों में मुर्दनी सी छा गई है। जिले में बांग्लादेश की सीमा से लगे कोई 20-22 गांवों में सीमा पार से आने वाले जाली नोटों का कारोबार ही लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन था।
लगभग 12-13 वर्ग किलोमीटर के दायरे में बसे इन गांवों के लोगों का मूल धंधा ही था सीमा पार से जाली नोटों की खेप लाना और फिर यहां से देश के दूसरे इलाकों में भेज कर उनको खपाना। सुरक्षा एजेंसियों का अनुमान है कि फिलहाल देश में जितने भी जाली नोट प्रचलन में थे उनमें आधे से ज्यादा इसी रास्ते से भारत आए थे। पुलिस और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) का कहना है कि सीमा से सटे कालियाचक इलाके के तीन ब्लाक शुरू से ही जाली नोटों की तस्करी के पारंपरिक केंद्र रहे हैं।
एनआईए की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया था कि भारतीय अर्थव्यवस्था में घुसने वाले 80 फीसदी जाली नोट मालदा से लगी बांग्लादेश सीमा से होकर ही देश में आए थे। इस जिले की लगभग 172 किमी लंबी सीमा पड़ोसी देश से सटी है और कंटीले तारों की बाड़ नहीं होने की वजह से उनमें से कुछ जगहों पर सीमा पार करना बेहद आसान है। यहां पहुंचने वाले नोटों में से लगभग 60 फीसदी नोट पाकिस्तान में छापे गए थे। वहां से यह नोट समुद्री रास्ते से बांग्लादेश पहुंचते थे और वहां से स्थानीय लोग तस्करी के जरिए उनको कालियाचक के रास्ते भारत में ले आते थे।
जाली नोटों के इस धंधे में भारी मुनाफा था। पांच सौ और एक हजार के जाली नोटों को खपाने वाले लोगों को 50 से 60 फीसदी मुनाफा मिलता था। मिसाल के तौर पर एक लाख के अंकित मूल्य वाले जाली नोट की कीमत मालदा में 48 हजार रुपये थी तो बांग्लादेश में 44 हजार टाका। अगर नोट बेहतर क्वालिटी के हुए यानी उनके पकड़ में आने का खतरा बहुत मामूली हो तो उनकी कीमत बढ़ कर 60 हजार भारतीय रुपये हो जाती थी।
इलाके की पूरी अर्थव्यवस्था ही जाली नोटों के धंधे पर टिकी है
मालदा के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं कि इलाके की पूरी अर्थव्यवस्था ही जाली नोटों के धंधे पर टिकी है। इन नोटों की बरामदगी के आंकड़े खुद इस बात की पुष्टि करते हैं। वर्ष 2013 में जहां इस इलाके से सुरक्षा एजेंसियों ने 1.44 करोड़ के जाली नोट जब्त किए थे वहीं 2014 में यह आंकड़ा 1.51 करोड़ तक पहुंच गया।
वर्ष 2015 में सुरक्षा एजेंसियों की सख्ती के बावजूद यह आंकड़ा लगभग 3.08 करोड़ तक पहुंच गया। चालू वर्ष के दौरान अक्तूबर तक उस इलाके से 1.15 करोड़ के जाली नोट बरामद हो चुके हैं। अब अगर बरामद होने वाले नोटों की तादाद इतनी है तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जाली नोटों की शक्ल में कितनी रकम देश के दूसरे हिस्सों में पहुंची होगी।
भारी गरीबी, रोजगार के विकल्प नहीं होने और आसान कमाई के लालच में इलाके के युवक से लेकर बूढ़े तक तमाम लोग इस धंधे में शामिल थे। सीमा पार करने के बाद इन नोटों को नेशनल हाइवे-34, फरक्का रेलवे स्टेशन और फिर गंगा पार कर झारखंड होकर देश के दूसरे हिस्सों में भेजा जाता था। इलाके के पुरुष जहां जाली नोटों के कारोबार में शामिल थे वहीं महिलाएं घर-परिवार चलाने के लिए बीड़ी बनाने का काम करती हैं।
जिले से लगी सीमा में से महज 118 किमी में बाड़ लगी है और बाकी खुली है। इनमें एक नदी भी शामिल है जहां से आसानी से सीमा पार की जा सकती है। कालियाचक और वैष्णव नगर थाने के तहत 25 किमी लंबी सीमा पूरी तरह खुली है। वहां न तो सुरक्षा व्यवस्था उतनी चौकस है और न ही कोई दूसरी दिक्कत है।
लोग भी आसान कमाई के लालच में इसका शिकार हो जाते हैं
मालदा के पुलिस अधीक्षक कल्याण बनर्जी कहते हैं कि सीमा पार से आने वाले जाली नोटों को देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने के लिए इलाके के उन भोले-भाले बेरोजगार युवकों की सहायता ली जाती है जो दूसरे शहरों में नौकरी करते हैं या फिर नौकरी की तलाश में वहां जाते हैं। मोटे कमीशन का लालच देकर उनको कॅरियर बना दिया जाता है। वे लोग भी आसान कमाई के लालच में इसका शिकार हो जाते हैं।
लेकिन अब सरकार के ताजा फैसले ने इस धंधे में शामिल लोगों की नींद उड़ा दी है। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि मोटे मुनाफे के लालच में खरीदे गए जाली नोटों के स्टाक का अब क्या करें? फिलहाल तो यह धंधा पूरी तरह ठप हो गया है। लेकिन कहावत है कि मुंह में एक बार खून लग जाए तो फिर जल्दी नहीं छूटता।
इसी तर्ज पर अब अपने विदेशी आकाओं के निर्देश पर यह लोग किसी तरह पांच सौ और दो हजार के नए नोटों का जुगाड़ करने में जुटे हैं ताकि उनको सीमा पार भेज कर उनकी नकल तैयार की जा सके। लेकिन फिलहाल यह काम उतना आसान नहीं है और अगर वैसा हुआ भी तो उसमें काफी समय लग सकता है। ऐसे में इलाके के लोगों के सामने अब हाथ पर हाथ धरे इंतजार करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा है।