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अमेरिकी पूर्व राजनयिक से बोले राहुल, धर्म के आधार पर बांटने वालों ने खुद को राष्ट्रवादी घोषित किया

Fri, 12 Jun 2020 11:23 AM IST
अनवर अंसारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अनवर अंसारी Updated Fri, 12 Jun 2020 11:23 AM IST
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Conversations with Rahul Gandhi and Nicholas Burns on Coronavirus racism in the US and India live updates
राहुल गांधी एवं निकोलस बर्न्स - फोटो : Twitter

कोरोना वायरस महामारी के बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शुक्रवार को एक बार फिर असहिष्णुता और चीन का मुद्दा उठाया। राहुल ने पूर्व अमेरिकी राजदूत और विदेशी मुद्दों के जानकार प्रोफेसर निकोलस बर्न्स से बातचीत की। उन्होंने अमेरिका में नस्लवाद के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों की तुलना भारत के माहौल से की और कहा कि दोनों देशों में असहिष्णुता बढ़ रही है। 

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इस पर पूर्व अमेरिकी राजदूत ने कहा कि चीन और रूस जैसे सत्तावादी देशों के कारण भारत और अमेरिका चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम चीन के साथ संघर्ष नहीं चाहते, लेकिन हम चीन के साथ विचारों की जंग लड़ रहे हैं। 
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बर्न्स ने कहा कि भारत और अमेरिका चीन से लड़ने के लिए नहीं, बल्कि उससे नियमों का पालन कराने के लिए मिलकर काम कर सकते हैं। विश्व में मानव स्वतंत्रता, लोकतंत्र और लोगों के शासन को प्रोत्साहित करने के लिए भारत और अमेरिका को मिलकर काम करना चाहिए।
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राहुल गांधी: अमेरिका में अभी क्या हो रहा है, ऐसा क्यों दिख रहा है?

निकोलस बर्न्स: अमेरिका में इस तरह की परेशानियां हैं, अफ्रीकी-अमेरिकियों के साथ लंबे वक्त से ऐसा होता रहा है। अमेरिका में मार्टन लूथर किंग ने बड़ा काम किया है, उनके आदर्श भी महात्मा गांधी थे। अमेरिका ने बराक ओबामा जैसे नेता को राष्ट्रपति चुना लेकिन आज क्या देखने को मिल रहा है। किसी का भी हक है, प्रदर्शन करना लेकिन अमेरिका में राष्ट्रपति ब्लैक लोगों को आतंकवादी समझते हैं।

राहुल गांधी: भारत और अमेरिका दोनों ही सहिष्णु देश हैं, जो नए विचार को समझते हैं और किसी भी विचार की इज्जत करते हैं। लेकिन आज दोनों देशों में दिक्कत है।

निकोलस बर्न्स: आज अमेरिका के लगभग हर शहर में इस तरह का प्रदर्शन हो रहा है, जो लोकतंत्र के लिए मायने रखता है। अगर हम चीन जैसे देश को देखते हैं, तो हम काफी बेहतर हैं। भारत में भी यही है वहां भी लोकतंत्र है और लंबे संघर्ष के बाद आजादी मिली है। हमें उम्मीद है कि अमेरिका का लोकतंत्र फिर मजबूत होगा।

राहुल गांधी: मुझे जो बंटवारा होते हुए दिख रहा है, वो दोनों देशों को कमजोर करने की स्थिति में ले जा रहा है। जब आप लोगों को जाति या धर्म के आधार पर बांटने लगते हैं, तो आप देश की नींव को कमजोर कर रहे होते हैं। वर्तमान में जो ऐसा करने में लगे हुए हैं, उन्होंने खुद को राष्ट्रवादी घोषित किया हुआ है। 

निकोलस बर्न्स: मुझे भी ऐसा ही लगता है, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लगता है कि वह सबकुछ ठीक कर सकते हैं। लेकिन अमेरिका में सेना के लोगों ने साफ कर दिया है कि वे स्वयं के नागरिकों के खिलाफ सड़क पर नहीं उतरेंगे। उनका कहना है कि वह संविधान को सर्वोपरि मानते हुए चलेंगे न कि राष्ट्रपति के हिसाब से। अमेरिकी नागरिकों को प्रदर्शन करने का हक है, लेकिन सत्ताधारी लोग लोकतंत्र को चुनौती देने में लगे हुए हैं। चीन और रूस जैसे देशों में अभी भी अधिनायकवाद हो रहा है।

