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संविधान दिवस: मुख्य न्यायाधीश बोले- विधायिका कानूनों के प्रभाव का आकलन नहीं करती, राष्ट्रपति और कानून मंत्री ने भी कही यह बात

Sat, 27 Nov 2021 08:38 PM IST
अभिषेक दीक्षित राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली
राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Sat, 27 Nov 2021 08:38 PM IST
सार

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू की उपस्थिति में संविधान दिवस समारोह के समापन समारोह में चीफ जस्टिस ने कहा कि न्यायपालिका में लंबित मामलों का मुद्दा बहुआयामी है और उम्मीद है कि सरकार इस दो दिवसीय कार्यक्रम के दौरान प्राप्त सुझावों और मौजूदा मुद्दों का समाधान निकालने पर विचार करेगी।

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Chief Justice said Said That Legislature does not assess the effect of laws President Kovind and Law Minister also said this
NV Ramana - फोटो : ANI

विस्तार

संसद सत्र से पहले भारतीय के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण ने शनिवार को कहा कि विधायिका कानूनों के प्रभाव का अध्ययन या आकलन नहीं करती है। ऐसा न होने से कभी-कभी 'बड़े मुद्दे' उठ खड़े होते हैं और परिणामस्वरूप न्यायपालिका पर मामलों का अधिक बोझ पड़ जाता है। नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के चेक बाउंस के मामलों से संबंधित धारा-138 का उदाहरण देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा, 'मजिस्ट्रेट जो पहले से ही मुकदमों के बोझ तले दबे होते हैं, उन पर हजारों मामलों का और बोझ पड़ जाता है। इसी तरह विशेष बुनियादी ढांचे के निर्माण के बिना मौजूदा अदालतों को वाणिज्यिक अदालतों के रूप में बदल दिया जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसा करने से लंबित मामलों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू की उपस्थिति में संविधान दिवस समारोह के समापन समारोह में चीफ जस्टिस ने कहा कि न्यायपालिका में लंबित मामलों का मुद्दा बहुआयामी है और उम्मीद है कि सरकार इस दो दिवसीय कार्यक्रम के दौरान प्राप्त सुझावों और मौजूदा मुद्दों का समाधान निकालने पर विचार करेगी।
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उन्होंने कहा, 'हमें यह याद रखना चाहिए कि आलोचना का सामना करने या बाधाएं आने के बावजूद न्याय प्रदान करने का हमारा मिशन नहीं रुक सकता। हमें न्यायपालिका को मजबूत करने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए आगे बढ़ना होगा।' 
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वहीं कानून मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि ऐसी स्थिति नहीं हो सकती जब विधायिका द्वारा पारित कानूनों और न्यायपालिका द्वारा दिए गए फैसलों को लागू करना मुश्किल हो। मौलिक अधिकारों और मौलिक कर्तव्यों के बीच संतुलन खोजने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि कभी-कभी अपने अधिकारों की तलाश में लोग दूसरों के अधिकारों के साथ-साथ अपने स्वयं के कर्तव्यों के बारे में भूल जाते हैं। 

उन्होंने कहा कि संसद और राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयक और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले देश के कानून हैं। हम ऐसी स्थिति में नहीं हो सकते जहां सर्वोच्च न्यायालय या हाईकोर्ट या विधानसभा और संसद द्वारा पारित किए जाने के बावजूद कानूनों को लागू करना मुश्किल हो। हम सभी को इस पर विचार करना होगा। विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका व समाज के सभी वर्गों को सोचना होगा कि देश संविधान के अनुसार चलता है।'

वहीं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने संबोधन में न्यायाधीशों को याद दिलाया कि अदालत कक्षों के अंदर बोलने में अत्यधिक विवेक का प्रयोग करना उन पर निर्भर करता है। उन्होंने न्यायधीशों व वकीलों को संबोधित करते हुए कहा, 'इसमें कोई संदेह नहीं है कि आपने अपने लिए एक उच्च 'बार' निर्धारित किया है। इसलिए यह न्यायाधीशों पर भी निर्भर करता है कि वे अदालतों में बोलने में अत्यधिक विवेक का प्रयोग करें।अविवेकी टिप्पणी भले ही वह अच्छे इरादे से किया गया है लेकिन वह न्यायपालिका को नीचा दिखाने के लिए संदिग्ध व्याख्याओं की जगह बनाता है।

कोविंद ने सोशल मीडिया में जजों के खिलाफ की गई टिप्पणियों पर भी नाराजगी व्यक्त की और इसके पीछे के कारणों की जांच करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा, 'सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर न्यायपालिका के खिलाफ कुछ अपमानजनक टिप्पणियों के मामले सामने आए हैं। इन प्लेटफार्मों ने सूचनाओं को लोकतांत्रिक बनाने के लिए आश्चर्यजनक रूप से काम किया है फिर भी इनका एक खराब पक्ष भी है। कुछ बदमाशों द्वारा इसका दुरुपयोग किया जाता है। मुझे उम्मीद है कि यह एक विचलन है और यह अल्पकालिक होगा।'


कोविंद ने कहा न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सजता। उन्होंने यह भी कहा कि अखिल भारतीय न्यायिक सेवाओं की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सुधारों के लिए अन्य सुझाव भी होंगे लेकिन उद्देश्य न्याय वितरण तंत्र को मजबूत करना होना चाहिए।

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