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Parliament: 'चुनाव आयोग से जुड़ा विधेयक लोकतंत्र का मखौल'; विपक्ष ने राज्यसभा में सरकार का कड़ा विरोध किया
Wed, 13 Dec 2023 07:47 AM IST
ज्योति भास्कर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Wed, 13 Dec 2023 07:47 AM IST
सार
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और आयोग के कामकाज से जुड़े अहम विधेयक को विपक्षी दलों ने 'लोकतंत्र का मखौल' करार दिया है। संसद के शीतकालीन सत्र में राज्यसभा में इस विधेयक के पेश किए जाने के बाद विपक्ष ने सरकार की नीयत पर सवाल खड़े किए।
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राज्यसभा की कार्यवाही (वीडियो ग्रैब)
- फोटो : social media
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विस्तार
विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनाव आयोग में नियुक्तियों से जुड़ा विधेयक पेश कर सरकार 'लोकतंत्र का मजाक' बना रही है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का जिक्र करते हुए विपक्षी दलों ने तर्क दिया कि राज्यसभा में पेश किया गया विधेयक सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्देश के खिलाफ है, जिसमें प्रधानमंत्री, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) और संसद में नेता प्रतिपक्ष (एलओपी) का पैनल बनाने की बात कही गई। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल पारित एक अहम आदेश में मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य में आयोग के अधिकारियों की नियुक्ति के दौरान तीन सदस्यीय पैनल बनाने का निर्देश दिया था।
संसद में शीतकालीन सत्र के दूसरे हफ्ते में पेश किया गए इस विधेयक को विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग के कामकाज में हस्तक्षेप भी बताया। विपक्षी दलों का कहना है कि इससे आयोग की स्वायत्तता से समझौता होगा। सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करते हुए विपक्षी दलों ने कहा, इस विधेयक को कानूनी अमलीजामा पहनाने पर देश के सर्वोच्च चुनाव अधिकारियों के रूप में ऐसे लोगों की नियुक्तियां होंगी जो जी-हुजूरी करते हैं। ऐसा होने पर आयोग की स्वतंत्रता कुचल दी जाएगी।
दरअसल, सरकार की तरफ से पेश नए विधेयक में प्रस्ताव किया गया है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाए जाने वाले चयन पैनल में चीफ जस्टिस (सीजेआई) की जगह कैबिनेट मंत्री को शामिल किया जाए। विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए, कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, इस कानून के अस्तित्व में आने के बाद चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता खत्म हो जाएगी। उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए विधेयक के कानून बनने के बाद सामने आने वाले विनाशकारी नतीजों के प्रति आगाह भी किया। उन्होंने कहा, संविधान निर्माता चाहते थे कि भारत की चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष, स्वतंत्र और सरकारी हस्तक्षेप के बिना हो। संसद लोकतंत्र का स्रोत है। इसे लोकतंत्र के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।
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'विपक्ष के साथ चुनाव आयोग को भी खत्म करने की साजिश'
लोकसभा में कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने बुधवार को विधेयक पारित कराने पर बयान दिया। उन्होंने कहा, ऐसे विधेयकों का पारित होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। मणिकम टैगोर ने विपक्षी दलों के गठबंधन- INDIA के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी की तरफ से कड़ा विरोध करने की बात कही। उन्होंने कहा कि विपक्षी दल लोकसभा में भी इस विधेयक का पुरजोर विरोध करेंगे। उन्होंने कहा, 'हम इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट विचार रखते हैं कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता बरकरार रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि CEC से जुड़ा विधेयक भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की दृष्टि से बहुत परेशान करने वाला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार चुनाव आयोग पर हमले कर रही है।
आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसद राघव चड्ढा ने कहा, चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए प्रस्तावित नई चयन समिति में नियंत्रण और संतुलन का ध्यान नहीं रखा गया है। सरकार ने इसका पूरा नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया है। चीफ जस्टिस की जगह कैबिनेट मंत्री को नियुक्त करने से चयन समिति में सरकार के पास दो वोट होंगे। पैनल के पास 2:1 के बहुमत से सभी फैसले लेने का अधिकार होगा। अब जी-हुजूरी करने या पार्टी के किसी आदमी को भी चुनाव आयुक्त बनाया जा सकता है। AAP की तरफ से बिल का विरोध करते हुए राघव ने विधेयक को 'लोकतंत्र का मखौल' करार दिया।
आम आदमी पार्टी के अलावा तमिलनाडु में सत्तारूढ़ पार्टी- द्रमुक के सांसद टी शिवा ने भी विधेयक का विरोध किया। उन्होंने इसे 'अलोकतांत्रिक, अनुचित और अस्वीकार्य' बताया। पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी- तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद सुखेंदु शेखर रे ने कहा, विधेयक में कई अनुचित प्रावधान हैं। यह बिल सरकारी मनमानी का प्रमाण है।
विरोध के साथ-साथ चर्चा में भाग लेने वाले कुछ सदस्यों ने विधेयक को व्यापक परामर्श के लिए सदन की चयन समिति के पास भेजने की मांग की। हालांकि, इसकी मांग करने वाले संशोधन ध्वनि मत से गिर गए। बता दें कि यह विधेयक कानून बनने पर, चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा की शर्तें और व्यवसाय का संचालन) अधिनियम, 1991 की जगह लेगा।
चर्चा के जवाब में सरकार ने विपक्ष के तमाम आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। सरकार ने कहा, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली 'निष्पक्ष और पारदर्शी' बनी रहेगी। कानून मंत्रालय के अनुसार, मौजूदा विधेयक इसलिए लाया गया है क्योंकि 32 साल पहले, 1991 में बनाए गए कानून में एक बड़ी खामी थी। सरकार की दलील है कि पुराने कानून में शीर्ष चुनाव अधिकारियों की नियुक्ति को विनियमित करने के प्रावधान नहीं थे।
