5जी टेक्नोलॉजी को लेकर अमेरिका और चीन के बीच फंसा भारत, दोनों डाल रहे हैं दबाव
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चीनी कंपनी हुवावे की 5जी मोबाइल फोन तकनीक ने दुनियाभर में अपना परचम फहराया है। लेकिन अमेरिका को यह हजम नहीं हो रहा है। विदेश मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि अमेरिका भारत से उम्मीद कर रहा है कि वह चीन के 5जी कार्यक्रम का समर्थन न करे। अमेरिका ने अपने इस दबाव को आगे बढ़ाना भी शुरू कर दिया है।
चीन की तरफ से दबाव
अमेरिका के इस दबाव के आगे भारत अपना हित और चीन के साथ संबंधों की गर्माहट का आकलन करने में लगा है। बताते हैं चीन की तरफ से संकेत आ रहे हैं कि अगर 5जी कार्यक्रम में भारत सहयोगी नहीं बनता है, तो चीन में काम कर रही भारतीय कंपनियों का काम करना मुश्किल हो सकता है। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम-2019 को मूर्त रूप देने के क्रम में यह भी एक अहम पड़ाव बन रहा है।
सिलिकॉन वैली से टक्कर लेने की तैयारी
चीन दौरे के दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन को भारत के साथ द्विपक्षीय हितों का हवाला दिया है। इधर दिल्ली में भारतीय रणनीतिकार इसके इर्द-गिर्द कूटनीति की नई पिच तैयार कर रहे हैं। दरअसल चीन का 5जी प्रोग्राम और बिग डाटा कार्यक्रम राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षी योजना है। चीन इसके बहाने से अमेरिका की सिलिकॉन वैली से टक्कर लेने की तैयारी कर रहा है। इसके सामानांतर चीन की कोशिश भारत जैसे साफ्टवेयर तकनीक में आगे निकल चुके देश से सहयोग लेने की है।
अमेरिका को मंजूर नहीं
लेकिन अमेरिका की साफ नीति है कि जो देश उसकी राय से राय नहीं मिलाता, अमेरिका के दोस्त देश भी उस देश से राय न मिलाएं। अमेरिका इसी तर्ज पर भारत और ईरान के बीच में हाईड्रोकार्बन (ईधन तेल) के आयात को कम करने पर जोर दे रहा है। रूस के साथ भारत के परमाणु करार, नए परमाणु संयंत्र की स्थापना, अंतरिक्ष और विज्ञान प्रौद्योगिकी से जुड़े कार्यक्रम, एस-400 मिसाइल प्रणाली, लीज पर परमाणु पनडुब्बी लेने जैसे तमाम रक्षा सौदों से परहेज करने की हिदायत देता है।
भारत के लिए अहम है 5जी
भारत 5जी स्पेक्ट्रम कार्यक्रम को लेकर काफी संवेदनशील है। सूत्रों का कहना है कि 5जी कार्यक्रम को लेकर कई तरह की सुरक्षा चिंताएं हैं। भारतीय एजेंसियां इस संबंध में अपना काम कर रही हैं। इस क्रम में डाटा, डाटा की सुरक्षा, सर्वर की स्थिति समेत कई महत्वपूर्ण घटक हैं। हालांकि 5जी प्रणाली में भारत के पास साफ्टवेयर क्षेत्र में पंख लगने की तमाम संभावनाएं हैं। इससे भारतीय सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री ट्रिलियन डालर तक का उछाल ले सकती है।