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कोवर्ट ऑपरेशंस: एक अजीब दुनिया जहां बेरहमी और खतरनाक साजिश से आती है मौत

Sun, 02 Dec 2018 01:25 PM IST
रवि दुबे, अमर उजाला
रवि दुबे, अमर उजाला Updated Sun, 02 Dec 2018 01:25 PM IST
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Covert Operations: A Strange world where death Comes From Dreadful and Dangerous Conspiracy
ताल योशुआ करेन

इस घटना को कुछ साल बीत चुके हैं। राजधानी दिल्ली में 13 फरवरी की एक अलसाई हुई दोपहर। इस्राइली दूतावास के अलोन योशुआ की बीवी ताल योशुआ करेन के लिए तो वह भी हर दिन की ही तरह था। ताल भी इसी दूतावास में प्रशासनिक अताशे के पद पर थी। 

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रोजमर्रा की तरह वह चाणक्यपुरी स्थित अमेरिकी दूतावास के स्कूल से अपने तीनों बच्चों को लाने के लिए अपनी राजनयिक कार (109 सी डी 35) में रवाना हुई। कुछ ही मिनट वाद उसकी कार एक व्यस्त क्रॉसिंग पर लाल बत्ती होने के कारण रुकी। एक मोटरसाइकिल सवार भी उसकी गाड़ी के पास आकर रुका।
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इसी बीच बत्ती हरी हो गई और ताल की कार आगे बढ़ गई। थोड़ा ही आगे गई होगी कि एकाएक कान के परदे फाड़ देने वाला एक धमाका हुआ। कार के पिछले हिस्से में किसी ने बम लगा दिया था जो फट गया था। ताल के शरीर से खासा खून बह रहा था। उसके ड्राइवर ने तुरंत उसे बाहर निकला और एक ऑटो रिक्शा बुलाकर उसे दूतावास के लिए रवाना कर दिया, जहां कर्मचारियों ने तुरंत उसे एक निजी अस्पताल में पहुंचाया। 
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चूंकि मामला एक इस्राइली राजनयिक पर आतंकी हमले का था, लिहाजा जैसा कि अपेक्षित था, खासा बवाल मचा। इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान और उसके प्रॉक्सी हिजबुल्ला पर हमला करवाने का आरोप लगाया। लेकिन नई दिल्ली स्थित तेहरान के राजदूत ने आरोपों को खारिज करते हुए हमले की भर्त्सना की और भारत पर हमले के पीछे कौन है, इस बात की जांच करने के लिए कहा।

उक्त राजनयिक को तुरंत विमान द्वारा वापस इस्राइल ले जाया गया। मामले की जांच कर रही दिल्ली पुलिस उक्त कांड के कर्ता-धर्ताओं का पता लगाने के नाम पर अंधेरे में हाथ पैर मारती रही और इस प्रकिया में उसे सरकार और जनता, दोनों की लानतें झेलनी पड़ीं। उक्त घटना के आयाम अंतरराष्ट्रीय हैं।

आखिर किसी राजनयिक महिला को कोई क्यों मारना चाहेगा? और यदि ऐसे कोई कारण हैं भी तो फिर वह सिर्फ घायल कर के क्यों छोड़ दी गई? बम के फटने से गाड़ी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई, एक भी व्यक्ति नहीं मरा? क्या हमलावर किसी तरह  का कोई संदेश देना चाहते थे? किसको और क्या? 

इसमें असाधारण कुछ भी नहीं है! वह इसलिए कि गुप्त अभियानों को भेद पाना आसान नहीं है। बहुत सी घटनाएं अपराध या आतंकवादी कार्रवाइयां नजर आती हैं, लेकिन असलियत में वे खुफिया एजेंसियों के गुप्त अभियान यानी कोवर्ट ऑपरेशंस होते हैं। इस मामले में भी विशेषज्ञों का यही मानना है के यह घटना भी किसी कोवर्ट ओपरेशन का नतीजा हो सकती है। 

कोवर्ट ऑपरेशनों में से एक नमूना और यहां पेश है। यहां शक की सुई इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद की तरफ इशारा करती है और यह वाकया है चंद साल पहले 19 जनवरी को इस्लामी फिलिस्तीनी आतंकवादी गुट हमास के सैन्य प्रकोष्ठ इज्जदीन अल कासिम ब्रिगेड के सह संस्थापक महमूद अल मबूहा की हत्या का मामला।

इस्राइली सरकार को 1989 में अपने दो सिपाहियों की हत्या के मामले में महमूद अल मबूहा की तलाश थी। फिर उसने ईरान से गाजा में इस्तेमाल करने के लिए हथियार भी खरीदे थे। उसके कई दुश्मन थे। मिस्र ने उसे 2003 में साल भर तक जेल में रखा था और जॉर्डन की खुफिया एजेंसी भी उसे ढूंढ रही थी। 

महमूद अल मबूहा दमिश्क से दुबई के लिए अमीरात की फ्लाइट  नंबर 912 से 19 नवंबर की सुबह 10 बजकर पांच मिनट पर रवाना हुआ। दमिश्क में मोसाद के एक एजेंट ने उसे जहाज पर चढ़ते देखा। अल मबूहा ने यह फ्लाइट ऑनलाइन बुक की थी और गाजा में अपने घरवालों को उस होटल का नंबर भी दे दिया था, जहां वह इस यात्रा के दौरान ठहरने वाला था। 