बता दें कि सरकार ने राज्यसभा में मंगलवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्त (EC) (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय अवधि) विधेयक, 2023 पेश किया। हालांकि, विपक्षी दलों की तरफ से जताई गई चिंताओं और कड़े प्रतिरोध के बावजूद राज्यसभा में विधेयक ध्वनि मत से पारित हो गया।
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संसद में शीतकालीन सत्र के दूसरे हफ्ते में पेश किया गए इस विधेयक को विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग के कामकाज में हस्तक्षेप भी बताया। विपक्षी दलों का कहना है कि इससे आयोग की स्वायत्तता से समझौता होगा। सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करते हुए विपक्षी दलों ने कहा, इस विधेयक को कानूनी अमलीजामा पहनाने पर देश के सर्वोच्च चुनाव अधिकारियों के रूप में ऐसे लोगों की नियुक्तियां होंगी जो जी-हुजूरी करते हैं। ऐसा होने पर आयोग की स्वतंत्रता कुचल दी जाएगी।
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दरअसल, सरकार की तरफ से पेश नए विधेयक में प्रस्ताव किया गया है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाए जाने वाले चयन पैनल में चीफ जस्टिस (सीजेआई) की जगह कैबिनेट मंत्री को शामिल किया जाए। विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए, कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, इस कानून के अस्तित्व में आने के बाद चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता खत्म हो जाएगी। उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए विधेयक के कानून बनने के बाद सामने आने वाले विनाशकारी नतीजों के प्रति आगाह भी किया। उन्होंने कहा, संविधान निर्माता चाहते थे कि भारत की चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष, स्वतंत्र और सरकारी हस्तक्षेप के बिना हो। संसद लोकतंत्र का स्रोत है। इसे लोकतंत्र के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।
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'विपक्ष के साथ चुनाव आयोग को भी खत्म करने की साजिश'
लोकसभा में कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने बुधवार को विधेयक पारित कराने पर बयान दिया। उन्होंने कहा, ऐसे विधेयकों का पारित होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। मणिकम टैगोर ने विपक्षी दलों के गठबंधन- INDIA के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी की तरफ से कड़ा विरोध करने की बात कही। उन्होंने कहा कि विपक्षी दल लोकसभा में भी इस विधेयक का पुरजोर विरोध करेंगे। उन्होंने कहा, 'हम इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट विचार रखते हैं कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता बरकरार रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि CEC से जुड़ा विधेयक भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की दृष्टि से बहुत परेशान करने वाला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार चुनाव आयोग पर हमले कर रही है।
#WATCH | On Chief Election Commissioner and other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Bill 2023 passed in the Rajya Sabha, Congress MP Manickam Tagore says, "It is very unfortunate. INDIA alliance as well as Congress party has been… pic.twitter.com/yR9myTVBGf
— ANI (@ANI) December 13, 2023
आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसद राघव चड्ढा ने कहा, चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए प्रस्तावित नई चयन समिति में नियंत्रण और संतुलन का ध्यान नहीं रखा गया है। सरकार ने इसका पूरा नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया है। चीफ जस्टिस की जगह कैबिनेट मंत्री को नियुक्त करने से चयन समिति में सरकार के पास दो वोट होंगे। पैनल के पास 2:1 के बहुमत से सभी फैसले लेने का अधिकार होगा। अब जी-हुजूरी करने या पार्टी के किसी आदमी को भी चुनाव आयुक्त बनाया जा सकता है। AAP की तरफ से बिल का विरोध करते हुए राघव ने विधेयक को 'लोकतंत्र का मखौल' करार दिया।
आम आदमी पार्टी के अलावा तमिलनाडु में सत्तारूढ़ पार्टी- द्रमुक के सांसद टी शिवा ने भी विधेयक का विरोध किया। उन्होंने इसे 'अलोकतांत्रिक, अनुचित और अस्वीकार्य' बताया। पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी- तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद सुखेंदु शेखर रे ने कहा, विधेयक में कई अनुचित प्रावधान हैं। यह बिल सरकारी मनमानी का प्रमाण है।
विरोध के साथ-साथ चर्चा में भाग लेने वाले कुछ सदस्यों ने विधेयक को व्यापक परामर्श के लिए सदन की चयन समिति के पास भेजने की मांग की। हालांकि, इसकी मांग करने वाले संशोधन ध्वनि मत से गिर गए। बता दें कि यह विधेयक कानून बनने पर, चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा की शर्तें और व्यवसाय का संचालन) अधिनियम, 1991 की जगह लेगा।
चर्चा के जवाब में सरकार ने विपक्ष के तमाम आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। सरकार ने कहा, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली 'निष्पक्ष और पारदर्शी' बनी रहेगी। कानून मंत्रालय के अनुसार, मौजूदा विधेयक इसलिए लाया गया है क्योंकि 32 साल पहले, 1991 में बनाए गए कानून में एक बड़ी खामी थी। सरकार की दलील है कि पुराने कानून में शीर्ष चुनाव अधिकारियों की नियुक्ति को विनियमित करने के प्रावधान नहीं थे।
बता दें कि सरकार ने राज्यसभा में मंगलवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्त (EC) (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय अवधि) विधेयक, 2023 पेश किया। हालांकि, विपक्षी दलों की तरफ से जताई गई चिंताओं और कड़े प्रतिरोध के बावजूद राज्यसभा में विधेयक ध्वनि मत से पारित हो गया।