इंडियन साइकाइट्री सोसाइटी ने कहा, अपराध नहीं है समलैंगिकता
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सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ मंगलवार से विभिन्न मुद्दों के लिए दायर याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। इसमें समलैंगिकता का मुद्दा भी शामिल है। पीठ समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में लाने के विरुद्ध दायर की गई याचिका पर सुनवाई करेगी। इससे पहले साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में ही रखा था।
इस सुनवाई से पहले इंडियन साइकाइट्री सोसाइटी (आईपीएस) का कहना है कि समलैंगिकता कोई मानसिक विकार नहीं है। इसे कानूनी रूप से समर्थन दिया जाना चाहिए। सोसाइटी ने शनिवार को कहा कि समलैंगिकता भी मानव सेक्सुअलिटी के अन्य प्रकारों बाय सेक्सुएलिटी और हेटरो सेक्सुअलिटी की ही तरह सामान्य है।
सोसाइटी ने आगे कहा कि ऐसे कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं जो ये साबित करते हों कि सेक्सुअल दिशा निर्देश किसी प्रकार के इलाज या अन्य कोशिशों से बदलते हों। यह एक सामानय प्रक्रिया होती है। लेकिन फिर भी ऐसे व्यक्ति पर दोष लगाए जाते हैं, जिससे उसका आत्म सम्मान कम होता है।
भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखा गया है
इससे पहले साल 2017 में सोसाइटी ने लेस्बियन, गे, बाय सेक्सुएल और ट्रांसजेंडर के लिए एक टास्क फोर्स भी गठित की थी। इस टास्क फोर्स को अब आंशिक रूप से दोबारा गठित किया गया है, यह आज भी समलैंगिकता का समर्थन कर अपना कार्य कर रही है। सोसाइटी का मानना है कि समलैंगिकता कोई मानसिक विकार नहीं है और ना ही अपराध है।
सोसाइटी ने यह भी कहा कि अमेरिकन साइकेट्रिक असोसिएशन और इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीज इन द वर्ल्ड समलैंगिकता को साल 1973 और 1992 में मानसिक विकार की लिस्ट से हटा चुके हैं। बता दें भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। आईपीसी की धारा 377 के तहत यदि 2 लोग आपसी सहमति या असहमति से अप्राकृतिक संबंध बनाते हैं और बाद में दोषी पाए जातें हैं तो उन्हें 10 की कैद से लोकर उम्र कैद तक की सजा हो सकती है।
समलैंगिकता की याचिका पर पांच सदस्यों की पीठ सुनवाई करेगी। यह सुनवाई सीजेआई दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में की जाएगी। जिसमें जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस ए एम खानविलकर, डी वाई चंद्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा भी शामिल हैं।