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जलवायु परिवर्तन: भारत में गर्मी बढ़ने के साथ ही गहराएगा बाढ़ का संकट

Mon, 29 Jun 2020 06:23 AM IST
योगेश साहू मनीष मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली।
मनीष मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Mon, 29 Jun 2020 06:23 AM IST
सार

  • 2019 में जुलाई से सितंबर के दौरान कम समय में हुई थी अधिक बारिश 
  • इससे देश के 14 राज्यों में आई बाढ़ से हुआ था काफी नुकसान

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Climate change: Flood crisis will deepen with increasing heat in India
बाढ़ (प्रतीकात्मक तस्वीर)

विस्तार

मानसून शुरू होते ही असम में बाढ़ आ गई है, यह सब जलवायु परिवर्तन का असर है। भारत के अलग-अलग राज्यों में तीव्र बारिश के दिन बढ़ने से बाढ़ जैसे हालात में और तेजी आएगी। हाल ही में भारत में जलवायु परिवर्तन पर प्रकाशित पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय मौसम में गर्मी बढ़ने के साथ ही कम समय में तेज बारिश बढ़ेगी और बाढ़ जैसे हालात लगतार सामने आएंगे। इसी के साथ सूखा भी बढ़ेगा।

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मानसून की बारिश शुरू होते ही उत्तर प्रदेश के तराई इलाके बहराइच, श्रावस्ती, गोंडा और सिद्धार्थनगर समेत पूर्वांचल के कई जिलों पर बाढ़ का संकट हर साल मंडराने लगता है। यही नहीं, जलावायु परिवर्तन की वजह से देश भर में बाढ़ की स्थितियां लगातार बढ़ रही हैं, जो आगे और बढ़ेंगी।
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हाल ही में प्रकाशित पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट ‘भारतीय क्षेत्र पर क्लाइमेट चेंज का असर’ के अनुसार 21वीं सदी में भारत में गर्मी बढ़ने के साथ ही तेज बारिश के दिन बढ़ेंगे और बाढ़ की घटनाएं अधिक सामने आएंगी। भारतीय मौसम विभाग और भारतीय उष्ण कटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) ने 1951-2015 तक के आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर भारतीय परिक्षेत्र में जलावायु परिवर्तन के असर से देश में बाढ़ का संकट और गहराने की बात कही है।
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भारत में जलवायु परिवर्तन के असर के बाद वर्ष 1951 से 2015 के बीच वार्षिंक औसत अधिकतम तापमान 0.15 डिग्री बढ़ गया है, जबकि न्यूनतम तापमान 0.13 डिग्री बढ़ गया है। इसका मतलब है कि आगे दिन और रात अधिक गर्म होंगे। वर्ष 2019 में जुलाई से सितंबर के दौरान कम समय में अधिक बारिश होने से 14 राज्यों में बाढ़ से लाखों लोगों को नुकसान पहुंचा और अरबों की सम्पत्ति का नुकसान हुआ। इससे साफ है कि गर्म वातावरण से बाढ़ का बढ़ता खतरा और बढ़ रहा है।

उत्पादन पर पड़ेगा असर ...  

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1951-2015 तक भारत में होने वाली बारिश में गिरावट देखी गई है। बारिश में यह कमी सिंधु-गंगा के मैदान और पश्चिमी छोर पर भी देखी गई है। इन क्षेत्रों में बारिश कम होने से अन्न उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।

वहीं, पिछले 65 साल के मानसून के आंकड़ों के अध्ययन से निकल कर आया कि तेज बारिश के दिन बढ़े हैं, जिस कारण बाढ़ की स्थितियां अधिक सामने आ रही हैं। इसके लिए अधिक स्थानीय कारणों और भूमि उपयोग और एरोसोल की सघनता इसका एक बड़ा कारण है।

64 साल में 3.65 लाख करोड़ रुपये का नुकसान...

भारत में बाढ़ से 1953-2017 तक कुल 1,07,487 लोगों की मौत हो चुकी है। केंद्रीय जल आयोग की राज्य सभा में प्रस्तुत की गई एक रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ से 3,65,860 करोड़ रुपये की फसलों और सम्पत्तियों का नुकसान हुआ है। बांध और नदियों के बारे में काम करने वाली संस्था एसएनडीआरपी के कोआर्डिनेटर हिमांशु ठक्कर कहते हैं, “भारत में बाढ़ की स्थिति और गंभीर होगी, जहां बाढ़ नहीं आती थी, वहां भी बहुत कम समय में तेज गति से बाढ़ आएगी। यह सब नदियों से छेड़छाड़ और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव है।

भारत में बाढ़ से वर्ष 2016-2018 के बीच हुआ नुकसान

वर्ष प्रभावित क्षेत्र प्रभावित जनसंख्या संपत्ति का नुकसान

2016 70 लाख हेक्टेयर 2.6 करोड़ 5675 करोड़
2017   60 लाख हेक्टेयर 4.7 करोड़ 26,395 करोड़
2018 40 लाख हेक्टेयर 7.9 करोड़ 95,735 करोड़
(स्रोत-राज्य सभा)
वर्ष 2016 से 2018 के बीच यूपी में हुआ नुकसान

वर्ष प्रभावित क्षेत्र प्रभावित जनसंख्या संपत्ति का नुकसान

2016 5.6 लाख हेक्टेयर 20 लाख 123 करोड़
2017 4.3 लाख हेक्टेयर 29 लाख 308 करोड़
2018 4.4 लाख हेक्टेयर 59 लाख 547 करोड़

(स्रोत-राज्य सभा)
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