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चीन के मानने के आसार कम, लद्दाख में लंबी सैन्य तैनाती के आसार, रसद आपूर्ति भी युद्ध से कम नहीं

Sat, 22 Aug 2020 07:51 AM IST
योगेश साहू शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली।
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Sat, 22 Aug 2020 07:51 AM IST
सार

  • सियाचिन से अलग और मुश्किल होगा सैनिकों को ठंड में रखना
  • पैंगोंग, डेपसांग से चीनी फौज को पीछे धकेलने का क्या है प्लान
  • हजारों सैनिकों की तैनाती के लिए युद्ध स्तर जैसी है रसद-सामग्री की आपूर्ति

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China Not Likely To Move Back, Military Stay For Long Time On Border Area In Ladakh, Logistics Supply Is Also Like War Time
गश्त पर निकले भारतीय सेना के जवान। (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : PTI

विस्तार

लद्दाख के पैगोंग क्षेत्र में चीन की फौज पिछले करीब चार महीने से एलएसी के इस पार भारतीय सीमा क्षेत्र में धौंस जमा रही है। भारतीय विदेश मंत्रालय की बार-बार अपील के बाद भी चीन ने डेपसांग, पैंगोंग से अपने कदम पीछे नहीं खींचे हैं। 19 अगस्त को दोनों देशों के संयुक्त सचिव स्तर के राजनयिकों की वार्ता में भी कोई ठोस समाधान नहीं निकला है।

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विदेश मंत्रालय और सैन्य सूत्रों के अनुसार चीन के साथ कूटनीतिक, राजनयिक, विदेश सचिव, विशेष प्रतिनिधि (एनएसए स्तर) और सैन्य कमांडर स्तर की वार्ता हो चुकी है। पैगोंग त्सो और डेपसांग जैसे सामरिक दृष्टि से महत्व क्षेत्र में अभी स्थिति जस की तस है। सैन्य सूत्र बताते हैं फिलहाल सेना लद्दाख क्षेत्र में सैनिकों की लंबे समय की तैनाती जैसी योजना को अंतिम रूप देने में जुटी है।
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चीन की फौज को एलएसी पर भेजने का क्या है प्लान?

सैन्य सूत्रों का कहना है हम किसी भी चुनौती का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार हैं। विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक ब्रीफिंग से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि दोनों देश सीमा पर शांति और सौहार्द्र बनाए रखने का संकल्प बार—बार दोहरा रहे हैं।
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चीन के विशेष प्रतिनिध वांग यी ने देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के साथ वार्ता में इस पर प्रतिबद्धता जताई और चीनी सेना के पीछे हटने पर सहमति बनी थी। चीन को अंतरराष्ट्रीय समझौतों और सहमतियों का पालन करना चाहिए। विदेश मंत्रालय के अनुसार दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्ते पर इस मसले का गंभीर असर पड़ सकता है, लेकिन इसके बावजूद अभी तक चीन से कोई सकारात्मक संकेत नहीं आए हैं।

भारत के पास क्या है रास्ता?
विदेश मंत्रालय के पूर्व विदेश सचिव शशांक, चीन मामलों के जानकार स्वर्ण सिंह, विदेश मंत्रालय से कुछ समय पहले ही रिटायर हुए हैं। बीजिंग स्थित दूतावास में काम कर चुके सूत्र का कहना है कि चीन काफी समय से पड़ोसियों के साथ ढाई कदम आगे, दो कदम पीछे की नीति पर चल रहा है। 2017 में डोकलाम घुसपैठ के बाद उसने भारत के साथ आक्रमकता भी दिखानी शुरू कर दी है।

इसलिए भारत को सुनियोजित तरीके अपनाने होंगे। वायुसेना के अवकाश प्राप्त वाइस एयर मार्शल एनबी सिंह, सेना से रिटायर लेफ्टिनेंट जनरल बलवीर सिंह संधू समेत अन्य के पास चीन को करारा जवाब देने के सिवा कोई ठोस जवाब नहीं है। वहीं भारत ने चीन के साथ कारोबारी रिश्ते में दबाव बनाने का संकेत देते हुए वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य तैनाती बढ़ाने, सतर्कता बनाए रखने, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन की विस्तारवादी नीति पर अपना पक्ष रखने का रास्ता अपनाया है।

लेकिन किसी के पास इसका उत्तर नहीं है कि यह स्थिति कब तक बनी रहेगी?
क्या सर्दी के मौसम में भी भारत की सेना लद्दाख की -20 से -30 डिग्री की ठंड में बर्फीली हवा का सामना करने के लिए तैनात रहेगी? फिलहाल आसार इसी तरह के हैं और समाधान न निकलने तक यह स्थिति आगे भी जारी रह सकती है।

