प्रदूषण फैलाए अमेरिका और दोष भारत पर: प्रधान न्यायाधीश
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भारत के प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने कहा कि अमेरिका सहित अन्य विकसित देश ओजोन परत को नुकसान पहुंचा रहे हैं और दोष भारत के सिर मढ़ा जाता है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि ऐसी अंतराष्ट्रीय व्यवस्था होनी चाहिए कि प्रदूषण फैलाने वाले औद्योगिक देशों से शुल्क वसूला जाए। साथ ही चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि अगली लड़ाई नदी जल को लेकर होगी।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अमेरिका प्रति व्यक्ति 10 मिट्रिक टन कार्बन उत्सर्जित करता है वहीं भारत 1.6 मिट्रिक टन कार्बन उत्सर्जित करता है। बावजूद इसके दोष भारत पर मढ़ा जाता है। क्वेटो एग्रीमेंट के तहत अमेरिका को कार्बन उत्सर्जन में एक फीसदी कम करने के लिए कहा गया था, लेकिन अमेरिका ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
अंतरराष्ट्रीय कानून को लेकर आयोजित एक सेमिनार में जस्टिस ठाकुर ने कहा कि औद्योगिक देश पिछले 200 वर्षों से प्रदूषण फैला रहे हैं। ओजोन परत में छेद होने का कारण यह है न कि भारत द्वारा इस्तेमाल पाकिस्तान प्रदूषण फैलाता है तो भी भारत प्रभावित होता है। बांग्लादेश में होने का असर भी भारत पर होता है। बल्कि विश्व भर में कहीं भी ऐसा कुछ होता है तो हम प्रभावित होते हैं।
अंतरराष्ट्रीय कानून की दरकार
लिहाजा ऐसे मसले पर अंतरराष्ट्रीय कानून की दरकार है। उन्होंने कहा कि विश्व आज सिमट रहा है। आज विश्व नजदीक आ रहा है। तकनीक केइस युग में आज देशों के बीच राजनीतिक सीमा के अलावा सब कुछ मिट गया है। चीफ जस्टिस ने कहा कि हमें पता होना चाहिए कि विश्व में क्या हो रहा है।
हमें समय के साथ बदलने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा कई अन्य मसलों पर अंतरराष्ट्रीय कानून की जरूरत है। समुद्र कानून, शरणार्थी व अंतरिक्ष कानून आदि का उन्होंने जिक्र किया। उन्होंने बच्चों की कस्टडी के मसले पर भी अंतरराष्ट्रीय कानून बनाए जाने की बात की।
सेमिनार में उपस्थित सुप्रीम कोर्ट के जज एके सिकरी ने कहा कि यह बहस का विषय हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट कभी-कभी अधिकारक्षेत्र से बाहर जाकर काम करता हैं। उन्होंने कहा कि उदाहरण के लिए विशाखा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन-शोषण को लेकर विस्तृत गाइडलाइंस तैयार किया। जब कभी मानवाधिकार की बात आती है तो विश्व भर में विशाखा मामले की तारीफ होती है।