Coronavirus: लॉकडाउन ने कामकाजी महिलाओं के दोनों मोर्चों पर बढ़ाया काम, बदल सकता है वर्क कल्चर
- नया वर्क कल्चर सीख रहा हिन्दुस्तान, बदल सकता है काम करने का तरीका
- उत्पादकता के साथ ही बढ़ गईं चुनौतियां
- काम के साथ छूटे हुए शौक भी हो रहे पूरे
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भारतीय परिवेश में महिलाओं के लिए काम करने की परिस्थितियां पुरुषों के मुकाबले हमेशा मुश्किल होती हैं। ऑफिस के कामकाज के साथ-साथ उन्हें घर की भी जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है। लॉकडाउन के दौरान कामकाजी महिलाओं को घर में रहते हुए भी अनेक चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है।
लेकिन इस परिस्थिति में भी वे नई-नई राह निकाल रही हैं। एक बैंक के एचआर विभाग में काम करने वाली अनाया सिंह कहती हैं कि यह स्थिति सीखने के नए अवसर के रूप में सामने आई है। वे सीख रही हैं कि घरेलू परिस्थितियों में किस तरह काम को और बढ़ाया जा सकता है। वहीं, डॉक्टरी और अन्य जरूरी सेवाओं में लगी महिलाओं के लिए भी चुनौतियां बढ़ी हैं।
आईसीआईआई बैंक की एचआर के तौर पर काम कर रहीं अनाया सिंह बताती हैं जब वे ऑफिस जाकर काम करती हैं तब उनकी आठ घंटे की ड्यूटी होती है। ऑफिस का समय खत्म होते ही उनके ऊपर से काम का दबाव खत्म हो जाता था। लेकिन जब से लॉकडाउन के कारण घर से काम कर रही हैं, उनके कामकाज के घंटे बढ़ गए हैं।
अब वे बारह से चौदह घंटे तक काम कर रही हैं। इस दौरान इतनी सुविधा अवश्य हुई है कि ऑफिस की ड्रेस में बैठकर काम करने की बाध्यता खत्म हो गई है। अब वे कभी बैठकर तो कभी लेटे हुए भी काम कर सकती हैं। इससे उन्हें काफी आराम मिल जाता है, लेकिन इससे उनकी उत्पादकता बढ़ गई है।
एचआर विभाग में काम करने के अनुभव के तौर पर अनाया का कहना है कि इस लॉकडाउन से हिन्दुस्तान की व्यवस्था में ‘वर्क फ्रॉम होम’ के कांसेप्ट का अध्ययन कर इसके लाभ-हानि का बेहतर मूल्यांकन कर पाने की स्थिति में है।
जब कर्मचारी ऑफिस में काम करता है तो वेतन के आलावा प्रति कर्मचारी ऑफिस एरिया, लाइट, बिजली, पानी, बैठने की व्यवस्था या वाहन जैसे कई अन्य खर्च कंपनी को करने पड़ते हैं। जबकि वर्क फ्रॉम होम में इन खर्चों से कम्पनी को बचत हो जाती है जो कई बार बहुत प्रभावी होता है। लेकिन यह कांसेप्ट उन्हीं कार्यों में ज्यादा परिणामदायक हो सकता है जिसमें काम का दूरी से बैठ कर भी मूल्यांकन करना संभव होता है।
सितार का शौक कर रहीं पूरा
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता शर्मिष्ठा मुखर्जी को सितार बजाने का बहुत शौक था, लेकिन कामकाज की व्यस्तता ने उन्हें अपना यह शौक पूरा करने का समय नहीं दिया। अब इस लॉक डाउन के दौरान वे अपने उस शौक को दुबारा आजमा रही हैं। शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अमर उजाला को बताया कि लॉक डाउन की इस अवधि में उनके कामकाज में काफी बदलाव आया है।
उनकी पार्टी के कार्यकर्ता ‘कांग्रेस की रसोई’ नाम से एक अभियान चला रहे हैं। महिला कांग्रेस की कार्यकर्ता अपना घर संभालने के साथ-साथ रसोई में भोजन बनाने में भी सहयोग दे रही हैं। वे लगातार अपने कार्यकर्ताओं के संपर्क में भी रहने की कोशिश करती हैं। दिल्ली के जिन इलाकों को सील किया गया है, वे लगातार फोन कर अपने कार्यकर्ताओं से काम की जानकारी ले रही हैं।
बढ़ गई जिम्मेदारी
मेट्रो अस्पताल की प्रसूति विशेषज्ञ (गायनोकोलॉजिस्ट) डॉक्टर अंजू बताती हैं कि लॉकडाउन की स्थिति में उन्हें ज्यादा चुनौतीपूर्ण काम करना पड़ रहा है। प्रसव की सुविधा अन्य कुछ अस्पतालों में कम हो गई हैं क्योंकि उन्हें अन्य जरुरी सेवाओं के लिए चुन लिया गया है।
ऐसे में डॉ. अंजू के पास ज्यादा केस आ रहे हैं। सही समय पर अस्पताल पहुंचकर प्रसव कराना उनकी बड़ी जिम्मेदारी होती है। कामकाज की बढ़ी चुनौती के साथ ही उन्हें उन्हें घर का काम भी संभालना पड़ रहा है।
चेहरे पर स्वाभिमान और मुस्कान लिए डॉक्टर अंजू बताती हैं कि वे अपनी चुनौतियों से निबटते हुए थकती नहीं हैं। क्योंकि वे एक मां हैं, प्रसव कराने के दौरान भी और बच्चों के लिए अपने घर पर भी, इसलिए वे चाहकर भी रुक नहीं सकती हैं।