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लॉकडाउन 2.0 : नौकरी नहीं-पैसे खत्म, फंसे प्रवासी मजदूर घर लौटने को बेकरार, कई जगह हंगामा

Thu, 16 Apr 2020 04:21 AM IST
योगेश साहू न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: योगेश साहू Updated Thu, 16 Apr 2020 04:21 AM IST
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Coronavirus Case News In Hindi : Lockdown 2, No job, no money, stranded migrant laborers desperate to return home, uproar in many places
सूरत में लॉकडाउन के बीच अपने घर जाने देने की मांग करते प्रवासी मजूदर। - फोटो : PTI

बेहतर जिंदगी की आस लिए अपने गांव-घरों से निकले प्रवासी मजदूर मीलों दूर देश के विभिन्न हिस्सों में छोटे-बड़े रोजगार धंधों में लगे हुए थे। लेकिन कोरोना महामारी फैलने के कारण अब वे लॉकडाउन में जहां-तहां फंस गए हैं। पहले तीन हफ्ते के लॉकडान की अवधि को किसी तरह निकालने के बाद वह हर हाल में अपने-अपने घर लौटना चाहते थे।

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अब दो और हफ्ते के लॉकडाउन 2 ने उनकी बेचैनी बढ़ा दी है और इस छटपटाहट में वह देश के कई शहरों में हंगामा कर रहे हैं। इस बीच उनका रोजगार तो बंद हो ही गया, जो थोड़े पैसे बचे थे वह भी खत्म हो गए हैं।
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गैरकृषि महीनों में शहरों में कमाई करने जाने वाले प्रवासी मजदूरों की चिंता यह भी है कि अब फसलों की कटाई का समय है ऐसे में घर नहीं पहुंचे तो तैयार फसल बर्बाद हो जाएगी और वह गहरे कर्ज में डूब जाएंगे। हालांकि इनके पास लॉकडाउन खत्म होने का इंतजार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
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रेलवे के पार्सल विभाग में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर अनिल यादव ने यूपी के महाराजगंज स्थित अपने घर जाने की तैयारी कर रखी थी, लेकिन लॉकडाउन 2 की घोषणा ने उसे स्तब्ध कर दिया। उसने बताया कि वह एक बीघा में गन्ने की खेती करता है और दो बीघे में गेहूं की फसल है।

उम्मीद थी कि इससे परिवार के पास कुछ पैसा आ जाता, लेकिन उसके यहां फंस जाने से आशा पर पानी फिर गया है। मेरी पत्नी, बच्चे और बूढ़े माता-पिता का और कोई सहारा नहीं है। 330 अन्य लोगों के साथ यमुना स्पोर्ट्स कंप्लेक्स में रहने वाले यादव ने बताया कि उसके परिवार की आर्थिक परेशानी शुरू हो गई है।

सात से आठ हजार महीना कमा लेता था, लेकिन अब काम और पैसे दोनों नहीं हैं। हजारों प्रवासी मजदूरों के साथ वह भी 1 अप्रैल को बस लेने आनंद विहार गया था, लेकिन पुलिस ने उसे लौटा दिया। चार बच्चों की मां 36 वर्षीय आशा देवी बात करते समय अपने आंसू नहीं रोक पाती। उसने बताया कि उसके 14 साल और 6 साल के दो बेटे यूपी के बांदा स्थित गांव में अकेले हैं।

बड़ा मजदूरी करता है और छोटे का ध्यान रखता है। पिछले महीने वह गाजियाबाद के ईंट भट्ठे पर काम करने के लिए अपने पति और 13 अन्य लोगों के साथ पहुंची थी। ठेकेदार ने उन्हें राशन देने का वादा किया था, लेकिन अचानक भाग गया। अब उनके पास खाने को कुछ नहीं है। मजबूरन सभी पैदल ही गांव जाने के लिए निकले, लेकिन पुलिस ने उन्हें लौटा दिया।

अनगिनत मजदूरों की अंतहीन दास्तान

हाथरस के 34 वर्षीय मोनू वेटर का काम करता है। उसकी पत्नी, मां और दो बच्चे गांव में रहते हैं। उसने बताया कि होली के दौरान उसने परिवार को कुछ पैसे भेजे थे, जो अब पूरी तरह खत्म हो गए हैं। लॉकडाउन के कारण अब न काम है और न कमाई क्या करें समझ नहीं आ रहा।

यह दो-चार नहीं अनगिनत मजदूरों की अंतहीन दास्तान है, जो काम धंधे की तलाश में हरियाणा, राजस्थान, बिहार, बंगाल आदि राज्यों से देश के अन्य शहरों में पहुंचे थे, लेकिन लॉकडाउन में फंसे हुए हैं।

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