लद्दाख में सेना की इतनी बड़ी तैनाती के क्या हैं मायने?
लद्दाख में सैन्य तैनाती के मायने जानने से पहले सियाचिन, बेस कैंप के बारे में जानते हैं। थ्वॉयस बेसकैंप से सियाचिन की चौकियों पर रोजमर्रा के सामानों की आपूर्ति के लिए हेलीकॉप्टर का प्रयोग किया जाता है। हेलीकॉप्टर से इस आपूर्ति में 40-50 हजार रुपये का ईंधन लगता है।

जबकि चौकियों पर दो-तीन दर्जन सैनिकों की ही तैनाती रहती है। इसके उलट लद्दाख के गलवां नदी घाटी क्षेत्र, फिंगर एरिया के पास, पैगोंग, डेपसांग के सामानांतर हजारों की संख्या में सैनिक तैनात हैं। आर्टिलरी, टैंक, आकाश प्रतिरक्षा मिसाइल प्रणाली समेत अन्य की तैनाती है।

अचानक इतनी बड़ी सैनिकों की संख्या के लिए खाने-पीने, रहने, चिकित्सा, सैन्य आपरेशन अंजाम देने के लिए जरूरी संसाधन को खड़ा करना चुनौती है। दूसरे अग्रिम मोर्चे पर स्थायी चौकियां भी नहीं हैं। ऐसे में सैनिकों के लिए विशेष प्रकार के टेंट, संसाधन जुटाना, उन्हें गर्म रखने के लिए कैरोसिन का तेल, विशेष प्रकार के स्टोव आदि किसी चुनौती से कम नहीं हैं।

चीन के रणनीतिकार भी समझते हैं
भारतीय सेना से रिटायर हुए अग्रिम पंक्ति के लोग भी मानते हैं कि चीन को हमारी कुछ स्थितियों का ठीक-ठीक अंदाजा है। एक लेफ्टिनेंट जनरल स्तर के रिटायर अधिकारी का कहना है कि चीन इसी के कारण ढिठाई दिखा रहा है। उसे लग रहा है भारत कभी भी सैन्य हमले की पहल नहीं कर सकता।

इतना ही नहीं चीनी सेना को पीछे धकेलने के लिए भारत सैन्य कार्रवाई जैसा कदम भी नहीं उठा सकता। दूसरे चीन के सैनिक लद्दाख के पास तिब्बत क्षेत्र में तैनात रहते हैं। उनके सैनिक -20 से -40 डिग्री के तापमान में भी काम करने के अभ्यस्त हैं।

चीन ने अपने क्षेत्र में लद्दाख सीमा के निकट स्थाई बंकर, सैन्य ठिकाने, करीब 30-35 किमी दूरी पर स्थायी और बड़ा सैन्य अड्डा बना रखा है। सूत्र का कहना है पड़ोसी देश के रणनीतिकारों को लग रहा है कि उनके लिए सैन्य तैनाती कोई मुश्किल काम नहीं है, जबकि भारत के लिए काफी कष्टदायी, खर्चीला है। इसलिए भारत को सर्दी आने से पहले मसले का हल निकालने की जल्दबाजी भी है।

भारत की मुश्किल
सैनिकों के लिए रसद सामग्री की आपूर्ति, आपरेशनल क्षमता बनाए रखने का वातावरण देना और 30-40 हजार सैनिकों की तैनाती को बनाए रखना बड़ी चुनौती है। अभी भारत लद्दाख क्षेत्र में सड़क और हवाई मार्ग से सैन्य संसाधन, सैनिक, रसद सामग्री आदि आपूर्ति करता है। बर्फबारी शुरू हो जाने के बाद आपूर्ति करने के रास्ते बहुत सीमित हो जाते हैं।


रोहतांग पास सुरंग के अक्तूबर, नवंबर तक चालू हो जाने के बाद थोड़ी सहूलियत हो जाएगी, लेकिन दुश्वारियां भी उसी अनुपात में बढ़ेंगी। आर्मी सप्लाई कोर के कमांडर इन चीफ रहे लेफ्टिनेंट जनरल बलवीर सिंह संधू का कहना है कि इस चुनौती से पार पाना भी किसी युद्ध से कम नहीं है। हालांकि संधू का कहना है कि सेना का मैकेनिज्म बहुत मजबूत है। इसलिए ऐसा हो जाएगा। हालांकि सैन्य तैनाती के लिहाज से तैयारी का समय कम है और तमाम अनिश्चितताएं भी हैं।

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