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दिवालीः गाय के गोबर से 100 करोड़ दिये बनाने का रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं गौसंस्थान, जानें कैसे बढ़ रहा गोबर उत्पाद का व्यवसाय

Sun, 31 Oct 2021 03:15 PM IST
संजीव कुमार झा अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Sun, 31 Oct 2021 03:15 PM IST
सार

धनतेरस के अवसर से लेकर दीपावली और देव दीपावली तक ये दिये देश के प्रमुख मंदिरों, संस्थानों और लोगों के घरों पर जलाए जाएंगे। इसके लिए गोसंरक्षण से जुड़े सौ से ज्यादा संस्थान अपना योगदान दे रहे हैं।

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Cow dung diya stalls will be a huge attraction at Diwali 2021 Mela venue, dr vallabhbhai kathiria,  Rashtriya Kamdhenu Aayog, Kamdhenu Deepawali 2021
दिये - फोटो : Amar ujala

विस्तार

राष्ट्रीय कामधेनु आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. वल्लभभाई कथीरिया का दावा है कि इस साल दीपावली पर गाय के गोबर से 100 करोड़ दिये बनाए जाएंगे। धनतेरस के अवसर से लेकर दीपावली और देव दीपावली तक ये दिये देश के प्रमुख मंदिरों, संस्थानों और लोगों के घरों पर जलाए जाएंगे। इसके लिए गोसंरक्षण से जुड़े सौ से ज्यादा संस्थान अपना योगदान दे रहे हैं। कथीरिया का दावा है कि अब तक मिले ऑर्डर को देखते हुए उन्हें उम्मीद है कि ये लक्ष्य आसानी से पूरा कर लिया जाएगा।

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डॉ. वल्लभभाई कथीरिया ने कहा कि पर्यावरण के लिए पूरी तरह अनुकूल इन दियों को भारी संख्या में अयोध्या पर्व में मनाई जा रही दीपावली, काशी, प्रयाग और हरिद्वार जैसी धार्मिक महत्त्व की जगहों पर होने वाले दीपोत्सव कार्यक्रमों में उपयोग किया जाएगा। इससे वातावरण में शुद्धि के साथ-साथ गौवंश की भूमिका को मजबूत करने और आर्थिक रूप से उन्हें उपयोगी बनाने में मदद मिंलेगी।
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कितने उपयोगी गाय के गोबर से बने दिये
नीलकंठ गोविघ्नान केंद्र (गुजरात) के प्रमुख सदस्य मेघजी रावजी हीरानी ने अमर उजाला को बताया कि गाय के गोबर से बनने वाले दियों की पर्यावरण के प्रति शुद्धता को देखते हुए लोगों में इनके प्रति आकर्षण लगातार बढ़ रहा है। पिछले वर्ष दीपावली के अवसर पर उन्होंने केवल 2.5 लाख दिये बनाए थे, लेकिन ज्यादा मांग होने के कारण इस बार उन्होंने अपने संस्थान की क्षमता बढ़ाकर पांच लाख दिये कर दिया है। इन दियों की सबसे ज्यादा मांग गुजरात, दिल्ली, महाराष्ट्र, चेन्नई और अन्य राज्यों से आ रही है।
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थोक कीमत में इन दियों की कीमत निर्माण सामग्री और इन पर बन रही कलाकृतियों के ऊपर बढ़ती जाती है। इन दियों की कीमत खुदरा बाजार में एक रूपये, दो, पांच, दस रूपये से लेकर 75 रूपये तक है। दिये दो प्रकार के हैं- एक जो पूरी तरह जलकर नष्ट हो जाते हैं- इन्हें जलाने के लिए साथ में एक स्टैंड दिया जाता है, जिन पर इन्हें लगाकर सुरक्षित तरीके से जलाया जाता है, दूसरे वे जो सामान्य दियों की तरह केवल तेल रहने तक जलते हैं। इनका दिया पूरी तरह नष्ट नहीं होता, लेकिन इसे मिट्टी के दियों की तरह कहीं भी रखा जा सकता है।

हीरानी ने बताया कि उनका संस्थान एक लघु उद्योग की तरह है। उनके पास गौशाला में 122 गौवंश हैं। इनके गोबर से दिये बनाने के काम में लगभग 22 महिलाएं लगी हुई हैं। एक सामान्य दिए बनाने के लिए एक महिला को 40 पैसे प्रति दिये की कीमत मिल जाती है। एक महिला एक दिन में 400-600 रूपये कमा लेती है। इस प्रकार यह संस्थान इन परिवारों की आय का एक बड़ा साधन बन गया है।

संस्थान का दावा है कि गाय का दूध, दही और इससे पैदा होने वाला घी उनके लिए दूसरे दर्जे का उत्पाद है। उनके लिए गौवंश का गोबर प्राथमिक उत्पाद है। गाय के गोबर से केवल दिये ही नहीं बनाए जा रहे हैं, बल्कि बच्चों के खिलौने, मोबाइल रखने का केस, स्टैंड, मंदिर, गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां, गमले और इस तरह के 71 उत्पाद अन्य उत्पाद भी संस्थान के परिसर में बनाए जा रहे हैं। संस्थान का दावा है कि किसी गाय के दूध न देने की स्थिति में भी केवल उसके गोबर से बनने वाला उत्पाद गाय पालन को आर्थिक दृष्टि से लाभकारी बना देता है।

संस्थान का दावा है कि गोशाला के नाम पर वे किसी संस्था या व्यक्ति से कोई दान नहीं स्वीकार करते हैं। गोबर उत्पादों की बिक्री से होने वाली आय से गोशाला में पलने वाले जानवरों का पूरा खर्च निकाला जाता है। साथ ही इसी कमाई पर इससे जुड़े परिवार पूरी तरह निर्भर हैं।  

गोबर से कमाई के कई अवसर
गोबर से विभिन्न उपयोगी उत्पाद बनाने के लिए औसत किस्म की हाथ से चलने वाली मशीनें लगाने और कामकाज शुरू करने में 50 हजार रूपये तक की लागत से यह व्यवसाय शुरू किया जा सकता है। शुरूआती तौर पर मांग के आधार पर 10 से 15 हजार रूपये प्रति माह तक की कमाई की जा सकती है। इनमें दीपावली जैसे सीजन में दिये, गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां बनाई जा सकती हैं तो अन्य सीजन में खिलौने और अन्य घरेलू उपयोग के सामान बनाकर बेचे जा सकते हैं।      


गुजरात के कच्छ इलाके में इस तरह के लगभग 30 संस्थान काम कर रहे हैं। सौराष्ट्र में 120 से ज्यादा संस्थान गोबर के उत्पादों के बेचने के व्यवसाय का सफलतापूर्वक संचालन कर रहे हैं। देश के दक्षिणी राज्यों में भी इनका चलन तेजी से बढ़ रहा है।  

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