राहुल गांधी: भारत और अमेरिका के बीच पहले रिश्ते काफी बेहतर हुआ करते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों में इसमें दोनों ही पक्षों से मायूसी देखी गई है और यह सिर्फ व्यापार आधारित रिश्ता हो गया है। 

निकोलस बर्न्स: दोनों देश बहुत कम ही मुद्दों पर एक समान राय रखते हैं, लेकिन अमेरिका ने हमेशा भारत का साथ दिया है। दोनों देशों के बीच सबसे बेहतरीन संबंध लोगों के बीच है, जो दोनों देशों को साथ लाने का काम करता है। आज भारतीय अमेरिकी लोग हमारे देश में हर जगह रह रहे हैं, यही इस देश की विशेषता है। भारत और अमेरिका के समक्ष अगर कोई चुनौती है, तो वह चीन-रूस जैसे देश हैं। हम लड़ाई नहीं चाहते हैं, लेकिन अपनी सुरक्षा करना हमारा कर्तव्य है।     

राहुल गांधी: दोनों देशों के संबंधों में क्या देखने को मिल रहा है और इसमें किस तरह प्रगति हो रही है? 

निकोलस बर्न्स: भारत और अमेरिका के बीच सैन्य रिश्ते काफी मजबूत हैं। दोनों देशों को लोगों के आने-जाने पर सख्ती में कमी करनी चाहिए, एच1बी वीजा को लेकर काम किया जाना चाहिए और नियमों को आसान बनाना चाहिए। 

राहुल गांधी: अगर हम अमेरिका को देखें, तो ये बातें सामने आती हैं कि उसने कोरिया और जापान जैसे देशों के साथ मिलकर किस प्रकार बड़े विचारों पर काम किया है। लेकिन अब अमेरिका में कुछ नया विचार देखने को नहीं मिल रहा है, क्योंकि अमेरिका से आप पूरी दुनिया के लिए कुछ उम्मीद रखते हैं। 

निकोलस बर्न्स: जब हम मनमोहन सिंह के साथ काम कर रहे थे, तब हमारे देशों के बीच व्यापार और सेना को आधुनिक बनाने पर काम होता था। इसके अलावा हम बड़े विचार पर भी काम कर रहे थे, लेकिन अब समय आ गया है कि दोनों देश साथ आए और लोगों को आजादी दें। हम चीन से लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन एक विचारों की जंग जरूर चल रही है।

राहुल गांधी: मुझे लगता है कि लोकतंत्र ही सही रास्ता है, इसलिए हमें अपने लोकतंत्र को और भी मजबूत करना होगा। आज दोनों ही देशों में लोग बोलने से डर रहे हैं, लेकिन हमें पहले जैसी स्थिति को फिर से वापस लाना होगा। 

निकोलस बर्न्स: दोनों देशों को इस तरह के मुद्दे पर बातचीत करनी चाहिए और इस विषय पर काम करना होगा। 

राहुल गांधी: क्या कोरोना महामारी संकट में दोनों देश साथ नहीं आए हैं?

निकोलस बर्न्स: जी20 देशों को इस महामारी से उपजे संकट में साथ आना था, लेकिन ये नहीं हो पाया। पीएम मोदी, राष्ट्रपति ट्रंप और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे जैसे वैश्विक नेताओं को इस मुद्दे पर एक मंच पर आना था, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। राष्ट्रपति ट्रंप का मानना है कि वह अमेरिका को अकेले ही आगे ले जा सकते हैं और जिनपिंग उनसे लड़ना चाहते हैं। 

बता दें कि, निकोलस बर्न्स हार्वर्ड के जॉन एफ कैनेडी स्कूल में 'प्रैक्टिस ऑफ डिप्लोमेसी एंड इंटरनेशनल पॉलिटिक्स' विभाग में प्रोफेसर हैं। वह हार्वर्ड केनेडी स्कूल में 'फ्यूचर ऑफ डिप्लोमेसी प्रोजेक्ट' के निदेशक और मध्य-पूर्व, भारत व दक्षिण एशिया प्रोग्राम्स के फैकल्टी चेयरमैन हैं। स्टेट डिपार्टमेंट में अपने करियर के दौरान वे यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ पॉलिटिकल अफेयर्स के अवर सचिव थे। वे भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मुख्य वार्ताकार भी रहे हैं।


गौरतलब है कि इससे पहले, कांग्रेस नेता राहुल गांधी रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन, नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी जैसे आर्थिक क्षेत्र के दिग्गजों के साथ कोरोना से उपजी स्थिति को लेकर चर्चा कर चुके हैं। वहीं, वह हार्वर्ड के प्रोफेसर से बातचीत भी कर चुके हैं। 

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