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जलवायु परिवर्तन के चलते देश की जीडीपी में 200 अरब डॉलर की कमी का जोखिम
Wed, 25 Nov 2020 09:41 PM IST
मुकेश कुमार झा
पीटीआई, मुंबई
पीटीआई, मुंबई
Published by: मुकेश कुमार झा
Updated Wed, 25 Nov 2020 09:41 PM IST
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- फोटो : Social Media
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जलवायु परिवर्तन में बदलाव के कारण भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 2030 तक 200 अरब डॉलर का प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का जोखिम है। इसका कारण तापमान में वृद्धि के कारण कामगारों का दफ्तर के बाहर रहकर काम करना कठिन होगा और इससे बाहर रहकर काम करने के घंटों में कमी आएगी।
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मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआई) की बुधवार को जारी रिपोर्ट में यह कहा गया है। इसके अनुसार वर्ष में प्रचंडगर्मी वाले दिन इस समय की तुलना में 15 प्रतिशत बढ़ जाएंगे। रिपोर्ट के अनुसार, 2017 की स्थिति को देखा जाए तो, गर्मी के समय होने वाले कार्यों का जीडीपी में योगदान करीब आधा है।
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वहीं जीडीपी वृद्धि में ऐसे कार्यों का योगदान करीब 30 प्रतिशत तथा रोजगार में करीब 75 प्रतिशत है। कुल 38 करोड़ लोगों को ऐसे कार्यों में रोजगार मिला हुआ है। इसमें कहा गया है, 'पारा और उमस बढ़ने के कारण काम न हो पाने से जीडीपी को क्षति 2030 तक 2.5 से 4.5 प्रतिश्त तक हो सकती है। राशि के रूप में मोटे तौर पर यह 150 से 200 अरब डॉलर बैठेगी।'
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रिपोर्ट के अनुसार, इससे निपटने के लिए भारत को बाहर रहकर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए काम के घंटे को बदलना होगा, गर्मी से निपटने के उपाय करने होंगे तथा उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों से श्रम और पूंजी को हटाने पर भी विचार करना पड़ सकता है।
मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट के अनुसार इस बदली हुई स्थिति के अनुसार खासकर शहरी गरीबों को स्वयं को ढालाना चुनौतीपूर्ण होगा। इन लोगों को मदद की जरूरत होगी। केवल एयर कंडीशन उपलब्ध कराने को लेकर 110 अरब डॉलर की जरूरत पड़ेगी।
रिपोर्ट के अनुसार कार्यबल पर पड़ने वाले प्रभाव के अलावा जलवायु बदलाव का असर फसलों पर भी पड़ सकता है। एक अनुमान के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण चावल, गेहूं, मकई जैसी फसलों के उत्पादन में 10 प्रतिशत तक की कमी आने की आशंका है। इसमें कहा गया है, 'पारा और उमस बढ़ने के कारण कृषि के लिए न केवल घंटे कम होंगे बल्कि उत्पादन में भी कमी की आशंका है।'