सिखों पर बनने वाले चुटकुलों पर SC का रोक लगाने से इंकार
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सिख समुदाय पर बनने वाले चुटकुलों पर रोक लगाने को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि क्या वह नागरिकों के लिए नैतिक दिशानिर्देश जारी कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोगों को चुटकुले सुनाने से कैसे रोका जा सकता है और अगर दिशानिर्देश बना भी दिया जाए तो इस पर नियंत्रण कैसे संभव है।
चुटकलों पर लोगों की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग होती है, ऐसी स्थिति में वह यह कैसे तय कर सकता है कि लोगों को क्या प्रतिक्रिया देनी चाहिए। साथ ही अदालत ने कहा कि किसी खास समुदाय विशेष केलिए आखिरकार कैसे दिशानिर्देश बनाया जा सकता है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति आर भानुमति की पीठ ने कहा, हमें नहीं लगता कि हमें इस मसले पर जाना चाहिए। हम इसे लेकर असहज हैं।
हम नागरिकों के लिए नैतिक दिशानिर्देश नहीं जारी कर सकते। मौलिक कर्तव्य हमारे संविधान का हिस्सा है। लोगों को एक दूसरे का सम्मान किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद-32(रिट दायर करने का अधिकार) का दायरा बड़ा कर दिया है और अनुच्छेद-21 (जीने और स्वतंत्रता का अधिकार) का अब भी फैलाव हो रहा है। लेकिन हमें यह देखना होगा कि क्या इस तरह की जनहित याचिका पर विचार किया जाना चाहिए?
पीठ ने यह भी कहा कि चुटकुलों पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं होती हैं। कोई हंसता है, कोई मुस्कराता है, कोई किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं देता है। मालूम हो कि न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली यह पीठ पहली बार इस याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
'सिख समुदाय के लोगों का चुटकुलों के जरिए उपहास उड़ाया जाता है'
पूर्व पीठ ने इस मामले में याचिकाकर्ता हरविंदर चौधरी और दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति(डीएसजीपीसी) समेत अन्य संगठनों को सुझाव देने के लिए कहा था कि आखिरकार सिख समुदाय पर बनने वाले चुटकुलों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर कैसे प्रतिबंध लगाया जा सकता है। याचिकाकर्ता खुद भी सिख समुदाय से है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि स्कूल, कॉलेजों और कार्यस्थलों पर सिख समुदाय के लोगों का चुटकुलों के जरिए उपहास उड़ाया जाता है, जो सही नहीं है। इससे सिखों को मानसिक रूप से चोट पहुंचती है। उन्होंने कहा कि लिहाजा इसकेलिए दिशानिर्देश बनाए जाने की दरकार है। इस पर पीठ ने कहा कि इस संबंध में शिकायत मिलने पर स्कूल और कॉलेज प्रबंधन इस बात पर ध्यान देंगे।
अगर किसी व्यक्तिगत शिकायत है तो उससे निपटने के लिए आईपीसी और आईटी कानून में प्रावधान है। पीठ ने कहा कि भारत विविधता वाला देश है।
पीठ ने डीएसजीपीसी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एचएस सूरी से कहा कि आखिरकार किसी एक समुदाय विशेष केलिए हम कैसे दिशानिर्देश बना सकते हैं। कल होकर कोई अन्य धर्म या समुदाय के लोग कोर्ट आ जाएंगे। पीठ ने कहा कि अगर दिशानिर्देश बना भी दिया जाए तो इस पर नियंत्रण कौन रखेगा।
पीठ ने कहा कि जहां तक इस तरह केचुटकलों का सोशल मीडिया में प्रचार-प्रसार का सवाल है, इस पर अंकुश लगाने के लिए सॉलिसिटर जनरल की मदद ली जा सकती है, जैसे प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण संबंधी विज्ञापनों को लेकर किया गया था। पीठ ने कहा कि फिलहाल वह इस मामले में कोई आदेश नहीं पारित करेगी लेकिन वह सुनवाई की अगली तारीख 27 मार्च को कोई आदेश पारित कर सकती है।