Climate Change: विश्व स्तर पर क्लीन एनर्जी को लेकर तय करनी होंगी ये बाध्यताएं, जलवायु परिवर्तन के मसले पर विकसित देश दिखाएं बड़ा दिल
ऊर्जा विशेषज्ञ अरविंद मिश्रा ने अमर उजाला से चर्चा में कहा कि जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों से निपटने के लिए नवंबर 2021 में COP-26 (ग्लासगो) में जिस तरह के बड़े बड़े दावे किए गए, वह महज तीन महीने बाद रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान बेनकाब होते दिखे...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
पर्यावरणविदों ने यह उम्मीद जताई थी कि कोविड-19 की महामारी खत्म होने के बाद दुनियाभर में हरियाली बढ़ेगी। लेकिन धरती ने यह मौका खो दिया है। इसक खुलासा रिन्यूएबल्स 2022 ग्लोबल स्टेटस की रिपोर्ट (REN21) में हुआ है। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वैश्विक स्तर पर क्लीन एनर्जी ट्रांज़िशन नहीं हो रहा है। जिससे यह संभावना भी नहीं बचती है कि दुनिया इस दशक के अंत तक महत्वपूर्ण जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में सक्षम होगी। रिन्यूएबल एनर्जी के मामले में पूरे दुनिया में भारत केवल चीन (136 गीगावॉट) और संयुक्त राज्य अमेरिका (43 गीगावॉट) के बाद, 2021 में 15.4 गीगावॉट के साथ कुल अक्षय ऊर्जा क्षमता वृद्धि के लिए विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर है।
इस रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु कार्रवाई के लिए नए सिरे से प्रतिबद्धताओं के बावजूद सरकारों ने ऊर्जा संकट के प्रभावों को मिटिगेट (कम करने) के लिए अपनी पहली पसंद के रूप में जीवाश्म ईंधन उत्पादन और इस्तेमाल के लिए सब्सिडी प्रदान करने के विकल्प को चुना। 2018 और 2020 के बीच, सरकारों ने 18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की भरी रक़म 2020 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का सात फीसदी- जीवाश्म ईंधन सब्सिडी पर ख़र्च किया, कुछ मामलों में रिन्यूएबल (जैसे कि भारत में) के समर्थन को कम करते हुए। यह प्रवृत्ति महत्वाकांक्षा और कार्रवाई के बीच एक चिंताजनक अंतर का खुलासा करती है।
रूस-यूक्रेन युद्ध ने विकसित देशों के दावों को उजागर किया
ऊर्जा विशेषज्ञ अरविंद मिश्रा ने अमर उजाला से चर्चा में कहा कि जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों से निपटने के लिए नवंबर 2021 में COP-26 (ग्लासगो) में जिस तरह के बड़े बड़े दावे किए गए, वह महज तीन महीने बाद रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान बेनकाब होते दिखे। ऊर्जा के जिन संसाधनों का उपयोग मानवीय जीवन को गुणवत्ता देने के लिए किया जाना चाहिए था, उसका उपयोग युद्ध में हार और जीत के हथियार के तौर पर हो रहा है। प्राकृतिक गैस की पाइपलाइन बाधित की गई हैं। ईंधन की दरों में दुनिया भर हुई वृद्धि का सीधा असर क्लीन एनर्जी परियोजनाओं पर पड़ेगा। बैंक भी ऐसे ऊर्जा संक्रमण काल में हरित ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश से दूर हटेंगे। अब वक्त आ गया है कि क्लीन एनर्जी को बढ़ावा देने समेत कार्बन फुट प्रिंट कम करने को लेकर अंतराष्ट्रीय संधियों से बाध्यताएं तय की जाएं। जाहिर है इसके लिए अमीर देशों को अपना दिल बड़ा करना होगा। हरित कोष को लेकर विकसित देशों की उदासीनता पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जाहिर की गई चिंता भी आगाह करने वाली है।
यह है भारत का रिन्यूएबल एनर्जी परिदृश्य
2021 में 15.4 गीगावॉट के साथ कुल रिन्यूएबल ऊर्जा क्षमता वृद्धि के लिए विश्व स्तर पर भारत तीसरे स्थान पर है, केवल चीन (136 गीगावाट) और संयुक्त राज्य अमेरिका (43 गीगावाट) के बाद। भारत ने 2021 में 843 मेगावाट की पनबिजली क्षमता जोड़ी, जिससे कुल क्षमता 45.3 गीगावाट हो गई। नई सौर पीवी क्षमता के लिए भारत एशिया का दूसरा सबसे बड़ा बाज़ार था और विश्व स्तर पर तीसरा (2021 में 13 गीगावाट अतिरिक्त)। यह पहली बार, जर्मनी (59.2 GW) को पछाड़ते हुए, कुल स्थापना (60.4 GW) के लिए चौथे स्थान पर रहा।
भारत ने अपने राष्ट्रीय 18,100 करोड़ रुपये (24.3 बिलियन अमरीकी डालर) के सौर उत्पादन कार्यक्रम का विस्तार किया, जो बैटरी निर्माण संयंत्रों की स्थापना के लिए घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों को प्रोत्साहन प्रदान करता है। भारत में, रिन्यूएबल्स में कुल नया निवेश 70 फीसदी बढ़कर 11.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। रिन्यूएबल ऊर्जा नीतियां और जीवाश्म ईंधन में कटौती- भारत अपनी नेट मीटरिंग योजना के तहत सौर पीवी बढ़ाने से देश का रूफटॉप पीवी बाजार 2021 में अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।