अल मबूहा महमूद अब्दुल रऊफ मोहम्मद की फर्जी पहचान पर नकली पासपोर्ट से 15:15 बजे दुबई पहुंचा। आम तौर पर उसके अंगरक्षक उसके साथ रहते थे, लेकिन उन्हें उस फ्लाइट के टिकट नहीं मिले। लिहाजा वह अकेला ही था और अंगरक्षक दूसरे दिन आने वाले थे। दरअसल, मबूहा चीन जा रहा था।

उसने दुबई में अल बुस्तान रोतना होटल के लिए टैक्सी ली और कमरा नंबर 230 में रुक गया। उसे एक बिना बालकनी और बंद खिड़कियों वाला कमरा चाहिए था ताकि किसी को भी दरवाजे से ही अंदर आना पड़े। उसने नहाकर कपड़े बदले, दस्तावेज तिजोरी में रखे और बमुश्किल घंटे भर के अंदर अंदर यानी 16:30 से 17:00 बजे के बीच होटल से रवाना हो गया। 

अगले तीन से चार घंटों में उसने क्या किया, यह पता नहीं चल पाया। लेकिन वह अमीरात में किसी से नहीं मिला और उसने खरीदारी की। इस दौरान कातिलों की टीम उसके कमरे में दाखिल हो गई। 20:24 पर उसकी बीवी ने जब उसे फोन किया तो उसे कोई जवाब नहीं मिला। 

दरअसल, जब वह होटल में पहुंचा ही था, तो टेनिस प्लेयर के वेश में दो लोग उसके पीछे लग गए। उन्होंने देख लिया कि वह कमरा नंबर 230 में रुका  था। उसके ठीक सामने वाले कमरे का नंबर था 237 जो किसी तीसरे वक्ति ने बुक कर लिया। वह व्यक्ति अपने कमरे में गया ही नहीं और उसने कमरे की चाबी लॉबी में किसी अन्य व्यक्ति को  थमा दी और हत्या के पहले ही दुबई से रवाना हो गया।

अल मबूहा जब होटल से निकला तो कई जोड़ी आंखें उस पर लगी थीं। उसी समय उसके हत्यारे उसके कमरे में दाखिल हुए। लिफ्ट से निकलने वाले एक पर्यटक को एक व्यक्ति ने उलझाकर देर करवाई। इस बीच अन्य चार मबूहा के कमरे में दाखिल होने में कामयाब हो गए और उसके लौटने का इंतजार करने लगे। उसके लौटते ही उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया और जिस खामोशी से आए थे, उसी तरह गायब हो गए। 

दुबई के तत्कालीन पुलिस प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल दाही खलफान तमीम ने अपने ये प्रारंभिक निष्कर्ष 18 फरवरी को घोषित किए। “हमारी जांच दर्शाती है कि अल मबूहा की हत्या में मोसाद का हाथ है। 100 प्रतिशत नहीं तो 99 प्रतिशत तो है ही कि हत्या के पीछे मोसाद खड़ा है।”

फर्जी नाम से शामिल 11 लोगों की फोटो पहचान के बाद उनका कहना था कि उनकी पुलिस के पास इस हत्या में मोसाद की सीधी संलिप्तता का सबूत है और उनके पास सभी हत्यारों के मोबाइल कॉल डीटेल्स हैं। बाद में पता चला कि महमूद अल मबूहा की हत्या के फैसले पर इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने मोसाद प्रमुख मीर डागन के सुझाव पर जनवरी 2010 में ही मोहर लगा दी थी! मामले की जांच अभी तक पूरी नहीं हो सकी है।

ये तो महज चंद ही मामले हैं। ऐसे कितने प्रकरण हैं जो दब गए हैं और कामयाब तरीके से दबा भी दिए गए हैं। और कितने ही ऐसे भी हैं, जिनका कभी खुलासा ही नहीं हुआ और न ही इस बात की कोई उम्मीद है। मगर हां, एक बात जरूर है। खुफिया एजेंसियों को इस बारे में मालूम होता है कि कहां क्या गुप्त अभियान चल रहे हैं। लेकिन उन्हें इस बारे में किसी को, खासकर जनता जनार्दन को बताने की जरूरत ही नहीं होती। 

वे जासूसी करते थे

एक थे अलेक्जेंडर लित्विनेंको, जो रूसी संघीय सुरक्षा सेवा यानी कि रशियन फेडरल सिक्योरिटी सर्विस, फेडरल सर्विस ब्यूरो और के. जी. बी. में अफसर हुआ करते थे। जब पता चला कि वे इंग्लैंड के लिए जासूसी करते थे, तो वे भाग निकले और ब्रिटेन में शरण ले ली।

उन्होंने दो किताबें लिखीं, जिनमें उन्होंने रूसी सीक्रेट सर्विसेज पर व्लादीमिर पुतिन को सत्ता में लाने के लिए रहवासी इमारतों में बम लगाने और अन्य आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप लगाया। 1 नवंबर 2006 को लित्विनेंको एकाएक बीमार पड़े और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। तीन हफ्ते बाद उनकी मौत हो गई।

उन्हें खासा रेडिएशन हो गया था, जो घातक पोलोनियम-210 के कारण हुआ था। उनका इलाज करने वाले डॉक्टरों का कहना था कि लित्विनेंको की हत्या आण्विक आतंकवाद की शुरुआत है। बहरहाल, इस हत्या से कुछ सीमा तक एफ. एस. बी. और व्लादीमिर पुतिन के खिलाफ उनके आरोपों को मीडिया में विश्वव्यापी कवरेज मिला। 

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