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बंगाल सिग्नेचर केस: सीआईडी ने कोर्ट से मांगी तृणमूल विधायकों के लिखावट के नमूने, बढ़ेगीं ममता की मुश्किलें!

Tue, 02 Jun 2026 11:32 PM IST
राकेश कुमार आईएएनएस, नई दिल्ली
आईएएनएस, नई दिल्ली Published by: राकेश कुमार Updated Tue, 02 Jun 2026 11:32 PM IST
सार

पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर मामले की जांच अब सीआईडी के हाथों में है। इस मामले में कोर्ट ने तीन विधायकों के हैंडराइटिंग सैंपल लेने की अनुमति दे दी है। वहीं, शिकायतकर्ता दो टीएमसी विधायकों को पार्टी से निकाल दिया गया है और जांच की आंच अभिषेक बनर्जी तक पहुंच चुकी है। क्या है पूरा मामला? जानिए...
 

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cid seeks handwriting samplesof trinamool mlas in assembly signature case
ममता बनर्जी, पूर्व मुख्यमंत्री पश्चिम बंगाल - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पश्चिम बंगाल से बड़ी खबर आ रही है। तृणमूल विधायकों के हस्ताक्षर विवाद में पुलिस ने कड़ा रुख अपनाया है। सीआईडी ने इस मामले में सीधे कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सीआईडी ने बैंकशाल कोर्ट में एक अहम अर्जी लगाई थी। इसमें तृणमूल विधायक बहारुल इस्लाम, सुभाषिस दास और अरूप रॉय के लिखावट के नमूने मांगे गए थे। कोर्ट ने सीआईडी की इस अर्जी को मंजूर कर लिया है।
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जांच के लिए बनी पांच सदस्यीय टीम
इस मामले की जांच बहुत तेजी से चल रही है। सीआईडी ने इसके लिए पांच सदस्यीय टीम बनाई है। इस टीम के मुखिया डीआईजी रैंक के एक अधिकारी हैं। पूरा विवाद विधानसभा से शुरू हुआ था। विधानसभा सचिव ने हरे स्ट्रीट थाने में एक शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने तृणमूल विधायकों के हस्ताक्षरों में विसंगतियों की बात कही थी। इसी शिकायत के आधार पर सीआईडी अब कोलकाता पुलिस की मदद कर रही है।
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दो विधायक पार्टी से निष्कासित
इस कानूनी लड़ाई के बीच राजनीतिक हलचल भी बढ़ गई है। तृणमूल कांग्रेस ने सोमवार को बड़ा फैसला लिया। पार्टी ने अपने दो विधायकों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। इनके नाम रिताब्रत बनर्जी और संदीपन साहा हैं। दोनों पर दल-विरोधी गतिविधियों का आरोप लगा है। इस कार्रवाई के तुरंत बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। यह प्रेस कॉन्फ्रेंस नबन्ना में आयोजित हुई थी।
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मुख्यमंत्री ने मीडिया के सामने एक बड़ा खुलासा किया। उन्होंने कहा कि रिताब्रत और संदीपन ने ही स्पीकर से शिकायत की थी। दोनों ने विधानसभा में हस्ताक्षर जालसाजी को लेकर लिखित शिकायत दी थी। इसी के आधार पर विधानसभा सचिवालय ने थाने में मामला दर्ज कराया। शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि वह राज्य के पुलिस मंत्री हैं। मामला सामने आते ही उन्होंने तुरंत सीआईडी जांच के आदेश दे दिए थे।

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क्यों उलझा पूरा मामला?
दरअसल, यह पूरा विवाद विधानसभा के नियमों से जुड़ा है। पूर्व सत्तारूढ़ दल के सामने एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई थी। मामला विपक्ष के नेता, उपनेता और मुख्य सचेतक के चयन का था। चार मई को चुनाव के नतीजे घोषित हुए थे। इसके बाद छह मई को ममता बनर्जी ने एक बैठक बुलाई। यह बैठक उनके कालीघाट स्थित आवास पर हुई थी। बैठक में सभी विजेता विधायक शामिल हुए थे। वहां विधायकों ने हाथ उठाकर एक प्रस्ताव पर सहमति दी थी। प्रस्ताव था कि ममता बनर्जी ही इन सभी पदों का फैसला करेंगी।

इसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने नामों की घोषणा कर दी। शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाया गया। नयना बंद्योपाध्याय और असीमा पात्रा को उपनेता तय किया गया। फिरहाद हकीम को मुख्य सचेतक की जिम्मेदारी मिली। इसके बाद पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी के हस्ताक्षर वाला एक पत्र विधानसभा भेजा गया। लेकिन विधानसभा ने इस पत्र को स्वीकार नहीं किया।


इसके पीछे एक तकनीकी कारण था। नियम के मुताबिक संसदीय दल के नेता का चुनाव एक औपचारिक बैठक में होना चाहिए। इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। छह मई की बैठक के बाद कई विधायकों ने मीडिया से बात की थी। उन्होंने कहा था कि जिम्मेदारी ममता बनर्जी को दी गई है। जब स्पीकर ने अभिषेक का पत्र खारिज कर दिया, तो खलबली मच गई। इसके बाद 19 मई को कालीघाट में दोबारा बैठक बुलाई गई। वहां विधायकों को 6 मई की बैठक के मिनट्स पर हस्ताक्षर करने को कहा गया। कई विधायकों ने कहा कि उनसे पुरानी तारीख के दस्तावेज पर जबरन दस्तखत कराए गए। यहीं से पूरा मामला पेचीदा हो गया।

सीआईडी की छापेमारी और समन
सीआईडी ने केस हाथ में लेते ही कार्रवाई शुरू कर दी। जांच टीम चार विधायकों के घर पहुंची। टीम ने नयना बंद्योपाध्याय, कुणाल घोष, तापस मैती और बहारुल इस्लाम के घरों का दौरा किया। वहां हस्ताक्षर घोटाले से जुड़े सबूत तलाशे गए। सीआईडी ने इस मामले में सोमवार को अभिषेक बनर्जी को भी समन भेजा था। उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया गया था। लेकिन खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर वह पेश नहीं हुए।
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